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-सुनील कुमार॥

लोकसभा का यह सत्र शुरू होते ही थम गया है क्योंकि विपक्ष ने आज देश में खड़े सबसे बड़े आर्थिक खतरे को लेकर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। यह मांग संयुक्त संसदीय समिति से भी हो सकती है, और सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की निगरानी में भी हो सकती है। आज संसद के दो सत्र शुरू तो हुए हैं, लेकिन अडानी का मुद्दा सरकार का पीछा नहीं छोडऩे वाला है। एक कंपनी के शेयरों के दाम गिरने को लेकर संसद की फिक्र का कोई सामान नहीं बनना चाहिए था लेकिन अडानी के साथ दिक्कत यह है कि एलआईसी और देश के सरकारी बैंकों के दसियों हजार करोड़ रूपये इसमें लगे हुए हैं। फिर यह भी है कि सरकारी बैंकों और एलआईसी को अगर नुकसान हो रहा है, तो वह बोझ जनता पर ही जाता है, इनकी अपनी कोई जेब नहीं होती है। इसलिए जनता के पैसों को अगर इन बड़ी सरकारी कंपनियों में बैठे हुए लोग अडानी जैसी संदिग्ध कंपनी में झोंकते हैं, तो इस पर सरकार की संसद में जवाबदेही बनती है। इसके अलावा जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडानी के खिलाफ ऐसे आरोप लगते हैं कि इस कंपनी ने अपने खाता-बही में आंकड़ों का चमत्कार दिखाकर, कई बातों को छुपाकर, कई बदनाम देशों के मार्फत रहस्यमय रकम लाकर अपने कारोबार को इस तरह बढ़ाया है, तो ऐसे आरोपों के साथ-साथ जब भारत में प्रचलित यह आम धारणा जोड़ दी जाए कि ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे पसंदीदा और कृपापात्र कंपनी है, तो फिर इस पर लगे आरोपों की जांच नीचे के स्तर पर तो नहीं हो सकती। फिलहाल बाजार में इस कंपनी का जो भ_ा बैठा है, उसे देखते हुए इसमें सरकारी कंपनियों के पूंजीनिवेश देखते हुए इसकी एक पारदर्शी जांच की जरूरत है। फिर कांग्रेस प्रवक्ता जयराम नरेश ने मांग की है कि एक स्वतंत्र जांच से ही एलआईसी, एसबीआई जैसी अन्य संस्थाएं बचाई जा सकती हैं जिन्हें पीएम ने अडानी समूह में निवेश करने के लिए बाध्य किया। जयराम रमेश का यह आरोप इन तथ्यों पर आधारित है कि पिछले तीन बरस में एलआईसी और सरकारी बैंकों ने अडानी में अपना पूंजीनिवेश कई गुना बढ़ाया है।

अब जो उद्योग समूह अपनी आधा दर्जन से अधिक कंपनियों के साथ भारतीय शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी है, वह वैसे भी बहुत से नियमों से बंधी रहती है। इसके बाद जब वह सरकारी संस्थाओं से पूंजीनिवेश पा रही है, तो भी उससे पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है। फिर जैसा कि अमरीकी फर्म हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में अडानी पर आरोप लगाया गया है कि इसने दसियों हजार करोड़ संदिग्ध देशों की रहस्यमय कंपनियों से बहुत रहस्यमय तरीके से लाने का काम किया है, तो यह बात भी अपने आपमें एक बड़ी ऊंची जांच के लायक है। इस कंपनी में देश की आम जनता का भी काफी पैसा लगा हुआ है, और उन निजी पूंजनिवेशकों के हितों को बचाने के लिए भी यह सरकार की जवाबदेही है कि वह अडानी की जांच करे। यह जाहिर है कि मौजूदा जांच एजेंसियां सरकार के साथ इतनी घुली-मिली हैं कि वे सरकार की एक पसंदीदा कंपनी की जांच ठीक से नहीं कर सकतीं। इसलिए देश के सामने अगर इतना बड़ा आर्थिक खतरा खड़ा हुआ है, तो ऐसी जांच करवाना सरकार की एक जिम्मेदारी है। इसके पहले भी हम देख चुके हैं कि किस तरह से देश के कई बड़े-बड़े कारोबारी सरकारी बैंकों से दसियों हजार करोड़ निकालकर या तो देश छोडक़र भाग गए हैं, या उन्होंने पैसा किसी तरह बाहर भेज दिया है, और अब कानून के साथ लुकाछिपी खेल रहे हैं।

अडानी का बहुत सारा पूंजीनिवेश सरकार से ही सार्वजनिक संपत्तियों को खरीदकर किया गया है। एयरपोर्ट, बंदरगाह जैसे एकाधिकार वाले कारोबार को जिस अंदाज में अडानी ने हासिल किया है, उस पर भी देश के लोग हैरान हैं। इससे परे अडानी ने हिमाचल में सेब खरीदने जैसा काम शुरू किया है, और छोटे लोगों को इस कारोबार से बाहर कर दिया है। छत्तीसगढ़ में अडानी का नाम लगातार खबरों में बने रहता है कि वह पहले से कोयले के कारोबार में है, जिसमें उसने कई तरकीबों से हक से बहुत अधिक कोयला निकालकर बेचा है, और छत्तीसगढ़ के स्थानीय कारखाने इस कारोबार को बहुत अच्छी तरह देखते आए हैं क्योंकि वे ऐसा कोयला खरीदते आए हैं। अब छत्तीसगढ़ के हसदेव के सबसे घने जंगलों को काटकर वहां कोयला खदान से राजस्थान सरकार के लिए कोयला निकालने का काम भी अडानी को मिला है, और यह आज छत्तीसगढ़ का एक सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है जिसमें राज्य की भूपेश सरकार भी घिर गई है।

अभी कुछ हफ्तों पहले जब अडानी ने एनडीटीवी खरीदा, तो भी देश के लोग इस फिक्र में पड़ गए कि इतने बड़े-बड़े कारखानेदार अगर मीडिया खरीद लेंगे, तो फिर उसकी आजादी का क्या होगा? इससे पहले मुकेश अंबानी ने एक बड़े मौजूदा मीडिया कारोबार को एक दिन में हजारों करोड़ रूपये देकर ले लिया था, और अब अडानी। मीडिया कारोबार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गुंजाइश विवादास्पद कारोबारियों के बड़े पूंजीनिवेश के साथ जिंदा नहीं रह सकती। फिर जब ऐसे कारोबारियों पर सरकारी कृपा भी बरसने की जनधारणा हो, तो फिर ऐसे मीडिया की विश्वसनीयता क्या रह जाती है। भारत में अगर इतने बड़े-बड़े कारोबारी इतने बड़े-बड़े सरकारी पूंजीनिवेश पाकर, और दसियों हजार करोड़ रूपये का सरकारी कर्ज पाकर, और रहस्यमय तरीकों से बदनाम देशों से लाखों करोड़ का पूंजीनिवेश लाकर अगर बही-खातों में हेराफेरी करके बाजार में अपनी साख बना रहे हैं, तो फिर ऐसे कारोबार जांच का मुद्दा तो हैं ही। सरकार को खुद भी अपनी साख बचाए रखने के लिए अडानी की एक पारदर्शी जांच होने देना चाहिए। और इसके साथ-साथ एलआईसी और सरकारी बैंकों को अपनी पूंजीनिवेश और दिए हुए कर्ज को लेकर अधिक सावधान भी रहना चाहिए कि उनका खतरा कम से कम हो। आज इन सरकारी बैंकों और एलआईसी के करोड़ों ग्राहकों का नफा-नुकसान ऐसे पूंजीनिवेश से जुड़ा हुआ है।
-सुनील कुमार

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