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एक फरवरी की तारीख भारत में कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह बनी। केंद्र सरकार ने इस दिन आम बजट पेश किया, जिसके बाद शेयर बाजार में उथल-पुथल होती रही। 2 साल से कैद पत्रकार सिद्दीक कप्पन की जेल से रिहाई का आदेश मिल गया, हालांकि वे 2 तारीख को रिहा हो पाए। करीब 50 हजार वर्षों बाद एक हरे रंग का धूमकेतु एक फरवरी को भारत के आकाश से होकर गुजरा। यह अद्भुत धूमकेतु इससे पहले हिम युग में ही देखा गया था।

पाठक जानते हैं कि धूमकेतु या पुच्छल तारा पत्थर, धूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे पिंड होते हैं। यानी इनकी चमक केवल दूर से ही देखी जा सकती है, पास से देखने पर हकीकत कुछ और ही नजर आएगी। दूर से चमकते धूमकेतु एक शानदार नजारा प्रस्तुत करते हैं और कुछ क्षणों के लिए अपनी रौशनी से चमत्कृत कर गायब हो जाते हैं। 1 फरवरी को जब ये धूमकेतु भारत के आकाश से कुछ क्षणों के लिए चमकता हुआ गायब हो गया। उस वक्त भारत की जमीन पर भी धूमकेतु की तरह उभरे अडाणी समूह की आभा मद्धिम पड़ने लगी थी।

गुजरात के एक मामूली कारोबारी से दुनिया के तीसरे नंबर के अमीर बनने का सफर गौतम अडाणी ने बहुत जल्दी तय किया। पिछले आठ-नौ सालों में उनकी दौलत में अरबों का इजाफा हुआ। कोरोना लॉकडाउन के वक्त जब अच्छे-अच्छे उद्यमी हांफने लगे थे, तब अडाणी समूह के शेयर ऊंची उड़ान भर रहे थे। पिछले हफ्ते तक 127 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ गौतम अडाणी दुनिया के तीसरे सबसे अमीर इंसान थे। लेकिन अब वे लुढ़कते हुए पहले 10वें और फिर 15वें पायदान पर आ गए हैं। यह गिरावट कहां जाकर थमेगी, फिलहाल कहना कठिन है।

गुजरात के मुख्यमंत्री और अब देश के प्रधानमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी के साथ गौतम अडाणी की नजदीकी अनेक बार विपक्ष की आलोचना का केंद्र बनी है। मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल में अडाणी समूह ने तेजी से तरक्की की, और देश के कई बंदरगाह, विमानतलों पर अडाणी समूह का स्वामित्व हुआ, ऊर्जा, संचार, कृषि, कोयला अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अडाणी समूह की भागीदारी बढ़ी, तो यह आरोप स्वाभाविक तौर पर लगे कि मौजूदा सरकार का रवैया अपने करीबी उद्योपतियों के लिए पक्षपातपूर्ण है।

हालांकि सरकार ने इन आरोपों को हमेशा गलत बताया और खुद अडाणी समूह के कर्ता-धर्ता गौतम अडाणी ने भी हाल में दिए एक साक्षात्कार में इससे इंकार किया। बल्कि उन्होंने पहले की कांग्रेस सरकारों के साथ अपनी तरक्की का संबंध बताया। जिस तरह भारतीय राजनीति का झुकाव पूंजीवाद की ओर हुआ है, उसमें किसी भी विचारधारा की सरकारें रही हों, उद्योगपतियों के हितों को प्राथमिकता देने का सिलसिला जारी ही रहा है। इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि अडाणी समूह किसके कार्यकाल में आगे बढ़ा। सवाल ये है कि किसी भी उद्योग समूह पर जब कोई गंभीर आरोप लगे और इस वजह से अगर देश की अर्थव्यवस्था में अस्थिरता होने लगे, तब सरकार कोई त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है।

गौरतलब है कि पिछले महीने 24 जनवरी को अमेरिकी शोध फर्म हिंडनबर्ग ने अदानी से जुड़ी अपनी रिपोर्ट ‘अदानी ग्रुप : हाउ द वर्ल्ड्स थर्ड रिचेस्ट मैन इज़ पुलिंग द लार्जेस्ट कॉन इन कॉर्पोरेट हिस्ट्री’ जारी की, जिसमें इस समूह पर आरोप लगाए कि उसने अपने शेयरों में बड़ी गड़बड़ी कर निवेशकों को गुमराह किया है। यह रिपोर्ट अडाणी के एफपीओ आने के तीन दिन पहले जारी हुई। तो सवाल ये भी उठे कि इस वक्त ही रिपोर्ट क्यों जारी हुई। बहरहाल, इस रिपोर्ट के आते ही अडाणी समूह के शेयरों में तेजी से गिरावट देखी गई, साथ ही गौतम अडाणी की संपत्ति भी इतनी घट गई कि दो दिनों में वे अमीर व्यक्तियों की सूची में नीचे फिसल गए। अडाणी समूह ने इस रिपोर्ट को निराधार बताते हुए हिंडनबर्ग पर कानूनी कार्रवाई की बात कही, लेकिन हिंडनबर्ग ने ऐसी किसी भी कार्रवाई का स्वागत करते हुए अपनी रिपोर्ट पर कायम होने का दावा किया।

अडाणी समूह ने अपने ऊपर लगे आरोपों को भारत पर हमले की तरह बताया। हालांकि इस राष्ट्रवादी बचाव का कोई फायदा नहीं दिखा। न ही अब तक अडाणी समूह ने कोई कानूनी कार्रवाई हिंडनबर्ग पर की है। 27 जनवरी को अडाणी समूह ने 2.5 अरब डॉलर का एफ़पीओ बाज़ार में उतारा। 30 जनवरी तक एफ़पीओ को केवल 3 प्रतिशत सब्स्क्रिप्शन मिला। इसी दिन अबू धाबी की कंपनी इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी ने कहा कि वो अपनी सब्सिडियरी ग्रीन ट्रांसमिशन इन्वेस्टमेंट होल्डिंग आरएससी लिमिटेड के ज़रिए अडाणी के एफ़पीओ में 40 करोड़ डॉलर का निवेश करेगी। इसके बाद 31 जनवरी को ख़बर आई कि नॉन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर के तौर पर सज्जन जिंदल और सुनील मित्तल समेत कुछ जाने-माने अरबपतियों ने कंपनी के 3.13 करोड़ शेयर खरीदने के लिए बोली लगाई है। लेकिन 1 फरवरी को अचानक रात को अडाणी समूह ने अपना एफ़पीओ वापस लेने का ऐलान किया और कहा कि इसमें निवेशकों के लगे पैसे वापस किए जाएंगे।

अडाणी समूह ने यह कदम निवेशकों के भरोसे को प्राथमिकता देते हुए नैतिक मूल्यों के हिसाब से बताया है। लेकिन यह इतना सीधा-सरलमामला नहीं है। इसके पीछे कितने किंतु-परंतु जुड़े हैं और क्यों करोड़ों डॉलर दांव पर लगाने का फैसला अडाणी समूह ने लिया है, इसका खुलासा तभी होगा, जब हिंडनबर्ग के लगाए आरोपों पर भारत में भी पारदर्शिता के साथ जांच होगी। फिलहाल खबर है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उन बैंकों से पूछताछ शुरु की है, जिन्होंने अडाणी समूह को कर्ज दिया है। इस बीच क्रेडिट सुइस और सिटी ग्रुप वेल्थ ने मार्जिन ऋ ण के लिए अडाणी समूह की कंपनियों की सिक्योरटीज को स्वीकार करना बंद कर दिया है। मुमकिन है अन्य निजी बैंक भी इस तरह के कदम उठाएं। संसद में गुरुवार को अडाणी मामले पर विपक्ष ने चर्चा की मांग की, लेकिन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। सरकार अगर इस तरह रेत में सिर घुसाएगी, तो इससे न आऱोपों की सच्चाई सामने आ पाएगी, न बाजार को संभाला जा सकेगा।

तीन दशक पहले हर्षद मेहता प्रकरण के बाद किस तरह की उथल-पुथल शेयर बाजार में मची थी, यह मोदी सरकार को याद कर लेना चाहिए। संपत्ति के धूमकेतु चमकते और विलुप्त होते रहेंगे, लेकिन लोकतंत्र की चमक पूंजी के कारण कम न हो, यह ध्यान रखना होगा।

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