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-सुनील कुमार!!

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जिस महंगे और सरकारी रिहायशी इलाके शंकर नगर में अफसरों और मंत्रियों के बंगले हैं वहां अभी दो दिन पहले, एक आम दिन पर वायु प्रदूषण का पीएम 2.5 का स्तर 138 था, पीएम 2 का मतलब हवा में प्रदूषण के बारीक कण। एक पर्यावरण एक्टिविस्ट के मुताबिक विश्व स्वास्थ्य संगठन के पैमाने पर यह 5 होना चाहिए था, अधिकतम 40 होना चाहिए था। यह हाल कारखानों से दूर चौड़ी सडक़ों वाले इलाके का है। अब इसी शहर का एक बड़ा हिस्सा कारखानों का है, और फौलाद के बहुत अधिक प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों का है। उस इलाके में लाखों मजदूर रहते हैं, और रोजाना लाखों मजदूर कई किस्म के कारखानों में भी काम करते हैं। इसलिए वहां प्रदूषण का क्या हाल होगा इसके सरकारी आंकड़ों पर कोई भरोसा करना ठीक नहीं है। लेकिन पूरे हिन्दुस्तान में 21 ऐसे शहर हैं जो कि दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित देशों की फेहरिस्त का हिस्सा हैं। दुनिया में सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाले 20 शहरों में से 13 हिन्दुस्तान में हैं। हिन्दुस्तान में कम से कम 14 करोड़ लोग ऐसी हवा में सांस लेते हैं जो कि डब्ल्यूएचओ की बताई सीमा से दस गुना अधिक प्रदूषित है। एक वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक वायु प्रदूषण से हिन्दुस्तान में हर बरस 20 लाख समय पूर्व जन्मे बच्चों की मौत होती है। विकिपीडिया के आंकड़ों के मुताबिक वायु प्रदूषण का आधा हिस्सा उद्योगों से है, एक चौथाई से कुछ अधिक हिस्सा वाहनों के प्रदूषण से है, 17 फीसदी हिस्सा फसलों के ठूंठ जलाने से है, और 5 फीसदी हिस्सा बाकी वजहों से है।

दो दिन पहले की एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक रिपोर्ट यह कहती है कि प्रदूषित हवा में खेल रहे शतरंज खिलाडिय़ों के फैसले उससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं, वे जल्द फैसले नहीं ले पाते, गलतियां बार-बार करते हैं, और बड़ी-बड़ी करते हैं। मैनेजमेंट साईंस नाम की एक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट में शतरंज टूर्नामेंट के बंद कमरों के भीतर के प्रदूषण को नापकर वहां खेल रहे खिलाडिय़ों की चली जा रही चालों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया, तो उसका यह नतीजा निकला। आज दुनिया के बड़े-बड़े शतरंज खिलाड़ी, जिनमें भारत के कुछ दिग्गज खिलाड़ी भी हैं, वे मैच के वक्त अपने आसपास के वायु प्रदूषण को नापने लगे हैं, क्योंकि इससे उनका खेल प्रभावित हो रहा है। अब देखें तो ऐसे टूर्नामेंट तो बेहतर शहरों में, बेहतर हॉल के भीतर तकरीबन साफ हवा में होते हैं, लेकिन वहां भी अगर हवा में पीएम 2.5 जैसा प्रदूषण अधिक है, तो इससे खिलाडिय़ों के फैसलों पर सीधे-सीधे असर पड़ता है। यह रिसर्च रिपोर्ट दुनिया के एक सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, एमआईटी के एक प्राध्यापक की लिखी हुई है। इसमें पिछले 20 बरस के शतरंज मुकाबलों का अध्ययन किया गया है, और यह नतीजा निकालते हुए दूसरी वजहों, जैसे कि शोरगुल, तापमान में फेरबदल के प्रभावों को अलग कर दिया गया था।

अब इन दो बातों को मिलाकर देखें तो ऐसा लगता है कि जितने तरह का प्रदूषण लोगों की जिंदगी पर हावी है, वह लोगों के काम और फैसलों की क्षमता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रभावित कर रहा है। हिन्दुस्तान में अगर वायु प्रदूषण से हर बरस 20 लाख से अधिक जन्म पूर्व पैदा बच्चे मर रहे हैं, तो बाकी लोगों पर मौत से कम जो असर हो रहा होगा, उसकी कल्पना अधिक मुश्किल नहीं है। आज सचमुच में रईस और ताकतवर लोग, कामयाब पेशेवर लोग किसी प्रदूषित देश या शहर में रहना नहीं चाहते, अगर वहां रहना उनकी मजबूरी न हो। लोग साफ-सुथरे शहरों में रहना चाहते हैं, जहां प्रदूषण उनकी जिंदगी खत्म न करे, और उनकी जिंदगी की क्वालिटी, और काम की क्वालिटी बेहतर हो सके। हवा के साथ दिक्कत यह है कि वह शहर के एक हिस्से में अगर बहुत खराब है, तो शहर के दूसरे हिस्से में वह लाख तरकीबें आजमाने पर भी बहुत अच्छी नहीं हो सकती। इसलिए अगर किसी शहर में बहुत प्रदूषण है, तो उस शहर को हांकने वाले लोग बेहतर इलाकों में रहते हुए भी उससे पूरी तरह नहीं बच सकते। शतरंज का खेल तो बहुत तेज रफ्तार से फैसले लेने का रहता है, और एक सीमित समय के भीतर लोगों के बहुत सी चालें चलनी पड़ती हैं, इसलिए लोगों के फैसलों की तेजी को आंकना हो पाता है। लेकिन असल जिंदगी में गाड़ी चलाते हुए अचानक किसी हादसे से बचने का फैसला लेने में अगर प्रदूषण की वजह से देरी हो रही है, तो ऐसी होने वाली मौतों की वजहों को देखते हुए कोई वायु प्रदूषण के बारे में सोचेंगे भी नहीं।

ऐसा लगता है कि यह दुनिया अब बेहतर पर्यावरण के बीच जीने वाले लोगों और खराब पर्यावरण से प्रभावित लोगों के बीच एक दिखाई न देने वाला मुकाबला भी बन गई है। अगर प्रदूषित हवा से जिंदगी में तमाम वक्त एक फर्क पड़ रहा है, तो प्रदूषित शहरों की पीढिय़ां एक किस्म से साफ शहरों से पीछे रह जाने का खतरा तो रखती ही हैं। यह पूरा प्रदूषण पिछली कुछ सदियों का ही है, जब से मशीनें बनीं, कारखाने चले, और सडक़ों पर गाडिय़ां आईं। इसलिए यह सब कुछ इंसान की पिछली सौ पीढिय़ों के भीतर की ही बात है। इतने कम वक्त में दुनिया की आबादी का एक बहुत बड़ा गरीब हिस्सा बहुत गंभीर प्रदूषण का शिकार हो गया है, और अपने आर्थिक पिछड़ेपन के साथ-साथ वह सेहत के ऐसे पिछड़ेपन का भी शिकार हुआ दिखता है जो कि कुपोषण से शुरू हुआ है, और प्रदूषण के साथ पल-बढ़ रहा है। ऐसे में कारखानों और गाडिय़ों के प्रदूषण को कम करके प्रदूषण के तीन चौथाई हिस्से में से काफी कुछ घटाया जा सकता है। सरकारें हांकने वाले लोगों को यह सोचने पर मजबूर करने के लिए जानकार लोगों का इस पर लिखना जरूरी है, इसकी चर्चा करना जरूरी है, और इसके लिए अदालतों का ध्यान खींचना भी जरूरी है।

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