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-सुनील कुमार॥

भयानक भूकम्प से अभी हाल में गुजरे सीरिया में इमारतों का मलबा भी नहीं उठ पाया है, नीचे लाशें बिना कफन दफन हैं जिनकी गिनती भी नहीं हुई है, और शिनाख्त भी नहीं हुई है, और ऐसे सीरिया में आईएसआईएस नाम के इस्लामी आतंकी संगठन ने एक हमला किया है जिसमें 53 लोगों की मौत हो गई है। अगर किसी को उसके धर्म ने कुछ भला सिखाया होता तो वे लोग आज भूकम्प से तबाह लोगों की मदद में लगे रहते, अभी इसी भूकम्प में पड़ोस के टर्की में मलबे के नीचे से दस दिन बाद एक लडक़ी जिंदा निकली है, उससे सबक लेकर सीरिया में भी लोगों को जिंदा निकालने की कोशिश करते, लेकिन उन्हें अभी धर्म के आधार पर आतंकी हमले सूझ रहे हैं। और यह हमला कोई अनोखा नहीं है, अभी हफ्ते भर के भीतर ही ऐसे ही एक दूसरे हमले में इसी आतंकी संगठन ने 16 लोगों को मार डाला था, और दर्जनों का अपहरण कर लिया था। एक दूसरी खबर पाकिस्तान की है जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अभी ट्वीट किया है कि पाकिस्तान न सिर्फ आतंक को उखाड़ फेंकेगा बल्कि आतंकियों को कानून के कटघरे तक लाकर मौत की सजा दिलवाएगा। उन्होंने लिखा है कि पिछले दो दशक में इस देश ने अपना लहू बहाकर भी आतंक से मुकाबला किया है, और उसने इस दुष्टता को हमेशा के लिए खत्म करने की कसम खाई है। पाक प्रधानमंत्री वहां की कारोबारी राजधानी करांची के पुलिस मुख्यालय पर कल हुए आतंकी हमले के संदर्भ में बोल रहे थे जिसमें चार लोग मारे गए थे, और 14 जख्मी हुए थे। पाकिस्तान के आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।

जिस सीरिया से हमने आज बात शुरू की है वह सीरिया बरसों से गृहयुद्ध से गुजर रहा है, वहां के कई इलाके सरकारविरोधी विद्रोहियों के कब्जे में है। और वह इलाका भूकम्प में सबसे अधिक तबाह हुआ है। वहां तक अंतरराष्ट्रीय राहत पहुंचने में भी बहुत मुश्किल आई है। और वहां से यह मांग भी उठ रही है कि पड़ोसी टर्की से इस इलाके में राहत आने के लिए और रास्ते खोले जाएं, और सीरिया की सरकार भी इन इलाकों तक आवाजाही खोले। जब देश बरसों से चले आ रहे गृहयुद्ध, और फौजी हवाई हमलों का शिकार रहा है, और आज वहां दसियों हजार लोगों की भूकम्प से मौत का अंदेशा है, तब भी धार्मिक आतंकियों को जानलेवा हमलों के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा है। ऐसा भी नहीं कि धर्म से जुडऩे का मतलब नेक कामों से रिश्ता खत्म हो जाना ही होता है। दुनिया के बहुत से देशों में सिक्ख संगठन राहत पहुंचाने में सबसे आगे रहते हैं, और वे मुसीबत के वक्त अपने गुरुद्वारों को भी दूसरे धर्म के लोगों की प्रार्थना के लिए खोल देते हैं। एक वक्त ऐसा भी था जब सिक्ख धर्म की सत्ता को अपने कब्जे में किए हुए भिंडरावाले ने पंजाब में छांट-छांटकर गैरसिक्खों को अपने आतंकी हत्यारों से निशाना बनवाया था, लेकिन सिक्ख उससे उबर गए हैं, और वे आज दुनिया में राहत पहुंचाने में सबसे आगे शामिल रहते हैं। दूसरी तरफ आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन इस्लाम के नाम पर गृहयुद्ध और भूकम्प से मलबा हुए देश में आतंकी हमले किए जा रहे हैं।

सीरिया, और कुछ ही दूरी पर बसे हुए एक दूसरे मुस्लिम देश पाकिस्तान, इन दोनों में मजहबी आतंकियों को देखें, तो ये अपने-अपने देश की सरकारों के काबू से बाहर हैं, और धर्म के नाम पर ये अपने ही धर्म के लोगों को मार रहे हैं। अभी 20 दिन पहले पाकिस्तान के पेशावर में पुलिस के इलाके की एक मस्जिद में आतंकी आत्मघाती हमला किया गया था जिसमें हमलावर ने पुलिसवर्दी के भीतर विस्फोटकों से लैस होकर नमाज के दौरान धमाका किया, और करीब पांच दर्जन लोग मारे गए थे, और डेढ़ सौ से अधिक जख्मी हुए थे। आज पाकिस्तान में लोगों के खाने को आटा नहीं है, गाडिय़ां चलाने को पेट्रोल नहीं है, बिजली बंद है, और पिछले बरस की बाढ़ से देश की करोड़ों की आबादी अब तक उबर नहीं पाई है, लेकिन धार्मिक आतंकियों को कत्ले-आम सुहा रहा है। मतलब यह कि जिंदगी को बचाने के काम में धर्म की दिलचस्पी बड़ी सीमित रहती है, लेकिन थोक में कत्ल करने में धर्म दौड़ में सबसे आगे रहता है। हकीकत तो यह है कि पिछली सदियों में थोक में हुए अधिकतर कत्ल धर्म के नाम पर, धर्म की वजह से, धर्म के झंडे-डंडे के साथ ही हुए हैं।

दम तोड़ते देशों में मजहबी दहशतगर्दी के कत्ले-आम से बाकी दुनिया के लिए भी कुछ सबक है। एक वक्त जो देश अच्छे-भले चल रहे थे, वहां पर धार्मिक आतंकी संगठन इसलिए पनप और हावी हो पाए कि वहां लोगों के बीच धार्मिक कट्टरता पहले तो धार्मिक रीति-रिवाजों तक थी, बाद में वह कट्टरता में बदली, और फिर उसके बाद उसे हिंसा में तब्दील होने में अधिक वक्त नहीं लगा। दुनिया के जो देश आज वैज्ञानिक सोच खोकर धर्मान्धता के शिकार हो रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान और सीरिया जैसे दुनिया के बहुत से देशों का इतिहास देखना चाहिए कि एक वक्त वहां धर्म तो था, लेकिन धार्मिक-आतंकी नहीं थे। धर्म का मिजाज उसे कट्टरता की तरफ ले जाता है, यह कट्टरता उसे हिंसा की तरफ ले जाती है, और यह हिंसा उसे आतंकी बनाकर कामयाब होती है। इसलिए जिन देशों को, जिन लोगों को आज अपना धर्म सुहा रहा है, और जिन्हें अपने धर्म की कट्टरता पर भी उसे तालिबानी बुलाने पर बड़ी आपत्ति होती है, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह पहाड़ से लुढक़ती हुई चट्टान सरीखी नौबत है जिसकी रफ्तार बढ़ती चलती है, और जो आखिर में जाकर जानलेवा ही साबित होती है। धर्म को जब भी नफरत से जोड़ा जाता है, किसी दूसरे धर्म के खिलाफ उसे खड़ा किया जाता है, देशों के कानून और संविधान के मुकाबले धर्म को अधिक ऊंचा दर्जा दिया जाता है, तो वहां पर अपने-अपने धर्मों के तालिबान बनाने का रास्ता खोल दिया जाता है, यह मंजिल पाने में वक्त कम या अधिक लग सकता है। समझदार देशों के लिए यह भी समझने की बात है कि जो देश मजहबी आतंक के शिकार हैं, उन देशों की तमाम संभावनाएं इन आतंकियों से जूझने में खत्म हो जाती हैं, उनकी अंतरराष्ट्रीय साख खत्म हो जाती है, उनकी आने वाली कई पीढिय़ां अपनी संभावनाओं को छू नहीं पातीं। इसलिए धर्म नाम के इस खूंखार जानवर को इंसानी लहू चटा-चटाकर इतना इंसानखोर नहीं बना देना चाहिए कि वह स्वर्ग नाम की पाखंडी धारणा को पाने के फेर में अपने ही देश, अपने ही धर्म, अपने ही लोगों को थोक में मारने में लग जाए। धर्म और धार्मिक आतंक के बीच नंगी आंखों से दिखने वाली कोई सीमारेखा नहीं होती है, इनके बीच सलेटी रंग का एक समंदर होता है, जिसमें मामला कहां तक पहुंचा है यह पता नहीं लगता। धर्म की कातिल ताकत को समझने की जरूरत है, और सीरिया से लेकर पाकिस्तान तक, अफगानिस्तान से लेकर कई अफ्रीकी देशों तक लोग धर्म के झंडे लेकर इस ताकत को साबित कर रहे हैं, एक-एक हमले में दर्जनों और सैकड़ों लोगों को मार-मारकर।

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