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-सुनील कुमार॥

बहुत पहले किसी नासमझ ने स्कूल का निबंध लिखते हुए एक लाईन गढ़ी थी कि भारत एक कृषिप्रधान देश है, और फिर मानो यह निबंध पढऩे वाले तमाम बच्चों ने बड़े होने तक इसी लाईन को दुहराया, और फिर यह राजनीति में भी काम आने लगी कि भारत एक कृषिप्रधान देश है। आज 21वीं सदी के दूसरे दशक में पहुंचने के बाद गलती समझ में आती है कि भारत कृषिप्रधान नहीं धर्मप्रधान देश है। धर्म से अगर समय बच जाए, तो यह देश कुछ और भी कर लेता है। लेकिन इस देश के धर्मों को एक साथ कोसने या उनकी एक साथ स्तुति करने के बजाय अगर उन्हें अलग-अलग करके देखें, तो बड़ी दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। और आज की यह बातचीत इसी तस्वीर पर है जो कि लोग इस मुद्दे को पढऩे के बाद अपनी सहमति या असहमति के साथ अपने तजुर्बे और अपनी पसंद से निष्कर्षों की अपनी तस्वीर बना सकते हैं।

हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्सों में देखें तो धर्म से होने वाला प्रदूषण उस धर्म को मानने वाले लोगों की गिनती से नहीं जुड़ा रहता, वह उस धर्म के लोगों की संपन्नता से जुड़ा रहता है। जिस धर्म के लोग जितने अधिक संपन्न हैं, उनकी तीर्थयात्राएं उतनी लंबी, उतनी महंगी, उतने बार-बार होती हैं, जितना पैसा उनके पास होता है। ऐसे लोगों के धर्मस्थान बड़े-बड़े बनते हैं, बड़े खर्चीले बनते हैं, और धरती पर उनका कार्बन फुटप्रिंट उतना ही बड़ा रहता है, यानी उनसे पर्यावरण को नुकसान उतना ही अधिक होता है। ऐसे धर्म के धार्मिक आयोजन बड़े तामझाम वाले, साधन, सुविधाओं, और सामानों का उतना ही अधिक इस्तेमाल करने वाले होते हैं, और उनमें पहुंचने वाले तमाम लोग अपने साधनों का उतना ही अधिक निजी इस्तेमाल भी करते हैं। इस तरह ऐसे धर्मों का धरती पर, पर्यावरण पर, शहरी सुविधाओं पर, और सार्वजनिक जगहों पर दबाव सबसे अधिक पड़ता है। फिर यह भी है कि संपन्न तबकों के धर्म से जुड़े उत्सव संख्या में अधिक दिन चलते हैं, साल में अधिक बार होते हैं क्योंकि संपन्न लोग रोजी-रोटी कमाने की रोजाना की फिक्र से आजाद रहते हैं, उनके रहे बिना उनके कारोबार चलते रहते हैं, और उनकी टकसाल चलती रहती है। इसलिए ऐसे धर्मों के बड़े लंबे-लंबे प्रवचन होते हैं, कीर्तन होते हैं, कहीं-कहीं तो चार महीने तक धार्मिक आयोजन चलते हैं जो कि आमतौर पर भारत में परंपरागत रूप से बारिश का वक्त होता था क्योंकि इस दौरान लोग खेती में लगे रहते थे, कारोबार मंदा रहता था, और कारोबारी तबका धार्मिक आयोजनों में पूरा वक्त दे सकता था, इसलिए ऐसे ही महीनों में लंबे-लंबे चलने वाले आयोजन भी होते थे। लेकिन बाद के बरसों में जब कारखाने और कारोबार चलाने के लिए मैनेजर, मुनीम, और परिवार के जवान लोग बढऩे लगे, तो फिर लोग बुढ़ापे से पहले ही अधेड़ होने पर भी धार्मिक आयोजनों में वक्त गुजारने लगे। इनमें एक फायदा यह भी होता है कि संपन्न लोगों का जमावड़ा चाहे धर्म के लिए, धर्म के नाम पर हो, उनके बीच कारोबार की बात तो होती ही रहती है।

दूसरी तरफ अगर कोई धर्म गरीब लोगों का धर्म है तो उनके आयोजन गिनती में बहुत कम होते हैं, उनमें तामझाम बहुत कम होता है, उनके उपासना स्थल बहुत छोटे होते हैं, उनमें निर्माण बहुत कम होता है, उनमें तीर्थयात्रा न अधिक होती हैं, न लंबी होती हैं, और न महंगी होती हैं। इस तरह धरती पर पर्यावरण पर प्रति गरीब धर्मालु कार्बन फुटप्रिंट बड़ा छोटा बनता है। जितने गरीब लोग रहेंगे, वे साधन, सुविधाओं, सामानों, और सार्वजनिक जगहों का उतना ही कम इस्तेमाल करते हैं। छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज साल में एक बार गुरूघासीदास जयंती मना लेता है, और वह मानो सालभर का पर्याप्त धार्मिक आयोजन रहता है। बौद्ध लोग साल में एक बुद्ध जयंती मना लेते हैं, और मानो वह उनका पर्याप्त धार्मिक आयोजन रहता है। दूसरी तरफ जैन, सिक्ख, हिन्दुओं के भीतर के संपन्न मारवाड़ी तबके अपनी संपन्नता के चलते बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन करते हैं, जो कि कई दिन चलते हैं, इनमें भीड़ निजी गाडिय़ों से पहुंचती हैं, इनके लंबे जुलूस निकलते हैं, बड़े-बड़े मैदानों पर इनके कार्यक्रम होते हैं, लंबी तीर्थ होते हैं, और सार्वजनिक जगहों का, सडक़ों और मैदानों का ये संपन्न धर्म अधिक इस्तेमाल भी करते हैं। दूसरी तरफ भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भारी उत्साह वाले कई ऐसे धार्मिक कार्यक्रम हैं जिनमें बहुत से धर्मों के लोग जुड़ जाते हैं, और जिनका चरित्र किसी एक धर्म के लोगों की संपन्नता से जुड़ा हुआ नहीं रहता। पूरे बंगाल में दुर्गा पूजा में मुस्लिम समाज बराबरी से शामिल होता है, देश भर में गणेशोत्सव में सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल होते हैं, और होली और दीवाली जैसे त्योहार तो सभी धर्मों के लोग मनाते हैं, लेकिन इनमें और बाकी धार्मिक आयोजनों में फर्क यही है कि इनका चरित्र सांस्कृतिक और सामाजिक अधिक है, और ये किसी धर्म के विशुद्ध धार्मिक कार्यक्रम नहीं हैं।

ये बातें किसी शोध का नतीजा नहीं है, सिर्फ साधारण समझबूझ से सोची गई बातें हैं, और लोग अपने-अपने हिसाब से इन तर्कों के ठीक खिलाफ जाकर भी विश्लेषण कर सकते हैं जिनमें यहां पर लिखे गए तमाम तर्क शायद गलत भी साबित किए जा सकें। लेकिन लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या गरीब का धर्म धरती और पर्यावरण पर उसी तरह कम बोझ डालता है जिस तरह गरीब की जिंदगी धरती का सीमित इस्तेमाल करती है? इसके साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि तमाम धर्मों के लोग जब शांति और अहिंसा की बात करते हैं, तो उनके धार्मिक आयोजन क्या सचमुच बाकी लोगों के प्रति, सार्वजनिक जीवन के प्रति, शोरगुल और रौशनी की शिकायत न कर पाने वाले पशु-पक्षियों के प्रति अहिंसक हैं? सार्वजनिक सहूलियतों पर अंधाधुंध कब्जा किए बिना जो धार्मिक आयोजन किए न जा सकें, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या इनमें किफायत बरतकर उन पैसों से, उतने वक्त से, उतनी मेहनत से कुछ ऐसा किया जा सकता है जिससे कि ईश्वर की बनाई हुई कही जाने वाली दुनिया को कुछ और बेहतर बनाया जा सके?

फिलहाल अधिक नसीहत देने के बजाय यह विश्लेषण करने की सलाह देना बेहतर है कि लोग अलग-अलग धर्मों के आयोजनों की अर्थव्यवस्था के बारे में सोचें, अपने-अपने धर्म के सार्वजनिक कब्जे के बारे में सोचें, देश-प्रदेश, और शहर के कानूनों को मानने और तोडऩे के बारे में सोचें। किसी समाजशास्त्री के लिए यह एक दिलचस्प अध्ययन का मुद्दा हो सकता है कि किसी धर्म के मानने वाले लोगों की संपन्नता दुनिया को किस तरह प्रभावित करती है। यह भी सोचने की जरूरत है कि किस धर्म के धार्मिक आयोजनों को मीडिया में कितनी जगह मिलती है, और यह जगह क्या उस धर्म के लोगों के विज्ञापनदाता होने से जुड़ी हुई है? क्या विज्ञापन देने वालों के धर्म को खबरों में मजदूरों के धर्म के मुकाबले अनुपातहीन अधिक कवरेज मिलता है? क्या खबरों में जगह किसी धर्म से जुड़े हुए लोगों की गिनती से जुड़ी हुई न होकर उस धर्म के लोगों की कारोबारी ताकत से जुड़़ी होती है? और आखिर में एक दिलचस्प बात और, नियम-कानून तोडऩे की धर्म की ताकत क्या उस धर्म से जुड़े हुए लोगों के वोटों की संख्या से बनती है, या उसके लोगों के नोटों की संख्या से?

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