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कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मोदी सरनेम मामले में मानहानि के मुकदमे में सूरत की निचली अदालत ने दो साल की सजा 23 मार्च को सुनाई थी। मानहानि मामले में सबसे अधिक सजा मिलने का यह दुर्लभ उदाहरण देश ने देखा। देश तब भी हैरत में पड़ गया, जब अदालत से सजा मिलने के अगले ही दिन राहुल गांधी की संसद सदस्यता भी निलंबित कर दी गई और दोषी ठहराए जाने के कारण वे 6 सालों के चुनाव लड़ने से भी अयोग्य हो गए। खैर राहुल गांधी ने इस फैसले पर रोक लगाने को लेकर सेशंस कोर्ट में अर्जी लगाई थी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आर पी मोगेरा की अदालत ने पिछले गुरुवार को राहुल गांधी की अर्जी पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। और 20 तारीख को जब फैसला सुनाया गया तो उसमें इस अर्जी को खारिज कर दिया गया। यानी राहुल गांधी को फिलहाल कोई राहत नहीं है। प्रसंगवश बता दें कि जज मोगेरा गुजरात के नामी-गिरामी वकील रह चुके हैं। 2006 के तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में उन्होंने अमित शाह की पैरवी की थी। 2017 में गुजरात हाईकोर्ट की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन के मुताबिक उनका चयन जिला जज के लिए किया गया था। वकीलों के लिए निर्धारित 25 प्रतिशत कोटा के तहत उनका चयन हुआ था।

न्यायाधीश मोगेरा की अदालत से राहुल गांधी की अपील खारिज हो गई और अब कांग्रेस तमाम कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। संभवत: अब राहुल गांधी उच्च न्यायालय का रुख करें और अगर वहां भी उन्हें राहत न मिले तो सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा। यानी राहुल गांधी अपने लिए इंसाफ की लड़ाई जारी रखेंगे, यह तय है। वैसे भी राहुल गांधी की राजनीति कवि कुंवरनारायण की इन पंक्तियों की तरह ही है कि-

कोई फर्क नहीं
सब कुछ जीत लेने में
और अंत तक हिम्मत न हारने में।

राहुल गांधी आखिर तक हिम्मत न हारने वाले इंसान ही हैं और उनके पास अब खोने के लिए भी कुछ नहीं है। अलबत्ता पाने के लिए बहुत कुछ है। और अब कांग्रेस को उसी रणनीति के तहत काम करना होगा। उच्चतम अदालत तक जाने के विकल्प तो मौजूद हैं ही, लेकिन कांग्रेस को असली जीत तो जनता की अदालत में ही मिलेगी। वहां से उसे सत्ता का आदेश हासिल करना होगा अन्यथा ऐसी कानूनी लड़ाइयों की राजनैतिक उपयोगिता नहीं रह जाएगी। यह माना गया था कि अगर सूरत सेशंस कोर्ट के फैसले में दोषी ठहराये जाने और सजा सुनाये जाने पर रोक लग जाती तो राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता बहाल हो सकती थी। लेकिन कहीं न कहीं सब ये भी मान रहे थे कि ऐसा शायद ही हो। निचली अदालत में भी राहुल गांधी को सीधे 2 साल की सजा मानहानि के लिए सुनाई गई, जबकि अब तक मामूली दंड या जुर्माने के उदाहरण ही सामने आए हैं। जब दो साल की सजा सुनाई जा सकती है, तो उसे इतनी जल्दी खारिज कर दिया जाएगा, इसकी उम्मीद कम ही थी और ऐसा ही हुआ भी।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक सवाल इस फैसले के संदर्भ में उठाया है। श्री थरूर ने ट्वीट में लिखा- सूरत कोर्ट का कहना है कि राहुल गांधी सजा पर रोक लगाने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं दिखा पाए हैं। क्या यह आपराधिक मानहानि के लिए दो साल की सजा पाने के लिए पर्याप्त असाधारण नहीं है? संसद से अयोग्य होने के लिए बस इतना समय काफी है?

उनके इस ट्वीट के राजनैतिक निहितार्थ समझे जा सकते हैं। वैसे राहुल गांधी की सजा रद्द करने की अपील खारिज होते ही जिस तरह की टिप्पणियां भाजपा नेताओं की ओर से आई हैं, वे इस फैसले के राजनैतिक संदर्भों को खोल कर रख देती हैं। कुछ भाजपा नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी ने ओबीसी का मजाक उड़ाया था। उन्हें अब माफी मांग लेना चाहिए। आश्चर्य है कि राहुल गांधी ने देश का धन चुरा कर बाहर भागे लोगों का जिक्र किया, लेकिन भाजपा को इसमें सिर्फ ओबीसी का अपमान दिखा, चोरों और भगोड़ों की ओर से भाजपा ने आंखें मूंद लीं।

भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने कहा, ओबीसी समुदाय का अपमान करने के बावजूद, उन सभी को ‘चोर’ कहने के बावजूद, राहुल शर्मनाक रूप से उद्दंड बने हुए हैं … इससे उनके अहंकारी रवैये का पता चलता है। जबकि राहुल गांधी ने तो कोलार से जातिगत जनगणना और आरक्षण की सीमा को हटाने की मांग की है, वे पिछड़ों के हक की मांग मोदी सरकार से कर रहे हैं। क्या ओबीसी के हक की बात करना उद्दंडता मानी जाए। भाजपा के एक अन्य प्रवक्ता संबित पात्रा ने तो अदालत के फैसले को गांधी परिवार पर तमाचा ही बता दिया और कहा कि गांधी परिवार को लगता है कि वे बचकर निकल जाएंगे, वो नहीं हो पाया। अदालत के फैसले से पता चलता है कि कानून सबके लिए बराबर है। इस टिप्पणी में जिस तरह श्री पात्रा ने राहुल गांधी की जगह समूचे गांधी परिवार को लिया है, उससे पता चलता है कि वे एक प्रकरण के बहाने सभी को निशाने पर लेना चाहते हैं।

अदालत का फैसला राहुल गांधी के खिलाफ आया और सेशंस कोर्ट में अपील भी राहुल गांधी ने ही की। इसमें पूरा गांधी परिवार शामिल नहीं है, फिर सब पर टिप्पणी करने का अर्थ तो यही है कि कर्नाटक चुनाव से पहले भाजपा गांधी परिवार को निशाने पर लेना चाहती है। राहुल गांधी और गांधी परिवार, सभी कानून का सम्मान करते हैं, इस बात का पता इसी से चलता है कि वे नियमानुसार अपील कर रहे हैं और जो फैसला आ रहा है, उसे स्वीकार करते हुए अन्य कानूनी विकल्पों पर काम कर रहे हैं। लेकिन भाजपा इससे भी परेशान दिखाई दे रही है। क्योंकि कहीं न कहीं भाजपा भी ये जानती है कि न्यायिक अदालत में तो केवल राहुल गांधी पहुंचे हैं, बाकी कांग्रेस और भाजपा का मुकाबला तो जनता की अदालत में है, जहां जनादेश को स्वीकार करना ही होगा। वहां किसका घमंड टूटता है और किसे उद्दंडता का दंड मिलता है, किसके अरमानों पर तमाचा पड़ता है और किसे सत्ता संभालने का आदेश मिलता है, इसके जवाब भी आने वाले वक्त में मिल ही जाएंगे।

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