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-सुनील कुमार॥

अमेजान के जंगलों के बीच के देश कोलंबिया में एक विमान गिरा। इसमें चार बच्चे अपनी मां और दो दूसरे बालिग लोगों के साथ सफर कर रहे थे। छोटा सा विमान था, और अमेजान के सबसे घने जंगलों में गिरकर विमान चकनाचूर हो गया, इसमें सवार सभी बालिग लोगों की मौत हो गई, लेकिन इस आदिवासी परिवार के चार बच्चे अभी 40 दिन बाद जंगल में जिंदा मिले हैं। यह दुनिया का सबसे अलग-थलग, सबसे घना, और सबसे कम पहुंच वाला जंगल है, और इन बच्चों में 14,9,4, और एक साल की उम्र के बच्चे ही बचे थे, और अब एक लंबी खोज के बाद सेना ने इन्हें जंगल के बीच से ढूंढ निकाला। यह विशाल जंगल 20 हजार किलोमीटर में फैला हुआ था, और फौज के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी भी सैकड़ों की संख्या में इस तलाश में जुट गए थे। इस हादसे की खबर लगातार आते रहती थी, और जिम्मेदार लोग यह बताते रहते थे कि इनके बचने की संभावना अधिक इसलिए है कि ये आदिवासी बच्चे हैं, जंगल के पेड़ों और फलों को पहचानते हैं, और जंगल में जिंदा रहना उन्हें आता होगा। यह एक अलग बात है कि इतने घने जंगल में जानवरों से भी इन्हें खतरा था, लेकिन वे उनसे बचना भी जानते हैं, और उनके खाए गए फलों को देखकर वे समझ सकते हैं कि कौन से फल खाने लायक हैं। अमेजान के जंगलों का यह हिस्सा बहुत खतरनाक है क्योंकि यहां तरह-तरह के हिंसक जानवर, अजगर, और बहुत जहरीले सांप भी हैं। ऐसे में इन बच्चों के 14 बरस के मुखिया ने तीन छोटे बच्चों, जिनमें से एक तो एक बरस का था, उसने किस तरह सबको बचाया होगा, यह बाकी दुनिया के लिए एक करिश्मे सरीखे बात होगी।

इस घटना से यह समझने मिलता है कि जिंदगी की हकीकत को बच्चों को सिखाना कितना जरूरी है। आदिवासी बच्चे कुदरत के करीब रहते हैं, वे जंगल के खतरों को जानते हैं, नदियों के बहाव को पहचानते हैं, अलग-अलग मौसम में कब अंधेरा हो जाता है, दिशाएं कैसे पहचानी जाती हैं, ऐसे बहुत से ज्ञान और समझ से वे वाकिफ रहते हैं। दूसरी तरफ शहरी बच्चे अपना अधिक वक्त मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, और टीवी पर लगाते हैं, वे वीडियो कॉल लगाने में माहिर हो जाते हैं, वे मोबाइल फोन के कैमरे से रील बनाकर पोस्ट करने लगते हैं, लेकिन शहरी जिंदगी की ही चुनौतियों से कैसे जूझा जाए, इसकी समझ उन्हें बहुत कम रहती है। बहुत ही कम ऐसे बच्चे रहते हैं जिन्हें उनका परिवार किसी मुसीबत में पडऩे पर क्या किया जाए, यह सिखाता होगा। और तो और, अधिकतर बच्चों को पुलिस या फायरब्रिगेड, या एम्बुलेंस के नंबर भी नहीं मालूम रहते, अनजाने लोगों से किस तरह सावधानी बरतनी चाहिए, यह भी नहीं मालूम रहता। उन्हें अलग-अलग मॉल्स में कहां कौन सा प्ले-जोन है यह तो मालूम रहता है, किस मोबाइल में कौन सा नया फीचर आया है, यह भी मालूम रहता है, लेकिन किसी मुसीबत से बचने का उन्हें कोई अंदाज नहीं रहता है।

कोलंबिया की यह खबर बड़ी उम्मीद जगाती है कि ऐसे विपरीत हालात में भी ऐसे छोटे-छोटे बच्चे 40 दिन खुद होकर गुजार रहे हैं। जानकार-विशेषज्ञ लोगों का यह कहना है कि प्राकृतिक पर्यावरण की समझ और उसके साथ रिश्ते के चलते ये बच्चे बच सके। प्लेन में किसी एक किस्म का आटा था, उसे भी उन्होंने खाया, खोजी हेलीकॉप्टरों से गिराया सामान भी खाया, और बीज, फल, जड़ों और पौधों को भी खाया। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम अपने अखबार में, और यूट्यूब चैनल पर भी लगातार लोगों को यह बात सुझाते आए हैं कि लोगों को अपने बच्चों को आसपास की प्रकृति और पर्यावरण से वाकिफ करवाना चाहिए। उन्हें पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदी-तालाब, और जंगलों की खूबियां बतानी चाहिए। यह सब न सिर्फ कोलंबिया की इस ताजा मुसीबत जैसी नौबत में बचने के लिए काम की बात होगी, बल्कि जिंदगी की उनकी बेहतर समझ भी कुदरत के करीब रहकर विकसित होगी। प्रकृति से मिली जानकारी सिर्फ सूचना या ज्ञान नहीं रहती, वह एक समझ भी विकसित करती है। प्रकृति का अपना एक दर्शन होता है, और इस दर्शन से संपन्न बच्चे जिंदगी में बहुत किस्म की दिक्कतों से बचने और उबरने की खूबी हासिल करते हैं।

आज किसी के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल हो सकता है कि 14 बरस और उससे कम उम्र के तीन बच्चे एक बरस के अपने भाई-बहन को लिए हुए जंगली जानवरों वाले ऐसे जंगल में 40 दिन जिंदा रह सकते हैं। लेकिन इस घटना से लोगों को यह समझना चाहिए कि कुदरत की जानकारी और समझ कितनी जरूरी है। और यह कुदरत जरूरी नहीं है कि सिर्फ जंगलों की हो, शहरी बच्चों के लिए यह कुदरत उनके आसपास के माहौल की हो सकती है। किसी भी जगह बच्चों को स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ उनके माहौल की रोजाना की जानकारी और जरूरत से भी परिचित कराते चलना चाहिए। शहरी बच्चे शहरी सार्वजनिक जगहों के खतरों को समझ सकते हैं, और ऐसे खतरों से जूझने का रास्ता सीख सकते हैं। यह पूरी घटना एक फिल्मी कहानी की तरह लगती है, और कोई हैरानी नहीं होगी कि इनके जिंदा बच जाने के बाद अब तक कहीं कोई फिल्म-लेखक इस पर लिखना शुरू भी कर चुके हों। लोगों को अपने बच्चों के साथ यह कहानी साझा करनी चाहिए कि असल जिंदगी में बच्चे कितने किस्म के खतरों से उबर सकते हैं।

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