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कक्काजी का स्कूल

By   /  July 25, 2012  /  No Comments

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-दिलीप सिकरवार||

साहब हमने एक गलती क्या कर ली, पूरा मोहल्ला हमे घूरने लगा। जबकि यह त्रुटि उन्हीं मोहल्लेवालों की शेखी बघारने के कारण हुई। उनकी बडी-बडी बातों मे आकर हमने अपना खाने-पीने तक से समझौता करना पडा। कारण, जो तुर्रा उन्होंने हमारे दिमाग मे डाला, उससे हम तो विचलित हुए ही धर्मपत्नी उछल पडी। इस बात को वह जानते हैं किन्तु चोर की दाडी मे तिनका की भांति छिपा जाते हैं। गलती कोई और नही बस इतनी सी थी कि बडे लोगों की तरह हम भी अपने लाडले को नामी स्कूल मे पढा लिखा कर अच्छा बनाना चाहते थे। बस इसी सोच को साकार करने हम अपने गुल्लू को स्कूल ले गये। स्कूल बडा है, पहले तो गेट पर तैनात ने हमे उपर से नीचे तक घूरा। मन ही मन वह बुदबुदाया- आरटीई मे पता नही कैसे-कैसे लोग सपने देख यहां तक पहुंच जाते हैं। हमे चेहरा पढने मे महारत हासिल है सो हम भाप गये कि यह साधारण सा दिखने वाला हमारे जैसे असाधारण को नही पहचान पा रहा है। खैर, जैसे ही भीतर प्रवेश किया तो साहब बच्चे को छोड हमारा इंटरव्यू लेना शुरू हो गया। पहले तो लगा जैसे वो सब हमारी ख्याति से लाभांवित होना चाह रहे हैं। परन्तु ऐसा नही था।

स्कूल मे शासन की योजना का लाभ गरीब बच्चों को देने का वायदा जोर-शोर से किया गया था। आरटीइ के सारे कायदे पूरे होने का दंभ भरा गया था। पूछने पर पता चला कि यह नेताजी का स्कूल है। सोचों नेता जो कहते हैं, कभी उसे पूरा करते है भला! जो लिखा हुआ है वह तो स्कूल खुलने के पहले ही लिख दिया गया! मतलब यह कि एडमिशन पूरा होने का झूठ। हमने पूछा, कोई चेक करने नही आता क्या? जवाब- है किसी की मजाल। कक्काजी का स्कूल है। उन्हे रहना नही है क्या जिले मे। ठिकाने लगा देंगे। पानी भी नही मिलेगा। ऐसा इलाज करेंगे। हम बात कर थे स्कूल के प्राचार्य से। हालांकि बात-चीत से यह नही झलक रहा था। अच्छा चलिये बताइये फीस का फंडा। देखिये, फीस पूरे साल की लेंगे। आखिर स्कूल की नई बिल्डिंग तैयार हो रही है। आपका सहयोग अपेक्षित है। आशय यह कि हमारे यहां छुट्टियों का शुल्क भी लिया जाता है। बच्चें भले ही स्कूल न जायें किन्तु फीस आपको पूरी देना होगा। उसमे कोताही बर्दाश्त नही होगी।

इसके अलावा साल भर स्कूल की गतिविधियों मे आपका सहयोग लगेगा। मेडम का जन्मदिन हमारे यहां बच्चों के सहयोग से ही मनाया जाता है। इससे टीचर-स्टुडेंट के बीच गुड रिलेशन का मेसेज जाता है। और हां, बच्चें को इस सहयोग के बदले पूरे साल भर पीटा नही जाता। हालांकि एक मिनिस्टर ने पिटाई की पैरवी की है। हमारा स्टाफ उसके लिये योजना बना रहा है कि ऐसे किन बच्चों पर यह फंडा अपनाया जाये। वैसे हमारी परेशानी आरटीइ ने काफी हद तक कम की है। गरीबों के बच्चे वैसे भी मजबूत होते हैं। मंत्रीजी के प्रेरक उद्बोधन पर अमल हम इन बच्चांे पर कर सकते हैं। वैसे आप किस दायरे मे आते है? सवाल का जवाब दिये बिना ही हम अपने गुल्लू को लेकर घर आ गये।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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