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-सुनील कुमार॥

ट्विटर को लेकर हिन्दुस्तानी सरकार का जो रूख रहा है उस पर उसके एक भूतपूर्व मुखिया जैक डोर्सी और मौजूदा मुखिया एलन मस्क के अलग-अलग बयान देखने लायक हैं। जैक डोर्सी ने कुछ दिन पहले एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि किसान आंदोलन के दौरान भारत सरकार ने ट्विटर को बंद करने की धमकी तक दी थी। उनसे पूछा गया था कि दुनिया भर के ताकतवर लोग आपके पास आते हैं, और कई तरह की मांगें करते हैं, आप अगर नैतिक सिद्धांतों वाले हैं तो ऐसी नौबत से कैसे निकलते हैं? इसके जवाब में जैक डोर्सी ने कहा था कि मिसाल के तौर पर भारत ऐसा देश है जहां किसान आंदोलन के दौरान सरकार बहुत किस्म की मांगें कर रही थीं। सरकार के आलोचक कुछ खास पत्रकारों के बारे में (उनके अकाउंट बंद करने) के बारे में कहा गया था। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की ओर से कहा गया था कि भारत में ट्विटर को बंद कर देंगे, कर्मचारियों के घरों पर छापे मार देंगे, जो कि सरकार ने किया भी। उन्होंने कहा कि सरकार ने कहा कि अगर आप हमारी बात नहीं मानेंगे तो हम आपके ऑफिस बंद कर देंगे। उन्होंने कहा कि यह उस भारत में हो रहा था जो लोकतांत्रिक देश है। दूसरी तरफ ट्विटर के आज मालिक और मुखिया एलन मस्क ने अमरीका गए हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के बाद भारत में ट्विटर को दी गई चेतावनी के बारे में मीडिया के पूछे गए सवालों के जवाब में कहा कि ट्विटर के पास स्थानीय सरकारों की बातों को मानने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अगर हम स्थानीय सरकार के कानूनों का पालन नहीं करते हैं तो हम बंद हो जाएंगे, इसलिए हम जो सबसे अच्छा कर सकते हैं, वह किसी भी देश में कानून के करीब रहकर काम करना है, हमारे लिए इससे अधिक कुछ करना असंभव है नहीं तो हम ब्लॉक या गिरफ्तार हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि वे पूरी दुनिया में अमरीका के अंदाज में काम नहीं कर सकते क्योंकि हर देश के अलग कानून है।

अब भारत में किसान आंदोलन के दौरान मोदी सरकार का ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के प्रति क्या रूख था, वह तो ट्विटर के भूतपूर्व सीईओ के इस इंटरव्यू से समझ पड़ता है, और यह भी दिखता है कि जैक डोर्सी ने सरकार के सामने कम से कम कुछ हद तक टिके रहने की कोशिश की थी क्योंकि उनके बताए मुताबिक वहां छापे पडऩे की नौबत आई थी, लेकिन कारोबार का पिछला मुखिया आज कारोबार की अधिक परवाह किए बिना कई बातें कह सकता है जो कि आज का मुखिया नहीं कह सकता। दूसरी बात यह भी है कि एलन मस्क अकेले एक कारोबार वाले नहीं हैं, उन्होंने मोदी से हिन्दुस्तान में अपनी इलेक्ट्रिक कार टेस्ला के कारोबार की भी बात की है जो कि एशिया के इस हिस्से में उनकी चीन की फैक्ट्रियों का एक विकल्प बन सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि जिस दिन चीन ताइवान पर आर्थिक या फौजी हमला करने को सोचेगा, तो वह उसकी इंटरनेट केबलें भी काट सकता है, और उस वक्त निचले अंतरिक्ष में मंडरा रहे एलन मस्क के इंटरनेट उपग्रह ताइवान के काम आ सकते हैं, लेकिन ऐसा करने पर टेस्ला के चीन में चल रहे कारखानों की सेहत पर असर पड़ सकता है। इसलिए भी चीन में कारखाना चला रहीं दुनिया की दूसरी कंपनियां भारत को उसमें जोडऩा चाहती हैं, और यहां पर भी कारखाने डालना चाहती हैं। इसलिए एलन मस्क अगर मोदी के साथ मिलकर टेस्ला की बात कर रहा है, तो यह तो हो नहीं सकता कि वह ट्विटर की बात न करे। इसलिए ट्विटर के इन दो मुखिया लोगों ने जो कहा है उसे उनके कारोबारी हितों से परे भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

भारत में सरकार अमरीकी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध नहीं लगा रही थी, वह उसे भारत के लोगों के, या विदेशों के भी, अकाउंट बंद करने को कह रही थी, और इसके लिए हो सकता है कि वह भारत का कोई कानून गिना रही हो, या बिना कानून गिनाए भी ऐसा कर रही हो। अब यह ट्विटर के हाथ में था कि वह भारतीय अदालत में जाकर सरकार के ऐसे दबाव, सुझाव, या प्रतिबंध के खिलाफ अपील करती। जब कोई प्लेटफॉर्म इतना बड़ा हो जाता है, तो वह लोगों के विचारों को मौका देने के लिए लोकतांत्रिक दिखता जरूर है, लेकिन वह रहता तो कारोबार ही है। और कोई कारोबारी किसी देश की सरकार से कितना लड़े या कितना न लड़े, यह उस कारोबारी की अपनी हिम्मत पर भी रहता है, और अगर उसके कोई नीति-सिद्धांत हों, तो उस पर भी रहता है। फिर यह भी है कि जैक डोर्सी का हिन्दुस्तान में कोई और कारोबारी मामला नहीं था, और अब ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार या एलन मस्क, या दोनों की दिलचस्पी से भारत मेें टेस्ला कारों का एक बड़ा कारखाना शुरू होने की संभावना टटोली जा रही है, और ऐसे में एक कारोबारी अपनी अधिक कमाई के कारोबार के भले के लिए कम कमाई के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर समझौता भी कर सकता है। इसीलिए पूरी दुनिया में यह एक आदर्श स्थिति मानी जाती है कि मीडिया जैसे नाजुक कारोबार करने वाले लोगों के और अधिक दूसरे कारोबारी हित नहीं रहने चाहिए। हितों का अधिक टकराव मीडिया की अपनी अंदरुनी आजादी को भी खत्म कर सकता है जैसा कि अखबारों और टीवी में देखने मिलता है। और दूसरी तरफ ऐसा टकराव आज सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स के कम्प्यूटरों के इस्तेमाल से होने वाली पसंद-नापसंद पर भी हावी हो सकता है।

यह भारतीय लोकतंत्र में सरकार से परे की लोकतांत्रिक संस्थाओं के भी सोचने की बात है कि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार के दबाव की ऐसी बात सामने आती है, तो अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उस पर क्या किया जाए? ऐसा दबाव न तो मोदी सरकार ने पहली बार इस्तेमाल किया है, और न ही आखिरी बार। फिर यह भी है कि ऐसा इस्तेमाल करने वाली वह अकेली सरकार भी नहीं है, राज्यों में जहां-जहां जिसका बस चलता है, घोषित और अघोषित रूप से अभिव्यक्ति के सभी तरीकों पर दबाव का इस्तेमाल करने का लालच शायद ही कोई छोड़ पाते हैं। ऐसी नौबत उन सभ्य और विकसित, परिपक्व और गरिमामय लोकतंत्रों में ही काबू में रह सकती है, जहां लोकतांत्रिक आजादी का सम्मान होता है। हिन्दुस्तान अभी ऐसी फिक्र से कोसों दूर है, या कोसों दूर चले गया है। इसलिए यहां पर इन बातों की अब कोई परवाह नहीं है, और ट्विटर के कारोबारी-मालिक से हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की फिक्र की उम्मीद नाजायज होगी, यहां के लोकतांत्रिक संस्थान खुद यह सोचें कि अपने घर को कैसे सुधारें।

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