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पत्रकारों के घोंसले और पिंजरे.. MCD पर चला झाड़ू..

-सुनील कुमार।।

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच का एक फैसला लोगों को विचलित कर रहा है जिसमें चार बरस की बच्ची से बलात्कार करने वाले एक आदमी की सजा को उम्रकैद से घटाकर 20 बरस कर दिया गया है, और इसके पीछे हाईकोर्ट के दो जजों ने यह तर्क दिया है कि यह बलात्कारी इतना दयालु था कि उसने बलात्कार के बाद इस बच्ची को मार नहीं डाला। अब सोशल मीडिया पर लोग जजों के इस फैसले के खिलाफ लिख रहे हैं, और खासकर फैसले की जुबान में दयालु (अंग्रेजी में लिखा गया है काइंड) शब्द के इस्तेमाल ने लोगों को बहुत आहत किया है। जजों के इस फैसले के पीछे उनके अपने कानूनी और तकनीकी तर्क हो सकते हैं, हो सकता है कि न्याय के पैमानों पर सजा घटाना जायज भी हो, लेकिन फैसले की यह भाषा लोगों की भावनाओं को सचमुच ही चोट पहुंचाने वाली है, और इससे साबित होता है कि सच को बहुत क्रूर तरीके से लिखा जाना जायज नहीं होता। इस एक शब्द दयालु को नहीं लिखा जाता, सिर्फ यह लिख दिया जाता कि चूंकि उसने इस बच्ची को जिंदा छोड़ दिया था, इसलिए वह अधिकतम सजा में कुछ कटौती का हकदार माना जा रहा है, तो भी ठीक रहता। यह खतरा तो उस वक्त से दिख रहा था जबसे बच्चों के साथ बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा की चर्चा शुरू हुई थी, और जानकार-समझदार लोग यह मानकर चल रहे थे कि जब मौत की ही सजा मिलनी है तो बलात्कारी बलात्कार के शिकार बच्चों को मार भी डालेंगे क्योंकि मारने की सजा भी फांसी होगी, और बलात्कार की सजा भी। इसलिए अब जब अदालत नया कानून तो नहीं गढ़ सकती, फांसी की सजा के प्रावधान को भी नहीं हटा सकती, तो वह अधिकतम सजा की जगह उससे कुछ कम सजा तो कर सकती है, और इस अदालत ने किया वही है, सिर्फ एक विशेषण ने जजों को आलोचना के कटघरे में खड़ा कर दिया है।

जुबान की ऐसी धार, या बोलने के अंदाज की गैरजरूरी तल्खी बहुत से लोगों की अच्छी और भली नीयत को भी चौपट कर देती है। कुछ लोग दूसरों का काम करते हैं, अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, या उससे भी आगे बढक़र करते हैं, लेकिन यह करते हुए वे इतनी कड़वी जुबान चलाते हैं कि जिनका काम होता है, वे भी कोसते हुए लौटते हैं। यह बात शब्दों को लेकर भी होती है, और बोलने के तरीके को लेकर भी। इसीलिए बहुत से लोग यह कहते हैं कि जुबान दुधारी तलवार सरीखी रहती है, वह ऑपरेशन के औजार की तरह इलाज भी कर सकती है, और किसी तलवार की तरह जख्म भी कर सकती है, इसलिए किसी भी धारदार चीज का इस्तेमाल सम्हलकर ही किया जाना चाहिए।

लोगों की भाषा में दो तरह की बातें रहती हैं, एक तो तथ्य रहते हैं, और दूसरे विशेषण। जिम्मेदार लोग तथ्यों को तो खींच-तानकर फिर भी सही लिख देते हैं, लेकिन विशेषण इस्तेमाल करते हुए लोगों के पूर्वाग्रह हावी हो जाते हैं, और उनकी नीयत राज करने लगती है। नतीजा यह होता है कि किसी बात को पूरी तरह सच लिखते हुए भी कुछ लोग उसके साथ जो विशेषण लिखते हैं, वे सच पर एक धुंध बनकर छा जाते हैं, और उसकी विश्वसनीयता को घटा देते हैं। इसलिए विशेषणों का इस्तेमाल सोच-समझकर ही किया जाना चाहिए। भाषा की बारीकियों से भी सारे लोग वाकिफ नहीं रहते हैं, जो लोग किसी भाषा से कमाते-खाते हैं, वैसे अखबारनवीस या लेखक भी विशेषणों के इस्तेमाल में कई बार चूक कर जाते हैं, और तथ्यों को लिखने को लेकर उनकी पूरी ईमानदारी भी शक के दायरे में आ जाती है।

दरअसल किसी भी भाषा में विशेषण एक नाजुक चीज रहते हैं, और एक ही किस्म की खूबी या खामी के लिए अलग-अलग अनुपात वाले बहुत से विशेषण रहते हैं, जिनके बीच बारीकी से फर्क कर पाना या तो भाषा की जानकारी से मुश्किल हो जाता है, या फिर लोगों के पूर्वाग्रह उन्हें गलत विशेषण छांटने की तरफ ले जाते हैं। यह बात खासकर अखबारनवीसी या दूसरे किस्म के विश्लेषणों में अधिक नाजुक हो जाती है क्योंकि कई जगहों पर सिर्फ तथ्यों से ही सही तस्वीर बन सकती है, और उनके साथ विशेषणों का कम से कम इस्तेमाल करके बात पूरी करना एक मुश्किल काम होता है। अखबारों, और अब उनसे अधिक गैरजिम्मेदार दूसरे किस्म के, मीडिया कहे जाने वाले, समाचार-माध्यमों में जहां-जहां रिपोर्ट लिखने या विश्लेषण करने वाले अपने तथ्यों को लेकर कमजोर रहते हैं, वहां पर वे तथ्यों की जगह विशेषणों से काम चलाने की कोशिश करते हैं। यह बात लिखने या बोलने की विश्वसनीयता को गड्ढे में ले जाती है, लेकिन लिखने-बोलने वालों का काम आसान कर देती है। तथ्यों को ढूंढने में लंबा समय लग सकता है, उनका विश्लेषण बड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन अपने मन की बात को विशेषणों से सजाकर पेश कर देना सबसे ही आसान होता है। इसलिए अखबारी लिखने में जहां कहीं विशेषण दिखें, उसे कमजोरी भी मानना चाहिए, और पूर्वाग्रह से लदी हुई नीयत भी।

हिन्दुस्तान में हिन्दी या हिन्दुस्तानी लिखने वालों को प्रेमचंद की जुबान से यह समझना चाहिए कि किस्से-कहानियों में भी विशेषणों को कितनी बारीकी से और कितने संतुलन से इस्तेमाल किया जा सकता है। उनका लिखा हुआ तो अधिकतर कहानियों और उपन्यासों की शक्ल में है लेकिन वहां भी मुद्दे की जरूरत से परे जाकर, संतुलन और आपा खोकर प्रेमचंद विशेषणों का इस्तेमाल नहीं करते। अखबारनवीसों में से बहुतों को इस तरह का आपा सीखने के लिए उन्हें पढऩा चाहिए। और फिर आज के वक्त में लिखने का एकाधिकार महज अखबारनवीसों, और उनकी दूसरे किस्म की नस्लों का नहीं रह गया है, बल्कि सोशल मीडिया पर हर कोई लिखने लगे हैं, हर मुद्दे पर लिखने लगे हैं, इसलिए लिखना जिनका पेशा नहीं है, उन्हें भी बारीकी और संतुलन को सीखना चाहिए। और जहां से हमने आज की बात शुरू की थी, वहां पर लौटें तो हाईकोर्ट के जज भी एक विशेषण, दयालु से बचकर, अपने आपको आलोचना से बचा भी सकते थे, और बड़ी आसानी से सजा में कटौती का यह फैसला दे भी सकते थे।

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