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भारत जातिवाद की लाइलाज बीमारी से सदियों से पीड़ित है, लेकिन विडबंना ये है कि इस बीमारी को किसी ताज की तरह सिर पर गर्व से समाज ढो रहा है। इस बीमारी के कारण हमारे समाज के कई सद्गुण गल कर सड़ गए हैं, मगर फिर भी जाति को हम सीने से चिपकाए घूम रहे हैं।

आधुनिक होते भारत के साथ इस विकृति से हमें छुटकारा पाना चाहिए था, मगर अब सियासत में जाति व्यवस्था वोट बैंक का मुनाफा देती दिख रही है, तो इसका लाभ लूटने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। अब आरक्षण की व्यवस्था भी सियासी दलों की भेंट चढ़ रही है। भारत के संविधान के तहत अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों को शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 49.5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इस व्यवस्था का आशय सामाजिक न्याय से था।

सैकड़ों सालों से समाज के एक बड़े वर्ग को महज उनकी जाति के कारण पढ़ने और आगे बढ़ने के अवसरों से जिस तरह वंचित रखा गया, उस अन्याय की भरपाई तो किसी तरह नहीं हो सकती, लेकिन जो गलती हमारे पूर्वजों से हुई, उसे सुधारने का मौका आरक्षण व्यवस्था से मिलता है। जिन तबकों को समाज में सवर्णों से नीचे माना गया, उन्हें जबरदस्ती पीछे रखा गया, अब पढ़ने और नौकरियों में उन्हें थोड़ा सा आरक्षण देकर बराबरी पर आने का संवैधानिक तरीके से मौका दिया जा रहा है। लेकिन इसमें भी सवर्ण तबके को यह बात चुभती रही कि इन तबकों को यह थोड़ी सी अतिरिक्त सुविधा क्यों दी जा रही है।

दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों यानी ओबीसी के लोगों की प्रतिभा को भी आरक्षण का उलाहना देकर अपमानित करने का मौका सवर्ण तबके के बहुत से लोग ढूंढते रहे। उन्हें आरक्षण की मलाई खाने वाला कहा गया, लेकिन इन लोगों से कभी यह कहते नहीं बना कि जिन्हें आज यह तथाकथित मलाई खाने मिल रही है, उन्हें बरसों-बरस समाज की कितनी नफरत और हिकारत सहनी पड़ी है। जाति के नाम पर अपमान का यह सिलसिला आज भी रुका नहीं है। और अब सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से यह सवाल खड़ा हो गया है कि जिसे सामाजिक न्याय के नाम पर उठाया गया कदम बताने की कोशिश की जा रही है, आखिर में उससे न्याय होगा या समाज फिर से अन्याय के लिए रास्ता बना लेगा।

दरअसल मौजूदा एनडीए सरकार ने भारत के संविधान में 103वां संशोधन करके सामान्य वर्ग के ग़रीब छात्रों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय खंडपीठ ने बहुमत से मुहर लगा दी है। पांच जजों में से तीन ने आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने के पक्ष में जबकि दो ने इसके विरोध में फ़ैसला दिया है, जिनमें भारत के प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित भी शामिल हैं।

आरक्षण की व्यवस्था को जाति की जगह आर्थिक आधार पर करने की वकालत समाज में काफी पहले से होती आई है। इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा होता था कि क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं होगा। क्योंकि इंदिरा साहनी बनाम भारतीय संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की खण्डपीठ ने यह तय किया था कि आरक्षण की सीमा किसी भी सूरत में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इसलिए जब भी अजा, जजा और ओबीसी के लिए आरक्षण की सीमा किसी तरह बढ़ाने की बात होती, तो सर्वोच्च अदालत के इस फैसले को सीमारेखा की तरह दिखाया जाता कि हम उसके पार नहीं जा सकते।

मगर अब आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है, तो फिर यह बहस का विषय बन गया है कि अब 50 प्रतिशत की सीमा लांघी जाएगी और अदालत के पुराने फैसले को पलटा जाएगा। अगर आरक्षण की सीमा बढ़ाई नहीं जाती है तो फिर उसी 50 प्रतिशत में समाज के सभी वंचित, शोषित, पीड़ित लोगों को न्याय किस तरह मुहैया कराया जाएगा।

अगर गरीबी के नाम पर ही प्राथमिकता तय होनी है, तो क्या यह अंदेशा बना नहीं रहेगा कि यहां भी पहला मौका सवर्ण तबके को ही मिलेगा। क्योंकि हमारे समाज की मानसिकता आज भी ब्राह्मणों को देवता मानने की है, इसलिए वो गरीब हो, अकुशल हो, तब भी उसके चरण स्पर्श करने में बहुतों को कोई संकोच नहीं होता, लेकिन कितने दलितों के लिए हमने दलित देवता जैसे शब्द सुने हैं।

दलित अगर अमीर हो, तब भी उसे संशय से ही देखा जाता है कि आखिर वह इतना सक्षम बना कैसे। इस मानसिकता से भले आज बहुत से लोग ऊपर उठ चुके हों, लेकिन जाति प्रथा जब तक बनी रहेगी, तब तक सवर्णों और दलितों, पिछड़ों के बीच भेदभाव भी कायम रहेगा। इस भेदभाव की मानसिकता के साथ आर्थिक आधार पर आरक्षण क्या न्यायसंगत तरीके से लागू हो पाएगा। क्या पहला मौका गरीबों में सवर्णों को नहीं मिलेगा। इस तरह फिर से हम उसी मोड़ पर पहुंच जाएंगे, जहां से आगे बढ़ने की शुरुआत हमारे नीति नियंताओं ने आजादी के बाद की थी।

हमें अगर कैंसर का इलाज करना है तो जुकाम की दवा देकर इलाज का दिखावा करने से बचना होगा। अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण को सामाजिक न्याय की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, तो फिर यहां दो गंभीर समस्याओं को आपस में मिलाया जा रहा है। एक है गरीबी और दूसरी है सदियों का अन्याय। गरीबी एक गंभीर समस्या है और इसे दूर करने की जिम्मेदारी सरकार की है, कि वह अधिक रोजगार सृजित कर लोगों को सम्मान के साथ जीने का मौका दे।

जिन योजनाओं को खैरात बांटने की तरह चालू किया गया है, उन्हें लंबी अवधि की न कर, यह कोशिश करे कि लोगों को सरकार से ऐसी खैरात की जरूरत ही न पड़े। और दूसरी समस्या सामाजिक अन्याय की है, जिसके लिए आरक्षण के प्रावधान का इस मक़सद से किया गया था कि यह समाज में पिछड़ेपन को दूर करने में कारगर साबित होता। जब समाज में हर किसी को बराबरी से पढ़ने और आगे बढ़ने के मौके मिलते और इनके साथ ही सम्मान भी हासिल होता तो आरक्षण की जरूरत भी खत्म हो जाती। मगर अभी ऐसा नहीं हुआ है, इसलिए आरक्षण की व्यवस्था भी बनी हुई है। अब आर्थिक आधार पर आरक्षण किस तरह समाज में बराबरी या गैरबराबरी लाएगा, ये देखना होगा।

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