एक थी श्रद्धा, एक था हैवान

-सर्वमित्रा सुरजन।।

हमारे आसपास जितने अधिक स्मार्ट कहे जाने वाले गैजेट्स बढ़ते जा रहे हैं। हम उतने अधिक आत्मकेन्द्रित और असहिष्णु होते जा रहे हैं। आस-पास की घटनाओं से अधिक हमें सोशल मीडिया पर वायरल हुई चीजों की खबर रहती है। शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी हो चुकी है, जिसमें साहित्य, मानविकी, कला जैसे विषय़ों को दोयम दर्जा दिया जा चुका है और विज्ञान, गणित, कम्प्यूटर, प्रबंधन जैसे विषयों को सफलता की कुंजी बताया जाता है। जबकि व्यक्ति के समेकित विकास के लिए सभी विषयों का महत्व है।

हर प्रेम कथा सुखांत या दुखांत पर ही खत्म नहीं होती। प्यार, धोखा, हत्या, स्त्री और पुरुष संबंधों की एक टूलकिट ये भी है, जो सदियों से चली आ रही है। राजा का अंगूठी देकर किसी वनकन्या को अपने इंतजार के लिए विवश करना और अंगूठी खो जाए, तो उसे अपनाने से इंकार करना, किसी परस्त्री को भेस बदलकर धोखा देना और बाद में इल्जाम लगाकर उसे ही पत्थर की मूरत में बदलने के लिए अभिशप्त छोड़ना, ऐसे प्रसंग हमारी प्राचीन कथाओं में वर्णित हैं। पुरुषों द्वारा छली गई या अपमानित स्त्रियों के लिए अवतारों का आना भी इन कथाओं का हिस्सा रहा है।

हालांकि असल जिंदगी में अवतार नहीं आते और न ही चमत्कार घटित होते हैं। परस्पर संबंधों में धोखे के प्रसंग पहले भी हुआ करते थे, अब भी होते हैं। लेकिन अब इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में इसके उदाहरण खौफनाक तरीके से पेश होने लगे हैं। ऐसा ही एक भयावह प्रसंग सामने आया है दिल्ली से, जहां मेहरौली में आफताब नाम के एक शख्स ने अपनी महिला मित्र श्रद्धा की न केवल हत्या कर दी, बल्कि उसके शव के लगभग 35 टुकड़े कर के, उन्हें फ्रिज में छिपा कर रखा। इन टुकड़ों को इंसान की शक्ल वाला यह हैवान अलग-अलग जगहों पर फेंका करता था। छह महीने पहले हुई इस हत्या का खुलासा अभी कुछ दिन पहले हुआ। जब श्रद्धा के पिता ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट महाराष्ट्र में दर्ज कराई। दरअसल श्रद्धा और आफताब दोनों महाराष्ट्र के रहने वाले थे।

श्रद्धा के मां-बाप अलग हो चुके थे और श्रद्धा की आफताब से मुलाकात एक डेटिंग ऐप पर हुई। वो एक कॉल सेंटर में काम करती थी और आफताब से दोस्ती के बाद उसके साथ रहना चाहती थी। श्रद्धा की मां ने इस बात का विरोध किया, तो वह उनकी अनुमति के बिना ही आफताब के साथ रहने चली गई। आफताब के परिजन भी इस रिश्ते के खिलाफ थे। बताया जा रहा है कि दोनों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे, एक बार श्रद्धा ने अपनी मां को बताया था कि आफताब उसके साथ मारपीट करता है। हालांकि श्रद्धा तब भी उससे अलग नहीं हुई। इस बीच श्रद्धा की मां की मृत्यु हुई। बाद में श्रद्धा के पिता ने भी उसे आफताब के साथ रहने से मना किया।

लेकिन उसने तब भी उनकी बात नहीं मानी। परिजनों के विरोध के चलते आफताब और श्रद्धा मुंबई से दिल्ली आ गए और यहां आने के बाद श्रद्धा ने जब आफताब पर बार-बार शादी करने का जोर डाला तो मई में आफताब ने श्रद्धा की गला दबाकर हत्या कर दी। इस बीच उसने श्रद्धा का इंस्टाग्राम अकाउंट चालू रखा, ताकि उसके परिचितों को यह अहसास रहे कि वह जिंदा है। लेकिन दो महीने तक जब श्रद्धा से कोई बात नहीं हुई, तो उसके एक दोस्त ने इसकी सूचना श्रद्धा के पिता को दी और फिर उन्होंने महाराष्ट्र में इसकी शिकायत दर्ज कराई। पुलिस श्रद्धा की तलाश में दिल्ली तक पहुंची और फिर आफताब पकड़ में आया। पुलिस की गिरफ्त में आते ही उसने सारा सच उगल दिया और अब मामले की सघन जांच की जा रही है।

इस खौफनाक घटना के सामने के बाद समाज में तरह-तरह के विमर्श शुरु हो गए हैं। भारतीय समाज में प्रेम संबंधों के लिए नजरिया सकारात्मक कभी नहीं रहा, और उस पर लिव-इन यानी बिना विवाह के साथ में रहना भी नैतिकता के स्वघोषित ठेकेदारों को खटकता है। जो लोग इस तरह से रहते हैं, उन्हें अक्सर रिश्तेदारों और परिचितों से अपने संबंधों को छिपाना ही पड़ता है। अगर प्रेम प्रसंग अंतरजातीय या दो धर्मों के लोगों के बीच हो, तब दिक्कतें और अधिक बढ़ जाती हैं।

आफताब-श्रद्धा प्रसंग में ये तीनों ही बातें शामिल थीं। उनके दो अलग धर्मों के होने के कारण अब इसे लव जिहाद का एंगल देने की भी कोशिशें शुरु हो गई हैं। अगर इसमें सफलता मिल गई तो आगामी कई विधानसभा चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए एक मुद्दा तैयार रहेगा। हालांकि इस समूचे घटनाक्रम के जो मनोवैज्ञानिक पहलू हैं, उन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

प्रेम प्रसंग में धोखे और फिर कत्ल का शिकार बनी श्रद्धा पारिवारिक टूटन की भुक्तभोगी रही है। संभवत: इसलिए वह मानसिक संबल तलाशने में एक ऐसे व्यक्ति पर भरोसा कर बैठी, जिसके इरादे कभी नेक नहीं थे। श्रद्धा को यह अहसास हो गया था कि आफताब उसके साथ सही व्यवहार नहीं कर रहा है, फिर भी उससे अलग होने की हिम्मत उसने नहीं दिखाई, शायद वह रिश्तों को टूटते नहीं देखना चाहती थी। यह कितनी अजीब बात है कि श्रद्धा के पिता को दो महीने तक पता ही नहीं चला कि वह गायब है।

अगर उसके दोस्त ने चिंता नहीं दिखाई होती, तो न जाने कब तक यह हत्याकांड छिपा ही रहता। अभी यह पता नहीं है कि श्रद्धा के घर में लड़कियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है, लेकिन हिंदुस्तान में बहुत सी लड़कियां शादी के पहले या शादी के बाद या प्रेम प्रसंगों में केवल इसलिए प्रताड़ित और पीड़ित होती हैं, क्योंकि अपने घर में वे भेदभाव के साथ पाली जाती हैं और बाद में अपने हक के लिए आवाज उठाने की हिम्मत उनमें नहीं रहती है।

इस जघन्य हत्याकांड का आरोपी आफताब पूनावाला है, तो उसके नाम के आधार पर ही मामले का हिंदू-मुस्लिम एंगल निकाल लेना आसान है। इस गंभीर अपराध का खुलासा होते ही सोशल मीडिया पर लव जिहाद को लेकर संदेशों की बाढ़ आ गई।

दक्षिणपंथी ट्रोल आर्मी श्रद्धा की हत्या की आड़ में मुस्लिमों को निशाने पर लेने लगी। कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार के विरोध में कुछ नामी-गिरामी हस्तियों ने ट्वीट किया था, अब उन लोगों की तस्वीर दिखाते एक ट्रोलर ने पूछा कि इस बार ये लोग चुप क्यों हैं। यह सोच कितनी घिनौनी है कि एक हिंदू युवती की हत्या पर एक अल्पसंख्यक समुदाय की बच्ची के साथ हुए बलात्कार की याद दिलाई जा रही है।

दोनों ही घटनाएं भयावह हैं और तुलना ही करनी है तो इनमें हुई हैवानियत की करनी चाहिए। लेकिन यहां दो घटनाओं पर सामने आई प्रतिक्रियाओं की तुलना की जा रही है। जबकि जिन लोगों ने कठुआ कांड पर गुस्सा और दुख जाहिर किया था, वो इस घटना से भी परेशान हैं। क्योंकि कोई भी सामान्य मानसिकता का व्यक्ति एक स्त्री, एक बच्ची के साथ हुए अनाचार को देखकर विचलित हुए बिना नहीं रह सकता। इसमें धर्म का कोण तलाशने वाले दरअसल मानसिक व्याधि का शिकार हैं, क्योंकि उन्हें स्त्री की पीड़ा नहीं दिखाई देती, अपराधी का धर्म नजर आता है।

आरोपी आफताब पूनावाला की क्रूरता की चर्चा की जा रही है कि कैसे उसने अपनी प्रेमिका को मार कर उसके 35 टुकड़े कर दिए। लेकिन इस हैवानियत का उसके धर्म से कोई लेना-देना नहीं हो सकता।

1995 में नैना साहनी को उनके पति सुनील शर्मा ने हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर तंदूर में डाल दिए थे, 12 साल पहले देहरादून में अनुपमा गुलाटी की हत्या कर उनके पति राजेश गुलाटी ने लाश के 72 टुकड़े कर डीप फ्रिजर में भर दिए थे। दो साल पहले इंदौर में हर्ष शर्मा ने अपनी पत्नी अंशु शर्मा को कुत्ते की जंजीर से बांधकर मार दिया था। ये तो कुछ कुख्यात प्रसंग हैं, जो चर्चा में आ गए। ऐसे न जाने कितने प्रसंग घटित होते हैं, जब यौन हिंसा की सारें हदें पार कर दी जाती हैं, बलात्कार के बाद पिशाचों की तरह पीड़िता को मार दिया जाता है, दहेज के लिए घर की बहू के साथ शारीरिक हिंसा होती है। हैवानियत के इन कामों को धर्म के तराजू में नहीं तौला जा सकता है।

दरअसल ऐसी तमाम घटनाएं हमारे समाज में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति और संवेदनहीनता में बढ़ोतरी की परिचायक हैं। हमारे आसपास जितने अधिक स्मार्ट कहे जाने वाले गैजेट्स बढ़ते जा रहे हैं। हम उतने अधिक आत्मकेन्द्रित और असहिष्णु होते जा रहे हैं। आस-पास की घटनाओं से अधिक हमें सोशल मीडिया पर वायरल हुई चीजों की खबर रहती है।

शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी हो चुकी है, जिसमें साहित्य, मानविकी, कला जैसे विषय़ों को दोयम दर्जा दिया जा चुका है और विज्ञान, गणित, कम्प्यूटर, प्रबंधन जैसे विषयों को सफलता की कुंजी बताया जाता है। जबकि व्यक्ति के समेकित विकास के लिए सभी विषयों का महत्व है। साहित्य और मानविकी जैसे विषय संवेदनशीलता के साथ चीजों का विश्लेषण करने की समझ विकसित करते हैं। इनके बिना जीवन में रूखापन रहता है। आजकल जिस तरह की वेब सीरीज़, फिल्में और धारावाहिक बन रहे हैं, उनमें भी सब कुछ वास्तविक दिखाने के फेर में ऐसे दृश्य भर दिए जाते हैं, जो अपरिपक्व मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ते हैं।

मेहरौली हत्याकांड में केवल धार्मिक कोण तलाश कर राजनैतिक फायदा लेने की कोशिश करने वालों को कुछ पल ठहरकर इसके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए। क्योंकि ऐसी घटनाओं का समाज पर सीधा असर पड़ता है और हम सब इसी समाज का हिस्सा हैं।

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