बड़ी कंपनियों में छंटनी..

भारत में बेरोजगारी इस वक्त एक ऐसी समस्या बनी हुई है, जिसके दुष्परिणाम देखते हुए भी उसके समाधान के लिए सरकार कोई मजबूत कदम उठाते नहीं दिख रही है। चुनावी घोषणापत्रों या विभिन्न राजनैतिक मंचों से दिए जाने वाले भाषणों में बेरोजगारी को एक जरूरी बिंदु की तरह शामिल किया जाता है, ताकि लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया जा सके। और ऐसा लगता है कि इसे सुलझाने में सरकार की कोई दिलचस्पी भी नहीं है, क्योंकि जब तक बेरोजगारी बनी रहेगी, लोग मजबूर बने रहेंगे और उनकी मजबूरी का फायदा उठाना आसान होगा।

जैसे बेरोजगार व्यक्ति का झुकाव मुफ्त वाली घोषणाओं की ओर पहले होगा, तरह-तरह की छूट और कल्याणकारी योजनाओं का लाभार्थी बनने में उसकी दिलचस्पी होगी, उसके आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ करने में आसानी होगी। शायद इन्हीं वजहों से बेरोजगारी का दीर्घकालिक उपाय नहीं तलाशा जाता। सरकार की ओर से रोजगार की गारंटी न मिलने और इसके साथ ही दुनिया में आईटी यानी सूचना तकनीकी के क्षेत्र में ऊंचे वेतनमान के साथ रोजगार की संभावनाओं ने अनेक युवाओं को इस क्षेत्र में किस्मत आजमाने के लिए प्रेरित किया। देश में नौजवानों की एक बड़ी जमात इस वक्त देश-विदेश की दिग्गज कंपनियों में कार्यरत है। लेकिन अब इस क्षेत्र से भी रोजगार को लेकर अच्छी खबरें नहीं आ रही हैं।

दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन अपने कम से कम 10 हजार कर्मचारियों की छंटनी करने की तैयारी में है, इस आशय की रिपोर्ट सोमवार को अमेरिका के अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने दी है। इस छंटनी से सबसे अधिक अमेजन के अलेक्सा, खुदरा विभाग और मानव संसाधन विभागों पर पड़ सकता है। अमेजन में नौकरियों से निकाले जाने की यह आशंका उस वक्त जतलाई गई है, जबकि दुनिया की कई छोटी-बड़ी कंपनियां अपने आर्थिक बोझ को कम करने के लिए लगातार कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं।

ट्विटर पर मालिकाना हक मिलते ही एलन मस्क ने कम से कम आधे कर्मचारियों को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके बाद फेसबुक की मूल कंपनी मेटा ने करीब 13 प्रतिशत यानी 11 हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की घोषणा की थी। खास बात ये है कि मेटा के इतिहास में अब तक नौकरियों में इतनी बड़ी कटौती नहीं हुई थी। कर्मचारियों की छंटनी के इस ऐलान के बाद मार्क ज़करबर्ग ने कहा था कि ‘यह मेटा के इतिहास का सबसे मुश्किल फ़ैसला था।’

बेशक एक झटके में हजारों लोगों को बेरोजगार कर देने का फैसला आसान नहीं रहा होगा। लेकिन मार्क जकरबर्ग या एलन मस्क या जेफ बेजोस जैसे लोगों के लिए यह केवल एक पल की परेशानी हो सकती है। अपनी व्यापारिक बुद्धि और आईटी क्षेत्र के प्रतिभाशाली लोगों की मेधा के दम पर इन लोगों ने हर दिन करोड़ों की कमाई की है। इन धनकुबेरों के लिए किसी को नौकरी पर रखना और फिर अचानक निकाल देना भी व्यापारिक सौदेबाजी की तरह ही होता है। मगर इन फैसलों से असली प्रभावित तो वो लोग होते हैं, जिनकी नौकरी जाने से पैरों तले जमीन ही चली जाती है। लाखों के पैकेज मिलने पर आईटी क्षेत्र के लोगों की जीवनशैली भी खर्चीली हो जाती है और जब एकदम से नौकरी चले जाए, तो फिर उन खर्चों को पूरा कर पाना असंभव होता है और उस जीवनशैली को छोड़ना भी मुश्किल हो जाता है। मगर दुनिया के भीतर आभासी दुनिया खड़ी करने का कमाल करने वालों के लिए कड़वी हकीकत यही है।

2008 की वैश्विक मंदी के दौरान दुनिया इस हकीकत से रूबरू हो चुकी है, मगर उस दौर से कोई सबक शायद नहीं लिया गया। अब दुनिया में एक बार फिर आर्थिक मंदी का खतरा मंडरा रहा है। कोरोना की महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में गिरावट आई है। देशों की वित्तीय व्यवस्था तो बिगड़ी ही है, विशालकाय कंपनियों की भी स्थिति खराब हुई है और इसलिए अब छंटनी के फैसले लिए जा रहे हैं। अभी आईटी क्षेत्र में छंटनी नजर आ रही है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, जल्द ही यह स्थिति अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकती है और अधिक कंपनियों में छंटनी हो सकती है।

वैसे बताया जा रहा है कि अमेज़न में नौकरियां जाने की रिपोर्ट कंपनी के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस के सीएनएन को दिए उस इंटरव्यू के बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि वो अपनी 124 अरब डॉलर की संपत्ति को जीते जी धीरे-धीरे दान करेंगे। लेकिन हकीकत ये है कि अमेजन में नौकरियों पर खतरा काफी समय से मंडरा रहा है। इस साल अप्रैल से सितंबर के बीच ही कम से कम 80 हजार लोगों को हटा दिया गया है और अलग-अलग विभागों में खाली पदों को भरने की प्रक्रिया भी बंद पड़ी है। दरअसल कोरोना के वक्त जब लोगों का घर से निकलना बंद हो गया था, तब अमेजन के व्यापार में खूब वृद्धि हुई थी।

घर बैठे मनोरंजन प्राप्त करने से लेकर कपड़े, इलेक्ट्रानिक उपकरण और अन्य सामान खरीदने का काम ऑनलाइन ही होने लगा था। इस वजह से अमेजन ने भी अपना दायरा काफी बढ़ा लिया था। मगर अब बाजार फिर से खुल गए हैं, तो लोग दुकानों पर जाकर सामान खरीदने में दिलचस्पी लेने लगे हैं। इसके अलावा महंगाई इतनी बढ़ गई है कि अब खरीदारी की आदत बदलती जा रही है। इसमें अमेजन के लिए मुनाफे के अवसर घटे हैं। अपने खर्च को बचाने के लिए अब कंपनी नौकरियों में छंटनी कर रही है। अमेजन जैसी स्थिति ही अन्य बड़ी कंपनियों की हो रही है।

इधर यूरोपीय संघ ने आशंका जाहिर की है कि इन सर्दियों में यूरोजोन के 19 देश मंदी की चपेट में आ सकते हैं। यूरोपीय संघ के आर्थिक कमिश्नर पाओलो जेंतिलोनी का कहना है कि ऊर्जा के ऊंचे दाम, और बढ़ती महंगाई अब अपना असर दिखाने लगी है। ब्रेक्जिट के बाद यूरोपीय संघ से अलग होने वाला ब्रिटेन भी मंदी में फंसने लगा है। वहीं कई दशकों बाद अमेरिका में भी महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की ये दशा और दिग्गज कंपनियों की हालत भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रही है। अब सवाल ये है कि हम इन संकेतों को कितना समझते हैं और किस तरह के फैसले सरकार लेती है। क्योंकि मंदी एक जगह टिकती नहीं, हर जगह अपना असर दिखाती है।

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