सजायाफ्ता मुजरिमों के जीवनसाथी के अधिकार

सुनील कुमार॥

जिन दिनों इस जगह पर लिखने के लिए आसानी से कोई मुद्दा नहीं सूझता, अदालती खबरें एक अच्छा जरिया होती है। अदालतों में इतने किस्म के मामले पहुंचते हैं कि उनमें से बहुत से मामलों के मानवीय या लोकतांत्रिक, सरकारी या संवैधानिक पहलू कुछ न कुछ लिखने को मजबूर करते हैं। ऐसा ही एक मामला अभी सुप्रीम कोर्ट से आया है जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट के एक फैसले पर रोक लगाई गई है। राजस्थान में बलात्कार के एक मुजरिम को नाबालिग लडक़ी से गैंगरेप के मामले में बीस साल की कैद हुई थी, और सजा शुरू होते ही उसकी पत्नी ने बच्चा पैदा करने के अपने मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए पति को एक महीने की पैरोल देने की याचिका अदालत में लगाई थी। मामला राजस्थान हाईकोर्ट में पन्द्रह दिन की पैरोल के साथ निपटाया गया। यह तर्क एक हिसाब से सही था क्योंकि बीस बरस की कैद काटकर निकलने के बाद यह मुजरिम अपनी पत्नी के साथ इस उम्र में पहुंचा रहता कि उनके बच्चे शायद न भी हो पाते, इसलिए पत्नी की यह अपील तर्कसंगत थी। लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार में इसके खिलाफ तर्क दिया कि राजस्थान के पैरोल नियमों के मुताबिक रेप या गैंगरेप के मामलों में पैरोल नहीं दिया जा सकता। इस तर्क के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है।

हमने पहले भी कई मौकों पर यह बात लिखी है कि जेल में बंद कैदी के जीवनसाथी के अधिकारों को रोकना जायज नहीं होगा, और उनके हक का ख्याल रखते हुए कैद के दौरान भी जीवनसाथी को एक न्यूनतम देह-संबंध बनाने की सहूलियत मिलनी चाहिए। हम कई बरस से इस बारे में लिखते आ रहे थे, और अभी सितंबर 2022 में पंजाब देश का पहला ऐसा राज्य बना है जिसने सजायाफ्ता मुजरिमों को अच्छे चाल-चलन के आधार पर उनके जीवनसाथी के साथ देह-संबंध बनाने की छूट दी है, और जेलों को इसका इंतजाम करने को कहा है। दुनिया के दर्जन भर प्रमुख देशों में ऐसी छूट है, और इनमें पाकिस्तान तक शामिल है। पंजाब की तीन चुनिंदा जेलों से इसकी शुरुआत हो रही है, और जेल की सहूलियतों के मुताबिक दो महीनों में एक बार दो घंटे के लिए अच्छे चाल-चलन वाले कैदियों को इसकी छूट मिलेगी। इससे वे जेल में अपना चाल-चलन बेहतर रख सकेंगे, और परिवार भी टूटने से बच सकेगा। जेलों में बंद महिलाओं को भी इसकी सहूलियत मिलने जा रही है। परिवार-मुलाकात नाम का यह कार्यक्रम कैदियों के जीवनसाथियों के संक्रामक रोग से मुक्त होने पर ही हो सकेगा।

राजस्थान का मामला इससे थोड़ा सा अलग भी है, और कुछ-कुछ इस किस्म का भी है। भारतीय न्याय व्यवस्था और सरकारों के अधिकारों के तहत एक कैदी को इंसान बने रहने की कितनी सहूलियत दी जा सकती है, दी जानी चाहिए, यह अदालतों और सरकार दोनों को अलग-अलग, और मिलकर भी तय करना होगा। हमारा यह मानना है कि सजा किसी को तकलीफ देने के अकेले मकसद से नहीं होने चाहिए। सजा का मकसद लोगों में सुधार की कोशिश होनी चाहिए, और यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सजा के बाद लोगों को लौटकर अपने उसी परिवार में वापिस आना है, उसी समाज में जीना है। इन सब बातों को ध्यान में रखें, तो राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला सही लगता है जिसने एक पत्नी के गर्भवती होने, और बच्चे पैदा करने के हक का सम्मान किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस फैसले के खिलाफ कोई फैसला नहीं दिया है, महज उस पर रोक लगाई है, हो सकता है कि इस मामले में आखिरी फैसला हाईकोर्ट सरीखा ही आए। राजस्थान सरकार को भी यह समझने की जरूरत है कि अगर बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के मामलों में पैरोल न देने का नियम उसने बनाया हुआ है, तो क्या इससे सचमुच ही किसी कैदी में सुधार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं? पंजाब में हमने बलात्कार के एक चर्चित बाबा, राम-रहीम को कई बार जेल से बाहर पैरोल पर आते देख लिया है। अगर राजस्थान सरकार पैरोल से मना करती है, तो भी वह पंजाब की परिवार-मुलाकात योजना की तरह की कोई सहूलियत शुरू कर सकती है जिससे कि मुजरिमों के जीवनसाथियों को उनके मौलिक अधिकार मिल सकें।

दरअसल जुर्म और सजा का सारा इंतजाम दुनिया के देशों में लोकतंत्र, मानवाधिकार, और सभ्यता के विकास से जुड़ा रहता है। जो देश इन बुनियादी मूल्यों के पैमानों पर कमजोर रहते हैं, वहां पर मौत की सजा भी दी जाती है, और कुछ अलोकतांत्रिक देशों में कैदियों के हाथ-पैर भी काटे जाते हैं। जैसे-जैसे देशों की सभ्यता विकसित होती है, वैसे-वैसे वहां पर लोगों के मौलिक अधिकारों की फिक्र बढ़ती है जिनमें कैदी भी शामिल होते हैं। भारत के सभी प्रदेशों को पंजाब की तरह परिवार-मुलाकात का इंतजाम करना चाहिए क्योंकि कैदियों के जीवनसाथियों को बिना किसी जुर्म के ऐसे अलगाव की सजा न मिले। यह अच्छा है कि राजस्थान का यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा हुआ है, और सुप्रीम कोर्ट के सामने आज यह मौका है कि वह राजस्थान सरकार के इस विरोध की रौशनी में पंजाब सरकार के उदार और मानवीय इंतजाम को भी परख सके, और पूरे देश के लिए एक सरीखी एक नीति बना सके। भारत सरीखे लोकतंत्र में बहुत से अदालती फैसले किसी एक छोटी सी अपील से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच से निकलते हैं, और पूरे देश पर लागू होते हैं। भारत की जेलों में कैदियों की बदहाली की खबरें तो बहुत आती हैं, लेकिन अगर जेलों को सचमुच ही सुधारगृह बनाना है, तो कैदियों को, और उनके परिवारों को इंसान मानकर उन्हें कुछ हक देने भी पड़ेंगे।

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