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ऊर्जा सुरक्षा और प्रौद्योगिकी सबसे पहली ज़रूरत.. सत्ता की वफादार पुलिस और बलि का बकरा आम जनता.. दम तोड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.. गरीब अडाणी का तो सत्यानाश हो गया.. प्रदूषण से दुनिया के शतरंज खिलाड़ियों के खेल पर खतरा.. महिला सशक्तिकरण से अधिक महिलाओं के नेतृत्व की ज़रूरत.. अडानी बना सरकार के गले की हड्डी.. अडाणी या धूमकेतु.?

26 नवंबर की तारीख भारत के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण हो गई है। 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ था, इसलिए यह दिन संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। फिर 2008 में मुंबई पर भयावह आतंकी हमला हुआ, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने की नापाक कोशिश थी।

इसके बाद 26 नवंबर 2020 को किसानों ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक सत्याग्रह शुरु किया, जिससे भारत में लोकतंत्र की ताकत को नए सिरे से पहचाना गया। इस बार 26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर जब प्रधानमंत्री ने भाषण दिया, तो उसमें मुंबई हमलों का जिक्र तो था, लेकिन किसान आंदोलन के बारे में खामोशी थी। जबकि भाजपा सरकार को किसानों के लंबे संघर्ष के आगे झुकते हुए साल भर बाद इन कानूनों को वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। किसानों से किए गए वादे तो अब तक पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन अब सरकार अपनी मर्जी से कानून बनाने और उसे थोपने का दुस्साहस नहीं दिखा पा रही है।

हिंदुस्तान में किसानों की छवि गरीब, मजबूर लोगों की बन चुकी है, जो या तो सूखे की मार से परेशान रहते हैं या फिर कर्ज के बोझ तले दबे रहते हैं। इसलिए सरकार ने जब उनसे बगैर मशविरा किए तीन ऐसे कानून बना दिए, जो ऊपरी तौर पर देखने में लुभावने लग रहे थे, लेकिन उनके दीर्घकालिक परिणाम घातक ही होते, तो किसानों ने ही उनके खिलाफ आवाज़ बुलंद की। सरकार को लगा था कि कुछ दिनों के शोरगुल के बाद किसान वापस लौट जाएंगे, मगर किसान आंदोलन ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की अद्भुत मिसाल पेश की थी। संविधान ने किस तरह जनता को लोकतंत्र में ताकतवर बनाया है, कैसे उसके हाथ में शक्ति सौंपी है, यह उसकी एक उम्दा मिसाल है।

इस बार संविधान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने हम भारत के लोग को केवल शब्द नहीं भावना बताया और इस बात पर जोर दिया कि भारत के युवाओं को संविधान समझना चाहिए, उसकी जानकारी रखनी चाहिए। उन्होंने भारत को लोकतंत्र की जननी बतलाया। प्रधानमंत्री की बातों से असहमति का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वाकई भारत के संविधान का सारा आधार हम भारत के लोग ही हैं।

सरकार के सारे फैसले लोकहित और देशहित को ध्यान में रखकर ही होने चाहिए। और अगर किसी फैसले पर जनता परेशान होती है, अपना विरोध जाहिर करती है, तो यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उस विरोध का भी आदर करे। मौजूदा सरकार को अपनी काबिलियत और सफलता इसी कसौटी पर परख कर देखना चाहिए। अगर नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शाहीन बाग में महिलाएं प्रदर्शन के लिए दिन-रात बैठी रहीं, अगर किसान कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल से अधिक वक्त तक आंदोलनरत रहे, अगर बेरोजगार युवा नौकरियों की मांग को लेकर बार-बार सड़कों पर उतर रहे हैं, अगर देश के दो राज्य सीमा विवाद के कारण हिंसक संघर्ष में उलझ रहे हैं, अगर विरोध की आवाज़ों को दबाने के लिए सरकार को बार-बार देश के कुछ हिस्सों में इंटरनेट बंद करना पड़ रहा है, अगर देश में पत्रकारों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता संदेहों के दायरे में आ रही है, तो फिर क्या हम दावा कर सकते हैं कि देश में सब कुछ संविधान सम्मत चल रहा है, यह सवाल सरकार को अपने आप से करना चाहिए।

इधर प्रधानमंत्री मोदी संविधान की खासियत गिना रहे थे, उधर विपक्ष के सांसद राहुल गांधी, कांग्रेस के कई नेताओं के साथ संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर की जन्म स्थली महू में मौजूद थे। गौरतलब है कि भारत जोड़ो यात्रा इस वक्त मध्यप्रदेश में है। तमिलनाडु से निकली यात्रा केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र होते हुए मध्यभारत तक पहुंची। इन 80-82 दिनों में लाखों लोग राहुल गांधी का साथ देने आगे आए। रोज कई-कई किलोमीटर उनके साथ पैदल चले। उन्हें अपनी तकलीफें बताईं।

देश को जोड़ने में उनका योगदान क्या हो सकता है, ये जानने वे राहुल गांधी के साथ पहुंचे। इस यात्रा में भी संविधान की ताकत को ही महसूस किया जा सकता है। लोकतंत्र को मजबूत करने की व्यवस्थाएं संविधान में हैं और संविधान की दी गई इसी शक्ति का इस्तेमाल यात्रा में हो रहा है।

यात्रा का नाम भारत जोड़ो है, लेकिन अगर यह यात्रा अनाम होती या फिर इसका नाम कुछ और होता, तब भी अगर देश की जनता, एक निर्वाचित नेता के साथ स्वत: स्फूर्त सड़कों पर उतर रही है और कानून के दायरे में पद यात्रा कर रही है, तो भी इसका स्वागत ही होना चाहिए। मगर यात्रा की शुरुआत से यह नजर आ रहा है कि भाजपा इसे लेकर खिन्न है। इसलिए राहुल गांधी को लगातार किसी न किसी बहाने निशाने पर लिया जा रहा है। इसकी शुरुआत टी शर्ट की कीमत से हुई थी और अब यह राहुल गांधी के आरती करने और ऊं की चादर ओढ़ने तक जा पहुंची है।

ओंकारेश्वर में राहुल की नर्मदा आरती की तस्वीर को जिस तरह स्मृति ईरानी ने उल्टा कर के पेश किया, वह निम्नस्तरीय विरोध का तरीका नजर आया। भाजपा राहुल गांधी के विरोध को नफरत की हद तक ले जाती दिख रही है, जो न राजनीति के लिहाज से सही है, न संविधान की मर्यादा के मुताबिक है।

महू में राहुल गांधी ने साफ तौर पर कहा कि उनका संघ और भाजपा की विचारधारा से मतभेद है, लेकिन इनके लिए नफरत नहीं है। दरअसल यही विचार इस वक्त हिंदुस्तान को और अंतत: सारी मानवता को बचा सकता है। संविधान जब सबके लिए बराबरी की बात करता है, तो इसी नफरत को खत्म करने का संदेश देता है।

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