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-सुनील कुमार॥

दुनिया का एक देश ऐसा है जहां की टीम मैच जीतती है, तो भी वह देश जीतता है, और उसकी टीम अगर हार जाती है, तो भी वह देश जीतता है। इसका नजारा कतर में चल रहे विश्वकप फुटबॉल में अभी देखने मिला जब जापान में एक दिग्गज देश जर्मनी पर जीत पाई, और जापानी प्रशंसकों ने जीत के जश्न को तब तक मनाना शुरू नहीं किया जब तक उन्होंने पूरा स्टेडियम साफ नहीं कर दिए। जहां मैच खत्म होने की सीटी बजते ही खेल प्रशंसक उत्साह से हिंसा तक कई किस्म से जश्न मनाना शुरू कर देते हैं, जापानी दर्शकों ने आदतन कचरे की थैलियां निकालीं, और तमाम दर्शकों के फेंके गए खाने के पैकेट और दूसरे चीजों का कचरा बंटोरना शुरू कर दिया। जब स्टेडियम पूरा साफ हो गया, तब उन्होंने इस बड़ी जीत का जश्न मनाना शुरू किया। लोगों ने याद किया कि चार बरस पहले रूस में हुए विश्वकप में जब उनकी टीम बेल्जियम से हारी थी, तब भी जापानी दर्शकों ने ठीक इसी तरह स्टेडियम साफ किया था। जापानी बच्चों को बचपन से ही स्कूल के क्लासरूम और बरामदे साफ करना सिखाया जाता है, और वहां की स्कूलों का यह आम नजारा रहता है कि अपने इस्तेमाल की जगहों को साफ करना सीखा जाए, और रोजाना किया जाए। जापानी जिंदगी के इस तौर-तरीके पर फख्र भी करते हैं, और असल जिंदगी में इस पर सौ फीसदी अमल भी करते हैं।

जो लोग फुटबॉल मैच देखने आठ हजार किलोमीटर से अधिक का सफर करके कतर आए हुए हैं, रहने की महंगी जगहों पर ठहरे हुए हैं, वे इतनी बड़ी जीत का रोमांच छोडक़र अपनी संस्कृति की इस बुनियादी सीख पर चल रहे हैं, तो वह एक बहुत बड़ा अनुशासन भी है। एक खूबी यह भी है कि वे अपनी सादगी और अपने अनुशासन को नुमाइश की तरह पेश नहीं कर रहे, उनका बस चलता तो वे अदृश्य रहकर भी यह सफाई कर लेते, लेकिन जब वह मुमकिन नहीं है, तो वे अपनी खुशी को स्थगित रखकर यह सफाई कर रहे हैं। इससे दुनिया के उन देशों को जरूर सीखना चाहिए जो अपनी मौजूद, या नामौजूद और महज मान ली गई संस्कृति पर गर्व करते हैं, अपने देश को सबसे अधिक गौरवशाली मानते हैं, और अपने को विश्वगुरू मानते हैं। एक वक्त जर्मनी में हिटलर ने अपनी नस्ल को दुनिया की सबसे अच्छी नस्ल माना था, और नस्लवादी हिंसा में उसने दसियों लाख लोगों का कत्ल किया था। कहीं कोई जाति अपने को सबसे अच्छा मानती है, तो कहीं कोई देश, और कहीं कोई धर्म। लेकिन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि जिस किसी बात पर उन्हें गर्व है, क्या उनका अपना चाल-चलन, उनका व्यवहार उस गर्व के लायक है? हिन्दुस्तान के लोगों को अब यह बात भूल चली होगी कि कुछ बरस पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में सफाई अभियान शुरू किया था, और उनके सहित देश के तमाम लोग झाड़ू लिए हुए सडक़ों पर पिल पड़े थे, जहां सडक़ें चकाचक थीं, वहां भी चुनिंदा साफ-सुथरा कचरा लाकर बिखेरा गया था, ताकि कैमरों के सामने उसे साफ किया जा सके। एक वीडियो तो ऐसा भी था जिसमें मोदी खुद कचरे का बोरा टांगे हुए किसी समुद्रतट पर कचरा बीनते दिख रहे थे। लेकिन कुछ महीनों के भीतर यह सिलसिला इतिहास बन गया। यह मानो काठ की हांडी में पकाया गया खाना था, और काठ, यानी लकड़ी, की हंडी बार-बार तो चूल्हे पर चढ़ती नहीं। नतीजा यह हुआ कि देश अब पहले के मुकाबले और अधिक गंदा है, लेकिन अब कोई सफाई की चर्चा भी नहीं करते, और तो और सफाई के इस इतिहास की सालगिरह भी नहीं मनाते। असल और दिखावे में यह एक बड़ा फर्क होता है कि कैमरे हटने के साथ-साथ दिखावा घर चले जाता है, और असल खड़े रहता है, कोई जश्न भी शुरू करने का जायज मौका रहने पर भी स्टेडियम साफ कर लेने तक। अपने ही भाड़े के कैमरों के सामने दिखावे के लिए इतिहास में एक बार सफाई करने वाला मुल्क विश्वगुरू नहीं हो जाता।

हिन्दुस्तान में तो लोगों का गंदगी करने का सिलसिला उनकी आर्थिक ताकत के अनुपात में रहता है। जो जितनी अधिक खरीदी कर सकते हैं, जितनी अधिक खपत कर सकते हैं, वे उसी अनुपात में कचरा पैदा करते हैं, और बिखराते हैं। दूसरी दिलचस्प बात इस विश्वगुरू के साथ यह है कि इसके सबसे संपन्न, और आमतौर पर सवर्ण भी, तबके का यह मानना है कि उसे दलित तबके के सफाई कर्मचारी दुनिया खत्म होने तक हासिल रहेंगे ही। अपनी कमाने और गंदगी फैलाने की क्षमता से अधिक भरोसा उन्हें दलितों की मौजूदगी पर है, और उन्हें यह पक्का भरोसा है कि दलित गटर में डूब-डूबकर कचरा साफ करने के लिए मौजूद रहेंगे, नालियों में तो वे उतरे ही रहेंगे, और घूरे के ढेरों पर हिन्दुस्तानी गरीब कचरा छांटते हुए इस पहाड़ को कम करते रहेंगे। सफाई करने वालों की अनंतकाल तक मौजूदगी का इतना पक्का भरोसा करने के लिए इस देश को विश्वगुरू होना तो जरूरी है ही। अगर किसी समाजविज्ञानी प्रयोग की तरह एक पखवाड़े कचरा साफ करना बंद हो जाए, गटर और नालियों को साफ करना बंद हो जाए, तो शायद विश्वगुरू-जमात के लोग एक बार यह सोचने को मजबूर होंगे कि अगर यह पखवाड़ा कुछ महीनों खिंच गया तो क्या होगा?

इस विश्वगुरू के साथ दिक्कत यह है कि इसने अपने इतिहास के और भी पहले के पौराणिक काल से लेकर अब तक झूठे गौरव के इतने सारे पेशेवर गवाह खड़े कर लिए हैं कि इसे सचमुच के किसी गौरव की कमी भी नहीं खलती। जब लोगों के पास अपना गढ़ा हुआ इतिहास हो, उसकी कहानियां भी अपने मनपसंद किरदारों को लेकर गढ़ी गई हों, इतिहास की ऐसी तमाम कहानियों को खारिज करने की भी ताकत हो जो कि बहुत गौरवशाली नहीं लगतीं, तो फिर ऐसे में अपनी खुद की नजर में अपने को विश्वगुरू बनाने का यह जोश कोई ठंडा नहीं कर सकते। कैमरों से परे हिन्दुस्तानी उतने ही गंदे हैं जितने गंदे वे हमेशा से रहते आए हैं, और यह गंदगी ताजा शहरी संपन्नता के साथ-साथ बढ़ती चल रही है। लेकिन इसी के साथ-साथ, इसी अनुपात में गर्व भी बढ़ते चल रहा है। जिस विश्वगुरू की अपनी जिंदगी देश के दलितों की आजीवन उपलब्धता के भरोसे पर टिकी है, उस विश्वगुरू के पास जापान जैसे देश से, जापानियों जैसे लोगों से भी सीखने का कुछ नहीं है। स्वघोषित विश्वगुरू सीखने से ऊपर उठ चुके होते हैं, कोई शिष्य रहकर ही सीख सकते हैं, गुरू बनकर नहीं, और हिन्दुस्तान तो आज विश्वगुरू है! उसका भला सीखने से क्या लेना-देना? उसके पास तो एक ऐसा पुराना इतिहास है जिसने यह तय कर रखा है कि कौन सी जातियां अपनी तमाम आने वाली पीढिय़ों सहित गटर साफ करने में लगी रहेंगी ताकि लोग इत्मिनान से गंदगी फैला सकें। इसलिए जापानियों को अगर दुनिया को सिखाने की कोई उम्मीद भी है, तो उन्हें कहीं और जाना चाहिए, हिन्दुस्तानी सीखने से बहुत ऊपर जा चुके हैं, विश्वगुरू को भला कोई क्या सिखाएंगे?
-सुनील कुमार

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