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-सुनील कुमार॥

ट्विटर खरीदकर खबरों में आए, और खासा नुकसान झेल चुके, एलन मस्क ने अभी यह कहकर और सनसनी फैला दी है कि उनकी एक कंपनी इंसान के दिमाग में कम्प्यूटर चिप लगाने के करीब है, और अगले छह महीनों में उनकी कंपनी यह टेक्नालॉजी विकसित कर लेगी। उनकी यह उम्मीद अगर वक्त पर पूरी हो जाती है तो इससे दिमाग से जुड़ी कई किस्म की बीमारियों के इलाज की एक नई संभावना पैदा होगी, लेकिन साथ-साथ दुनिया में एक नए किस्म का खतरा भी खड़ा हो जाएगा। मस्क की कंपनी न्यूरालिंक का कहना है कि वह जो ब्रेन-चिप बना रही है उससे किसी इंसान की खोई हुई दृष्टि वापिस हासिल हो सकेगी, और जो लोग जन्म से दृष्टिहीन हैं, उनमें भी इस ब्रेन-चिप से दिखने लग सकता है। इसके अलावा पूरे बदन को काबू करने वाले दिमाग के और कई किस्म के काम इससे हो सकेंगे। कंपनी ने छह महीनों में इसके ट्रायल की उम्मीद जताई है।

अब दुनिया के एक सबसे बड़े, ताकतवर, और सनकी दिखने वाले कारोबारी के हाथ अगर ऐसी टेक्नालॉजी लग चुकी है, और छह महीनों में इसे इंसानों के दिमाग से जोडक़र उनकी बीमारियों पर काबू पाया जा सकेगा, तो यह बात भी तय है कि बीमारियों पर काबू से परे भी कई दूसरी किस्म की बातों पर काबू भी इस टेक्नालॉजी से मुमकिन हो सकता है। आज खुद अमरीका में बड़े-बड़े वैज्ञानिकों के सामने दिमाग के साथ इस तरह की छेड़छाड़ एक बड़ी फिक्र बनकर सामने है। बहुत से वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे कई दूसरे किस्म के नैतिक सवाल उठ खड़े होंगे जिनके जवाब मिलना मुश्किल है। जो ब्रेन-चिप दिमाग के साथ संपर्क करेंगे, वे आगे-पीछे दिमाग को पढऩे की ताकत भी पा जाएंगे। ऐसी हालत में टेक्नालॉजी किसी व्यक्ति के दिमाग में जमा यादों, इरादों, और बाकी बातों में भी झांकने की हालत में आ सकती है। लोगों को याद होगा कि आधी-एक सदी पहले से विज्ञान कथा लेखकों ने ब्रेन-वॉश की कल्पना लिखना शुरू कर दिया था जिसके मार्फत टेक्नालॉजी लोगों के दिमाग में कोई बात सुझा सकती है, या दिमाग में वह बात भर सकती है। एक मशहूर चिकित्सा-विज्ञान अपराध-कथा लेखक ने कई दशक पहले एक उपन्यास लिखा था जिसमें एक दवा कंपनी डॉक्टरों को मौज-मस्ती के लिए एक जहाज पर ले जाती है, और वहां पर उन्हें ब्रेन-वॉश करके इस कंपनी की दवाओं को अधिक से अधिक लिखना सुझाया जाता है। अब अगर इंसानों को ब्रेन-वॉश करने की ऐसी कल्पना में लोगों के दिमाग में कोई चिप बैठाकर उसके माध्यम से उनकी सोच बदली जा सकती है, तो इसकी भयानक संभावनाएं या आशंकाएं पहली नजर में ही दिखती हैं। बड़े संपन्न राजनीतिक दल ऐसा चाह सकते हैं कि लोग उसके हिमायती बनें, और बने रहें। अब हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां पर लोग पैसों के लिए खून बेचते हैं, किडनी बेचते हैं, लिवर बेचते हैं, वहां पर भुगतान पाकर चिप लगवाने के लिए भी लोग तैयार हो सकते हैं। जब एक किडनी बेचकर और बची एक किडनी के सहारे जिंदा रहना भी हजारों लोगों की जिंदगी की हकीकत है, तो अपने दिमाग तक पहुंच का एक रास्ता देकर अगर लोगों को पैसे मिल सकते हैं, तो गरीबी से भरे इस देश में इसमें दिलचस्पी रखने वाले बहुत से गरीब निकल सकते हैं। यह भी हो सकता है कि हर आम वोटर को प्रभावित करने के बजाय कोई पार्टी या सरकार प्रमुख लोगों के दिमाग प्रभावित करने की कोशिश करे ताकि उसकी विचारधारा की सरकार चल सके, लंबी चल सके, मनमानी कर सके। आज भी कई जगहों सरकारों में कई लोग इस तरह काम करते दिखते हैं कि मानो उनका ब्रेन-वॉश हो चुका हो, किसी ब्रेन-चिप की मेहरबानी से यह सिलसिला छलांगें लगाकर आगे बढ़ सकता है।

एलन मस्क एक ऐसा कारोबारी है जिसने ट्विटर जैसे दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपनी मनमर्जी से चलाने के लिए इतना बड़ा घाटे का सौदा किया है, और न सिर्फ अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा, बल्कि अपनी कारोबारी साख को बहुत हद तक दांव पर लगा भी दिया है। एलन मस्क एक सनकी और अपार ताकत का धनी कारोबारी है जिसकी जनकल्याण की अपनी सोच है, और जो अभिव्यक्ति की आजादी का हिमायती बनते हुए मनमानी करने का आदी है। अब अगर ऐसे तानाशाही सोच वाले कारोबारी के हाथ ब्रेन-चिप जैसी कोई टेक्नालॉजी लगती है, तो वह आगे चलकर एक औजार के बजाय एक हथियार साबित हो सकती है। इस टेक्नालॉजी की संभावनाएं किन दिमागी तकलीफों को दूर करने में हो सकती है, इस पर तो बहुत चर्चा है, लेकिन इसे किसी साजिश के तहत लोगों के दिमाग पर काबू करने में कैसे-कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, ऐसे चिकित्सा-नैतिकता के पहलुओं पर अभी पूरी कल्पनाएं दौडऩा भी मुमकिन नहीं है। फिर भी यह जाहिर तौर पर एक ऐसी तकनीक दिख रही है जिसके बेकाबू होने का खतरा बहुत है। खासकर गरीब देशों की बड़ी आबादी ऐसी हो सकती है जो कि राजनीतिक, धार्मिक, कारोबारी सोच के सिग्नल अपने ब्रेन तक पहुंचने देने के लिए, या अपने दिमाग को किसी कम्प्यूटर से पढऩे देने के लिए मामूली रकम लेकर तैयार हो जाए। आज अफगानिस्तान जैसे देश में तालिबान-राज लौटने के साल भर के भीतर ऐसी नौबत आ गई है कि लोग अपने छोटे-छोटे से बच्चे बेच रहे हैं ताकि उन्हें भी जिंदा रख सकें, और अपने बचे हुए परिवार को भी कुछ दिन खाना खिला सकें। हिन्दुस्तान के चेन्नई में ऐसी पूरी बस्ती ही है जिसके हर घर में लोग एक-एक किडनी बेच चुके हैं, और बाकी दूसरी किडनी पर जिंदा हैं। गरीबी और असमानता से भरी ऐसी दुनिया में दिमाग तक पहुंच की राह बेचने वाले बहुत से लोग हो जाएंगे, क्योंकि इस दुनिया में अनगिनत महिलाएं मजबूरी में अपनी देह बेच ही रही हैं। ऐसी टेक्नालॉजी चिकित्सा-विज्ञान को संभावनाएं दिखा रही है, लेकिन मामूली समझबूझ के लोगों को भी इसकी आशंकाएं भी नजर आ सकती हैं।

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