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भारत में उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मेधावी व संपन्न तबके के छात्रों को जैसे ही अवसर मिलता है, वे विदेशी विश्वविद्यालयों का रुख कर लेते हैं, ये एक कड़वी हकीकत है। प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन संकट के दौरान देश के विद्यार्थियों को नसीहत दी थी कि वे पढ़ने के लिए बाहरी विश्वविद्यालयों में नहीं जाएं, क्योंकि इससे देश का धन भी बाहर जाता है।

लेकिन देश में पढ़ने और शोध करने के लिए मुनासिब माहौल उनके साढ़े आठ सालों के कार्यकाल में भी शायद नहीं बन पाया है, तभी तो खुद उनकी पार्टी और सरकार के कई लोगों के बच्चे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस या न्यूजीलैंड जैसे देशों का रुख कर रहे हैं। सत्ता के संपन्न लोगों को वैसे भी अपने बच्चों पर कुछ करोड़ रूपए खर्च करने से क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन इस देश के लाखों अभिभावक अपने बच्चों को यहीं के विश्वविद्यालयों में पढ़ने भेजते हैं, ताकि स्नातक, स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल हो। उनके पास और कोई विकल्प नहीं रहता। और उनकी यही ख्वाहिश रहती है कि देश के जो भी बचे-खुचे अच्छे शिक्षा संस्थान हैं, उनमें पढ़ाई का स्तर बना रहे, बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए माहौल मिलता रहे।

वैसे तो विश्वविद्यालय शब्द ही अपने आप में विराट उदार दर्शन को समाहित किए हुए है, जिसमें ज्ञान और जिज्ञासा की धाराएं संपूर्ण विश्व को भिगोती चली जाएं। कभी नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों से दुनिया का परिचय कराने वाले हम आज खुद इस शब्द की महिमा को बिसराते जा रहे हैं। विश्वविद्यालयों को वैचारिक भिन्नता के नाम पर विमर्श की जगह विवादों का केंद्र बना दिया गया है, जहां संकुचित मानसिकता के साथ व्यवहार करने वाले हावी होते जा रहे हैं। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक छात्र भरी कक्षा में अपने प्रोफेसर से कहता है कि उन्होंने उसे आतंकी कैसे कहा। दरअसल खबरों के मुताबिक इन प्रोफेसर ने उस छात्र को कसाब कहकर पुकारा था।

प्रोफेसर और कक्षा के बाकी हिंदू विद्यार्थियों के लिए यह हंसी उड़ाने वाली बात हो सकती है, लेकिन उस छात्र ने इन तमाम लोगों के बीच हिम्मत बरकरार रखते हुए कहा कि इस देश में मुसलमान होना और रोज-रोज ये सब झेलना हंसी-मजाक की बात नहीं है। उन प्रोफेसर को शायद अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने उससे माफी मांगते हुए उसे अपने बेटे के समान बता दिया। लेकिन इस छात्र ने फिर कहा कि आपकी माफी आपकी मानसिकता नहीं बदल सकती। और आप अपने बेटे को आतंकवादी नहीं कहते।

बहुत सच्ची और कड़वी बात उस छात्र ने कम शब्दों में कह दी। दुख की बात ये है कि इस पूरी बातचीत को कक्षा में से ही किसी ने रिकार्ड तो कर लिया, लेकिन अपने सहपाठी का साथ देने कक्षा के बाकी बच्चों में से कोई खड़ा नहीं हुआ। प्रोफेसर की बातें जितनी चिंताजनक हैं, उतनी ही चिंता की बात ये है कि आखिर हमने अपने बच्चों को कैसे समाज बना कर दिया है, जिसमें अन्याय के खिलाफ पीड़ित के साथ खड़े होने की हिम्मत ही नहीं बची है। हमारी नयी पीढ़ी में क्या संवेदनशीलता और हिम्मत क्या दुर्लभ गुण बन कर रह गए हैं, इस सवाल पर समाज को चिंतन करना चाहिए।

निचले स्तर की मानसिकता का एक दूसरा उदाहरण सामने आया जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जेएनयू देश के शीर्ष 10 उच्च शिक्षण संस्थानों में से एक है। हाल ही में वर्ल्ड यूनिवर्सिटी क्यूएस रैंकिंग में जेएनयू को सस्टेनेबिलिटी में समानता और समावेशिता के अनुरूप रिसर्च आउटपुट के लिए भारत में शीर्ष स्थान हासिल हुआ है।

गौरतलब है कि समावेशी शिक्षा वो प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी भेदभाव के बिना समाज के प्रत्येक वर्ग को शिक्षा प्रदान की जाती है, ताकि समाज के सभी छात्रों को एक स्तर पर लाया जा सके। जेएनयू इस प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाता आया है। लेकिन इसी जेएनयू की दीवारों पर कुछ दिनों पहले जातिसूचक नारे लिखे गए। इन नारों में सवर्ण ब्राह्मण और वैश्य तबके के लोगों के खिलाफ बातें लिखी गईं। उनके जवाब में अब इस शिक्षा संस्थान की दीवारों पर वामपंथी विरोधी नारे लिखे गए और इसके साथ वामपंथ को आतंकवादी संगठन आईएस के बराबर दिखाया गया। जाहिर है दोनों तरह के नारे लिखने वाले लोग जेएनयू की समावेशिता की भावना के खिलाफ काम कर रहे हैं।

देश का दक्षिणपंथी मीडिया और जातिवादी लोग मानो जेएनयू में ऐसी किसी चिंगारी के भड़कने के ही इंतजार में बैठे थे ताकि नफरत की आग और बढ़ाई जा सके। एक स्टार टीवी एंकर ने पूछा कि हर बार जेएनयू में ही ऐसे विवाद क्यों होते हैं। एक ताजातरीन शोहरत हासिल किए तथाकथित बड़े कवि ने ब्राöण विरोधी नारे के विरोध में ब्राह्मणों का गुणगान करती लंबी कविता ही पेश कर दी, जिसमें मंगल पांडे से लेकर रानी लक्ष्मीबाई और रामप्रसाद बिस्मिल से लेकर चंद्रशेखर आजाद तक सबकी शहादत को ब्राह्मणवाद के झोले में उन्होंने डाल दिया। शहीदों का इससे बड़ा अपमान और कुछ नहीं हो सकता कि जिस भारत की आजादी के लिए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दे दिया, उसे जाति के संकुचित दायरे में मापा जाए।

कवि अपने ब्राह्मण होने का चाहे जितना घमंड कर ले, लेकिन देश की महान शख्सियतों को जाति और धर्म की बेड़ियों में जकड़ने की उन्होंने धृष्टता की है। और ऐसी ही धृष्टता को इस वक्त खूब बढ़ावा मिल रहा है। चंद नारों की आड़ में जेएनयू के औचित्य पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। उसे बंद करने की पैरवी जोर-शोर से हो रही है। यह सब किसी बड़ी साजिश की पूर्वपीठिका लगती है। पहले किसी संस्थान में बार-बार विवाद और हिंसा का माहौल पैदा किया जाए, फिर उस पर हो रहे खर्च को फिजूलखर्ची बताया जाए, और उसके बाद उसे बंद करके, उसे किसी व्यापारी के सुपुर्द कर दिया जाए, फिर देश सेवा के नाम पर वहां कुछ ऐसा उपक्रम खड़ा हो जाए, जिसमें वंचित और गरीब तबके के बच्चों के लिए जगह ही न बचे, केवल अमीरों की सुविधा का ख्याल रखा जाए।

अगर चंद नारों के कारण जेएनयू को बंद करने की मांग होने लगी है, तो फिर इस देश के सैकड़ों स्कूलों-कालेजों में रोजाना अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। तो क्या उन्हें बंद कर देने से इसका समाधान निकल जाएगा, या फिर इसके खिलाफ लड़ाई के लिए नयी पीढ़ी को और बेहतर ढंग से शिक्षित करने से हल निकलेगा, ये अब समाज को विचार करना है।

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