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बिहार में एक बार फिर जहरीली शराब ने अपना दुष्प्रभाव दिखाया है। पिछले दिनों छपरा में जहरीली शराब के सेवन से कम से कम 70 लोगों की जान चली गई, छपरा के अलावा सारण, सिवान और बेगूसराय में भी शराब के चलते मौतें हुई हैं। जिन लोगों की अकाल मौत हुई, प्रशासन की निगाह में उनका दोष यह था कि उन्होंने शराबबंदी के बावजूद शराब का सेवन किया। लेकिन असल में इससे भी बड़ा दोष यह था कि मरने वाले गरीब तबके के थे। ज्यादातर लोग मेहनत-मजदूरी करके अपना घर चलाते थे और शारीरिक-मानसिक तकलीफों से छुटकारे के लिए शराब का सेवन उन्होंने किया। ऐसा नहीं है कि इस देश में कानूनों का उल्लंघन नहीं होता।

शराब पीकर गाड़ी चलाना, लड़कियों से छेड़छाड़ करना, रिश्वत लेना, दस बजे के बाद लाउड स्पीकर चलाना, प्रतिबंधों के बावजूद पटाखे फोड़ना, दहेज लेना, व्यवहार में छुआछूत बरतना ऐसे दसियों तरह के कानून रोजाना तोड़े जाते हैं, पूरे होशोहवास में तोड़े जाते हैं, हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा, इस हनक में तोड़े जाते हैं। ऐसा करने वाले अगर अमीर या प्रभावशाली तबके से हुए, तो उनका कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन गरीब अगर कानून की शान में जरा सी गुस्ताखी कर ले तो फिर उसे कैसे सजा भुगतनी पड़ती है, ये समझना कठिन नहीं है। इस बार तो सीधे जान गंवाने का दंड ही गरीबों को मिला।

जिस राज्य में 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है। जहां किसी भी नशीले पदार्थ या शराब का निर्माण, बॉटलिंग, वितरण, परिवहन, संग्रह, भंडारण, खरीद, बिक्री या खपत प्रतिबंधित है, वहां किस तरह बार-बार जहरीली शराब लोगों की जान ले रही है, यह बड़ा गंभीर सवाल है। इस सवाल पर सभी जनप्रतिनिधियों को, प्रशासन और सरकार को गहन मंथन करना चाहिए। लेकिन इस वक्त जहरीली शराब से मौत कुछ के लिए राजनैतिक मौका और कुछ के लिए परेशानी बन कर सामने आई है। राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शराबबंदी के सख्त हिमायती हैं। उन्हीं के शासनकाल में बिहार में शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा। पहले उनके साथ सत्ता में भाजपा थी, तो उसकी भी सहमति इस प्रतिबंध पर थी। अब भाजपा सत्ता से बाहर है और जदयू के साथ राजद ने सरकार बना ली है। तो भाजपा इस मुद्दे पर नीतीश कुमार के खिलाफ खड़ी हो गई है।

सत्ता से बाहर होने की कसक वह अब नीतीश कुमार के इस्तीफे की मांग करके दूर कर रही है। और ये तय है कि जब तीन साल बाद राज्य में चुनाव होंगे तो भाजपा शराबबंदी को एक मुद्दा जरूर बनाएगी। इधर नीतीश कुमार हालिया प्रकरण के बाद बुरी तरह घिर गए हैं, और विधानसभा सत्र में अपना आपा खोते नजर आए। जब मृतकों के लिए मुआवजे की मांग उठी, तो इससे साफ इंकार करते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि ‘शराब पीकर मरने वालों को कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा। हम अपील करते रहे हैं- पिएंगे तो मर जाएंगे। जो लोग पीने के पक्ष में बात करते हैं, वे आपके लिए कुछ अच्छा नहीं करेंगे।’

नीतीश कुमार के इस बयान को उनके विरोधियों ने लपक लिया है और इसके आधे हिस्से पियोगे, तो मरोगे को सुर्खियां बनाया जा रहा है। एक जननेता और जिम्मेदारी के पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह हर हाल में संतुलित, संयमित व्यवहार करेगा। नीतीश कुमार ने जो बातें कहीं, वो सैद्धांतिक तौर पर सही हैं। शराब पीकर शरीर को नुकसान होगा, ये बात भी सभी जानते हैं। अगर मृतकों को बिहार सरकार ने मुआवजा दिया तो विपक्षी इस बात पर भी घेर लेंगे कि जिन लोगों ने कानून तोड़ा, उन्हें सरकार मुआवजा दे रही है। यानी एक त्रासद घटना को राजनैतिक रंग देकर सैकड़ों तरह के खिलवाड़ किए जा सकते हैं। मगर ध्यान देने वाली बात ये है कि जिन लोगों ने कानून तोड़ा, उन्हें जान गंवाने की सज़ा पहले ही मिल चुकी है। उनके पीछे जो लोग छूट गए हैं, वे किस बात की सजा भोग रहे हैं। मृतकों में बहुत से लोग अपने घरों में इकलौते कमाऊ सदस्य रहे होंगे। उनके पीछे जो पत्नी, बच्चे, मां-बाप छूट गए, उनका गुजारा किस तरह होगा, इस बारे में सरकार को विचार करना चाहिए।

क्या सरकार उन लोगों की शिनाख्त जल्द से जल्द कर सकती है, जिन्होंने सस्ती शराब के चक्कर में लोगों को जहर परोस दिया। क्या ऐसे लोगों को सजा देने के साथ-साथ उनकी संपत्ति की नीलामी या ऐसा ही कोई और कदम उठाकर उस धन से सरकार मृतकों के बेसहारा परिजनों को कोई मदद मुहैया करा सकती है। शराबबंदी के फैसले को नीतीश कुमार अक्सर अपनी जीत के कारणों में से एक बताते हैं। उनका ये भी मानना है कि घर की स्त्रियों, बच्चों को शराबियों के कारण जिन तकलीफों से गुजरना पड़ता था, अब उससे निजात मिल गई है। लेकिन ये बहुत आदर्शवादी विचार है कि सरकार शराब पर कड़े प्रतिबंध लगाएगी और जनता उन पर उतनी ही कड़ाई से अमल करेगी। शराब हो या अन्य नशा, इसकी लत आसानी से नहीं छूटती। जब इन पर प्रतिबंध हो तो लोग पिछले दरवाजे से शराब खरीदने के रास्ते देखेंगे और इसमें अवैध और सस्ती शराब बनाने वाले मुनाफा कमाने के मौके ढूंढेंगे। पुलिस, प्रशासन की कमजोर कड़ियां इस अवैध कारोबार में सहायक बनेंगी। बिहार में फिलहाल यही होता दिख रहा है।

2016 के बाद से कई बार राज्य में अवैध शराब से लोगों की जान गई है। लेकिन इसमें इस अवैध धंधे में लिप्त लोगों को सजा बेहद कम हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से इस साल अक्टूबर मध्य तक बिहार पुलिस और आबकारी विभाग ने शराबबंदी कानून उल्लंघन के 4 लाख मामले दर्ज किए। इन मामलों में करीब 4.5 लाख लोगों को गिरफ्तार किया। इसमें लगभग 1.4 लाख लोगों पर विभिन्न अदालतों में मुकदमा चलाया गया। इसमें केवल 1,300 लोगों यानी 1 प्रतिशत से कम को दोषी ठहराया गया। खास बात ये कि दोषियों में से केवल 80 शराब विक्रेता या कारोबारी थे।

लगभग 900 लोगों को ठोस सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि कानून तोड़ने और सजा पाने वाले लोगों में कितना फासला है। क्या नीतीश कुमार इस तरह से शराबबंदी को सफल बनाएंगे। खबर है कि वे जल्द ही जनजागरुकता अभियान के लिए राज्य की यात्रा करने वाले हैं। ये एक अच्छी पहल होगी, मगर इसके साथ कानून तोड़ने वाले सक्षम लोगों को सजा मिले, ये भी उन्हें सुनिश्चित करना होगा और सबसे अहम बात इस सामाजिक मुद्दे को राजनैतिक हथियार बनने से रोकना होगा।

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