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-सुनील कुमार।।

दुनिया के बहुत से सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में तो लोगों के स्वस्थ मनोरंजन और रोमांच के लिए बहुत कुछ रहता है, लेकिन जो देश धर्म, जाति, खानपान, पोशाक की नफरत में डूबे रहते हैं, वहां स्वस्थ मनोरंजन की गुंजाइश बड़ी कम हो जाती है। ऐसे देशों के लिए भी बीती रात बहुत अहमियत वाली थी क्योंकि फुटबॉल के विश्वकप फाइनल में जो दो टीमें मैदान पर थीं, उनमें कोई बेशरम रंग दिख रहे थे, और न ही शर्मीले, दोनों में से किसी टीम में ऐसा मजहब ही दिख रहा था कि जिसकी वजह से उसकी हार की हसरत पाल ली जाए। नतीजा यह हुआ कि हिन्दुस्तान में भी बीती रात तकरीबन तमाम लोगों ने फुटबॉल का मजा लिया, और खासकर उन लोगों ने भी जिनका सुबह से रात तक का वक्त नफरत में भीगा हुआ रहता है। कल के इस मैच में नफरत के लायक कुछ नहीं था, और यह हिन्दुस्तान के एक तबके के लिए बड़ा दुर्लभ मौका था।

विश्वकप फुटबॉल का कल का फाइनल गजब का था। किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह मैच शुरू होने के पहले से इन दोनों देशों से परे के अधिकतर देशों या लोगों के खयालों में यह बात बसी हुई थी कि अर्जेंटीना के खिलाड़ी लियोनेल मेसी का यह आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच है, और इसके बाद रिटायर हो जाने की घोषणा वे खुद कर चुके हैं। वे बहुत किस्म के रिकॉर्ड बनाने में अपने देश के अपने पहले के एक महानतम खिलाड़ी माराडोना की बराबरी कर चुके थे, और सिर्फ विश्वकप जीतना उनके नाम पर दर्ज नहीं था। इस टूर्नामेंट के शुरू होने के पहले से यह एक बहुत बड़ा खतरा था कि 35 बरस की उम्र में आकर मेसी यह आखिरी विश्वकप खेल रहे थे, और अगर इस बार उनकी टीम नहीं जीतती, तो वे विश्वकप जीतने के सपने को लिए लिए अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से बिदा हो जाएंगे। यह नौबत बड़ी फिल्मी थी, और खासकर तब जब इस बार के टूर्नामेंट में अर्जेंटीना की टीम शुरुआत में ही सऊदी अरब से हार गई थी। इस मैच के बाद लोगों को इस टीम से उम्मीदें खत्म हो चली थीं, लेकिन इसने बीती रात गजब का खेल दिखाया, और विश्वकप भी जीता, और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का गोल्डन बॉल पुरस्कार भी मेसी को मिला। यह सब कुछ उनकी जिंदगी के इस आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच में हुआ, जिसमें यह सब हुए बिना भी वे घर लौट सकते थे। किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह आखिर में जाकर जिस तरह हीरो और हीरोईन मिलते हैं, उसी तरह मेसी और उनकी यह आखिरी और सबसे बड़ी कामयाबी एक-दूसरे से मिले!

किसी खेल या टूर्नामेंट के बारे में विचारों के इस कॉलम में लिखने की हमें शायद ही कभी सूझती है, लेकिन खेल की तकनीकी बारीकियों से परे की बातों पर तो लिखा ही जा सकता है। कल के ही मैच को देखें तो मेसी की तरह ही दस नंबर की जर्सी पहने हुए फ्रांस के स्टार खिलाड़ी किलियन एमबापे का दर्द हार के बाद देखने लायक था। दर्शकों में मौजूद फ्रांस के राष्ट्रपति ने जिस तरह अपनी हारी हुई टीम के बीच मैदान पर पहुंचकर देर तक एमबापे को लिपटाकर दिलासा दिलाया, वह भी देखने लायक था। लेकिन इस फ्रांसीसी सितारे के लिए फुटबॉल की जिंदगी अभी खत्म नहीं हो रही है। वह अभी महज 23 बरस का है, उसके नाम ढेर अंतरराष्ट्रीय गोल करना दर्ज है, और ऐसा माना जाता है कि वह अगले कई और विश्वकप खेलने की संभावना रखता है। इसलिए अगर कल उसकी टीम विश्वकप नहीं जीत पाई, तो यह मेसी की तरह संभावनाओं का अंत नहीं था, अभी उसके सामने फुटबॉल की दुनिया की इस सबसे बड़ी ट्रॉफी को उठाने का बहुत सा मौका बाकी है। इसलिए कल की इस जीत-हार की एक खूबी यह रही कि आखिरी मौके वाले मेसी को मौका मिला, और बिल्कुल जवान खिलाड़ी एमबापे को इस मुकाबले में भी गोल दागने का।

कल के इस मुकाबले से परे, इस बार के विश्वकप में पहली बार एक अफ्रीकी टीम सेमीफाइनल तक पहुंची। मोरक्को ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया, अफ्रीका के पौने चार करोड़ आबादी वाले इस देश ने जिस तरह लोगों का दिल जीता, और सेमीफाइनल तक पहुंचने का एक रिकॉर्ड बनाया, उससे भी बाकी दुनिया के बहुत से देशों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। दुनिया के 32 देशों की टीमें इसमें शामिल हुईं, और इनमें मोरक्को जैसा कम आबादी का देश भी था, लेकिन हिन्दुस्तान जैसा 140 करोड़ आबादी का विश्वगुरू इन 32 टीमों में नहीं था। आबादी के हिसाब से वह दुनिया में दूसरे नंबर पर है, यहां पर फुटबॉल अच्छा-खासा खेला भी जाता है, लेकिन शायद क्रिकेट की दीवानगी की वजह से, या कुछ और वजहों से यह 32 टीमों में भी शामिल नहीं था। एक तरफ क्रिकेट जैसा खेल जिसके लिए सब कुछ खासा महंगा लगता है, दूसरी तरफ फुटबॉल जो कि सबसे ही सस्ता खेल है, जिसे बचपन से हिन्दुस्तानी बच्चे गली-गली खेलते हैं, लेकिन जब फुटबॉल के अंतरराष्ट्रीय मुकाबले की बात आती है, तो हिन्दुस्तान दुनिया के नक्शे से गायब ही है। और फुटबॉल का इतिहास बताता है कि 1950 में आखिरी बार हिन्दुस्तान फुटबॉल वल्र्डकप मुकाबले में दाखिल हो रहा था कि आयोजक फीफा को पता लगा कि भारतीय टीम फुटबॉल के जूते नहीं पहनेगी, और नंगे पैर खेलेगी, तो उसमें भारत के खेलने पर रोक लगा दी थी। वह दिन है, और आज का दिन है कि भारत फिर कभी फुटबॉल विश्वकप में खेलने लायक दर्जा नहीं पा सका। और इस बार तो अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल एसोसिएशन फेडरेशन (फीफा) ने भारतीय फुटबॉल फेडरेशन को उसके घरेलू मामलों की वजह से कुछ वक्त के लिए सस्पेंड भी कर दिया था। इस देश में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खेलने की भी लंबी परंपरा है, लंबा इतिहास है, लेकिन जब फीफा ने विश्वकप के लिए टीमों को छांटा, और 32 टीमों की सीमा थी, तो उसमें हिन्दुस्तान का नंबर 106 था। मोरक्को से 37 गुना अधिक आबादी वाला यह देश 106 नंबर पर रहा, और मोरक्को इस टूर्नामेंट में खेलते हुए सेमीफाइनल तक पहुंचा।

हिन्दुस्तान जैसे देश को अपने देश में इस खेल की एक मजबूत बुनियाद होते हुए, इतनी बड़ी आबादी होते हुए भी दुनिया में 106 नंबर पर होने के बारे में सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि आज जब क्रिकेट के अलावा हॉकी जैसे दूसरे खेलों में भी भारत को कामयाबी और शोहरत मिल रही है, यहां की महिला खिलाड़ी भी बढ़-चढक़र कामयाब हो रही हैं, ओलंपिक और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिन्दुस्तान थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ रहा है, तो फुटबॉल जैसे कम खर्च वाले खेल की इस देश में बुनियाद कैसे मजबूत हो सकती है। फिलहाल जिन लोगों ने कल रात का यह फाइनल मैच नहीं देखा होगा, उन लोगों को इसका कोई रिपीट टेलीकास्ट जरूर देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अर्जेंटीना जैसे देश को इस जीत से कितना गौरव हासिल हुआ है। क्रिकेट से परे एक सस्ते और आसान खेल में भी संभावनाएं ढूंढनी चाहिए।

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