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दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेन्टीना एक बार फिर फुटबॉल का बादशाह बनकर सामने आया है। 18 दिसम्बर को कतर के लुसैल स्टेडियम में फीफा के फाइनल मुकाबले में अर्जेन्टीना और फ्रांस आमने-सामने थे। टक्कर बराबरी की थी। दोनों टीमें वर्ल्ड कप पर अपना नाम लिखवाना चाहती थीं। वैसे तो हर टीम जीतने के इरादे से ही मैदान में उतरती है।

लेकिन फ्रांस वर्ल्ड कप जीत के सिलसिले को लगातार दूसरी बार बरकरार रखना चाहता था, ताकि ब्राजील के 60 साल पुराने रिकार्ड की बराबरी कर सके। वहीं अर्जेन्टीना इस कप पर अपनी दावेदारी चाहता था, क्योंकि उसके कप्तान और दुनिया के महानतम खिलाड़ियों में से एक लियोनेल मेसी का यह आखिरी फीफा मैच था। रिकॉर्ड सात बार बेलोन डी ओर खिताब जीतने वाले मेसी ने एक भी वर्ल्ड कप नहीं जीता था और वे शिद्दत से चाहते थे कि उनकी कप्तानी में अर्जेन्टीना यह करिश्मा कर दिखाए।

रविवार रात को मेहनत और किस्मत के अनोखे मेल ने इस करिश्मे को सच कर दिखाया। जब मेसी ने वर्ल्ड कप उठाया, तो उसे हौले से चूमते हुए उन्होंने कहा मैं इसे बहुत शिद्दत से चाहता था। मुझे लग रहा था कि ईश्वर मुझे ये देंगे। ये मेरा लम्हा है।

एक यादगार जीत का ये लम्हा मेसी के साथ-साथ हजारों-लाखों फुटबॉल प्रेमियों का भी था। जीत और हार में एक लम्हे का ही फर्क होता है, लेकिन असल होता है वह जज्बा जो हर हाल में जूझने और संघर्ष करने का हौसला देता है। फ्रांस और अर्जेन्टीना के बीच का मैच महज 90 मिनट का नहीं था, जिसमें एक टीम, दूसरे पर भारी पड़ गई और मैच जीत लिया गया। बल्कि आखिरी तक सबकी सांसें थमी रहीं। दूसरे हाफ के बाद दोनों टीमें 2-2 और एक्सट्रा टाइम के बाद 3-3 से बराबर थीं। लेकिन फाइनल मैच का फै़सला पेनल्टी शूट आउट से हुआ, जो 4-2 से अर्जेंटीना के हक़ में रहा। इस तरह 1978 और 1986 के बाद 2022 में फिर से अर्जेन्टीना चैंपियन बन गई। इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने के लिए लाखों लोग अर्जेन्टीना की सड़कों पर उतरे और अपने एक और सितारा खिलाड़ी माराडोना को याद करना नहीं भूले।

फाइनल मैच में फ्रांस के लिए तीनों गोल उसके करिश्माई खिलाड़ी किलियन एमबापे ने किए। पूरे टूर्नामेंट में आठ गोल करने वाले एमबापे को ‘गोल्डन बूट’ मिला, लेकिन वर्ल्ड कप हाथ में उठा पाने का मलाल उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। ऐसे मौके पर उन्हें सांत्वना देने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो खुद मौजूद थे। अपने देश में खेल में राजनीति खूब देखी है और राजनीति के खेल भी देखते ही हैं।

धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर खिलाड़ियों से भेदभाव भी देखा है और उन्हें सरकार से मिलने वाले समर्थन और संसाधनों के लिए जूझते भी देखा है। खिलाड़ी जब अपने दम पर कुछ हासिल कर लेता है, तो औपचारिकता के साथ सरकारी बधाई तो मिल जाती है, लेकिन हारने पर ऐसा अनौपचारिक दिलासा शायद ही कभी मिले। बहरहाल, एमबापे के हाथ से इस बार मौका चूक गया, लेकिन उनके पास अभी और वक्त है। जबकि लियोनेल मेसी कतर से न केवल वर्ल्ड कप लेकर लौटे, बल्कि सात गोल करने की वजह से उन्हें प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट चुना गया।

फीफा वर्ल्ड कप अपने रोमांचक फाइनल मुकाबले के साथ-साथ और भी कई बातों के लिए लंबे वक्त तक याद किया जाएगा। इस बार का आयोजन एक अरब देश कतर में किया गया, जो दुनिया के नक्शे में बहुत छोटा है, लेकिन अपने बड़े इरादों से उसने भव्य आयोजन को अंजाम दिया। पूरे आयोजन के दौरान कतर में विदेशी मेहमानों का जमावड़ा लगा रहा। धर्म और संस्कृतियों के कारण दुनिया में जो दीवारें खड़ी हुई हैं, इस आयोजन ने उन दीवारों में नयी खिड़कियां बनाई हैं, ताकि लोग एक-दूसरे को थोड़ा और करीब से देखें और इस बात को फिर से समझें कि रीति-रिवाजों, भाषाओं, धर्मों का फर्क होने के बावजूद इंसान की सोच, व्यवहार और फितरत एक जैसी ही रहती हैं।

फुटबॉल पर यूरोप का दबदबा अधिक रहता है, लेकिन इस बार ये दबदबा टूटा है। अर्जेन्टीना ने वर्ल्ड कप में यूरोपीय देश फ्रांस को हराया है। हालांकि ये भी एक अजूबा है कि चैम्पियन बनी अर्जेंटीना की टीम को पहले ही मैच में सऊदी अरब के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। ये मैच में इतिहास में दर्ज हो गया है। फीफा में इस बार मोरक्को का बेहतरीन प्रदर्शन भी फुटबॉल प्रशंसकों को लंबे वक्त तक याद रहेगा।

वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले फीफा रैंकिंग में मोरक्को का स्थान 22वां था, मगर उसने स्पेन, पुर्तगाल जैसी टीमों को हराया और सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली अफ्रीक्री टीम बनने का खिताब रचा। जापान की टीम ने भी बेहतरीन खेल दिखाते हुए दो पूर्व विजेताओं जर्मनी और स्पेन को हराकर ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया।

खेल के साथ-साथ कई राजनैतिक, सामाजिक मुद्दे भी चर्चा का विषय बने। जिस तरह ईरान की टीम ने सरकार के कट्टर और संकीर्ण रवैये के खिलाफ राष्ट्रगान के दौरान चुप्पी साध ली, वह दृश्य बरसों तक शांतिपूर्ण विरोध और साहस की प्रेरणा देता रहेगा। इस आयोजन में मानवाधिकारों को लेकर भी सवाल उठे, खासकर प्रवासी मजदूरों के संबंध में। कुछ मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि वर्ल्ड कप की मेज़बानी के लिए निर्माण कार्यों के दौरान क़रीब छह हज़ार प्रवासी मज़दूरों की मौत हुई।

हालांकि आयोजकों ने ये कहा कि निर्माण कार्यों के दौरान 500 मज़दूरों की मौत हुई है। मृतक मजदूरों की संख्या चाहे हजारों में हो या सैकड़ों में, एक भी जान अगर किसी की लापरवाही या ज्यादती से जाती है, तो यह मानवाधिकार का उल्लंघन है। खेल केवल आनंद के लिए नहीं होते, ये कई बहुमूल्य गुण इंसान को सिखाते हैं, ताकि दुनिया को बेहतर बनाया जा सके। फीफा या किसी भी बड़े खेल आयोजन में मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो, तभी इनकी सार्थकता रहेगी।

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