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-सुनील कुमार।।

भाजपा की एक प्रवक्ता नुपूर शर्मा ने मोहम्मद पैगंबर के बारे में एक आपत्तिजनक बयान दिया था, और सोशल मीडिया पर उसका समर्थन करते हुए अमरावती के एक दुकानदार उमेश कोल्हे ने एक पोस्ट किया था। इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने मिलकर उमेश कोल्हे का कत्ल कर दिया था। ऐसा शक था कि सीसीटीवी कैमरों पर कैद मारने वाले लोग मुस्लिम थे जिन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हुए समर्थन के बदले यह कत्ल किया था। अब एनआईए ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश की है, और इस बीच उसने अमरावती के ही एक मुस्लिम समुदाय, तब्लीगी जमात के ग्यारह लोगों को गिरफ्तार किया था, और अभी चार दिन पहले उसने कोर्ट में चार्जशीट पेश की है जिसके मुताबिक उमेश कोल्हे के एक सोलह बरस पुराने दोस्त यूसुफ ने ही अपनी जमात के बाकी लोगों के साथ मिलकर यह कत्ल किया। चार्जशीट कहती है कि डॉ. यूसुफ उमेश कोल्हे का पुराना दोस्त था, और यूसुफ की बहन की शादी में मदद की जरूरत थी तो उमेश कोल्हे ने ही मदद की थी।

अभी हम एनआईए की रिपोर्ट को सच मानते हुए आगे की बात लिख रहे हैं। और यह जिक्र जरूरी इसलिए है कि हिन्दुस्तान में कभी-कभी जांच एजेंसियां जांच के नाम पर साजिश करते हुए भी मिली हैं, और किसी बेकसूर को फंसाते हुए भी। फिलहाल इस घटना, और अदालत में पेश इस चार्जशीट से कुछ लिखने की जरूरत लगती है। नुपूर शर्मा नाम की भाजपा की प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल के लाईफ टेलीकास्ट के दौरान मोहम्मद पैगंबर के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें कहीं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट तक ने देश में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के लिए जिम्मेदार कहा। नुपूर शर्मा का सिर काटने के लिए कुछ लोगों और संगठनों ने फतवे भी जारी किए, और तब से अब तक वे सामने नहीं आई हैं, या पाई हैं। जिस तरह के साम्प्रदायिक रूझान के साथ भाजपा की इस प्रवक्ता ने निहायत अवांछित, नाजायज, और भडक़ाऊ बातें कही थीं, वे बातें उनकी बाकी बकवास के साथ मेल खाती हुई थीं। उनका मकसद मुस्लिमों को जख्मी करना था, और वे अपने मकसद में कामयाब भी हुईं, अनहोनी बस यही हुई कि वे इस चक्कर में देश का कानून तोड़ बैठीं, और कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों को उन्होंने इतना अधिक विचलित कर दिया कि उन्होंने नुपूर शर्मा का सिर काटने का फतवा जारी कर दिया। अब जैसा कि सोशल मीडिया पर होता है, हर भडक़ाऊ बात के समर्थन में अनगिनत लोग जुट जाते हैं, और यह साबित करने लगते हैं कि उनके पास दिल-दिमाग चाहे न हों, उनके पास किसी भडक़ाऊ बात को आगे बढ़ाने के लिए उंगलियां जरूर हैं। कुछ ऐसा ही अमरावती के उमेश कोल्हे से हुआ, या उन्होंने किया। और इसके जवाब में स्थानीय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनकी जान ले ली। चूंकि ये सभी ग्यारह कातिल मुस्लिमों के एक ही सम्प्रदाय के थे, इसलिए जाहिर है कि उनका धार्मिक आधार पर एक-दूसरे से मिलना-जुलना भी रहा होगा, और वे धर्म के आधार पर जुड़े हुए लोग थे।

अब इससे यह तो साबित होता है कि धर्म के नाम पर जहां-जहां नफरत और आक्रामकता है, वहां-वहां लोगों में एकजुटता बड़ी तेजी से हो जाती है। नुपूर शर्मा को न जानते हुए भी उमेश कोल्हे ने उसका समर्थन किया, और उमेश कोल्हे के कत्ल के लिए दस तब्लीगी एकजुट हो गए। यह धर्म का आम मिजाज है कि वह घायल होने के लिए एक पैर पर खड़े रहता है, और अपने धर्म की तथाकथित रक्षा करने के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा करने को तैयार रहता है। जब-जब हिन्दू बहुत अधिक एकजुट होते हैं, एक बात बड़ी तेजी से उभरती है कि हिन्दुत्व खतरे में है। जब हिन्दू अलग-अलग रहते हैं, धार्मिक आयोजन कम होते हैं, तब हिन्दुत्व कभी खतरे में नहीं रहता। जब मुस्लिम एक कामगार की शक्ल में काम करते हैं, तब तक इस्लाम खतरे में नहीं रहता क्योंकि उनके पास काम करने की अपनी जरूरत रहती है। लेकिन जब कभी धार्मिक आधार पर वे जुटते हैं, इस्लाम खतरे में पडऩे लगता है। धर्म का मिजाज किसी दूसरे धर्म की दहशत दिखाकर अपने लोगों को एक करने, और फिर उन्हें दुहने का रहता है। धर्म के जो एजेंट ईश्वर और धर्मालु के बीच काम करते हैं, उनका अस्तित्व इसी पर टिका रहता है कि धर्मालुओं की भीड़ अपने को असुरक्षित महसूस करती रहे। अगर आस्थावान सुखी और सुरक्षित हो गए, उनके सिर पर कोई खतरा उन्हें नहीं दिखा, उन्हें अगर किसी दूसरे धर्म के लोगों का खतरा नहीं गिनाया जा सका, तो फिर वे अपने ईश्वर और उसके एजेंट के झांसे में कैसे आएंगे? इसलिए जिस तरह एक पुरानी कहानी में लोगों को भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया कहकर डराया जाता था, उसी तरह आज विधर्मी आया-विधर्मी आया कहकर डराया जाता है। यह डर लोगों को एकजुट करता है, संगठित करता है, और फिर जैसा कि धर्म का आम मिजाज रहता है, वह लोगों को नफरतजीवी और हिंसक भी बनाता है। उनसे दूसरों पर हमले करवाता है क्योंकि धर्म सहअस्तित्व को नहीं मानता। हर धर्म एकाधिकार की सोच पर काम करता है, और दूसरे धर्म को खतरा और खतरनाक मानता है। पूरी दुनिया में धर्मों का विस्तार इसीलिए किया गया कि बहुत अधिक लोगों से हिंसा करना मुमकिन नहीं था, और जब लोग अपने धर्म में आ जाएं, तो फिर उनसे हिंसा की जरूरत क्या है। दुनिया के इतिहास में धर्मों का विस्तार बहुत ही खूनी जंगों से भरा हुआ है, और वह जंग अलग-अलग शक्लों में आज भी जारी है।

हम सोशल मीडिया पर हर कुछ हफ्तों में दिल को छू लेने वाली असल जिंदगी की ऐसी कहानी पढ़ते हैं कि हिन्दू और मुस्लिम दोस्तों ने, समाज के लोगों ने दूसरे के लिए क्या किया। अब इस बीच जब इंसानियत पर धर्म हावी हुआ, तो उसने सोलह बरस पुरानी दोस्ती की भी परवाह नहीं की, और दोस्ती और इंसानियत का गला काटकर धर दिया। यह बिल्कुल धर्म के मिजाज के मुताबिक है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब जम्मू में एक छोटी सी मुस्लिम खानाबदोश लडक़ी के साथ एक मंदिर में पुजारी समेत आधा दर्जन हिन्दू लोगों ने बलात्कार किया था, और फिर उस बच्ची को मार डाला था, तो वहां के हिन्दू समाज ने राष्ट्रीय झंडा लेकर बलात्कारियों को बचाने के लिए जुलूस निकाले थे, और बड़े-बड़े भाजपा नेता उसमें शामिल हुए थे। वह भी धर्म का एक मिजाज था जिसने एक छोटी सी बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी और दूसरे लोगों द्वारा बलात्कार और हत्या को अनदेखा कर दिया था, और अपने धर्म के हत्यारे-बलात्कारियों को बचाने के लिए सडक़ों पर औरत-बच्चों को लिए हुए जुलूस निकालने लगा था, यह सिलसिला लंबे समय तक चला था, और उस मुस्लिम बच्ची के परिवार को कोई वकील मिलने से भी बाकी हिन्दू वकील रोक रहे थे। आखिर में जिस महिला वकील ने उसका मुकदमा लिया, उसे कई किस्म का सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा।

दुनिया में दोस्ती को बहुत ऊंचा माना जाता है, लेकिन अमरावती की इस घटना ने साबित किया है कि धर्म की हिंसा दोस्ती का भी गला काट सकती है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी में धर्म की अहमियत के बारे में चौकन्ना रहने की जरूरत है क्योंकि ईश्वर के प्रति निजी आस्था जब सार्वजनिक जीवन में संगठित होकर एक हमलावर तेवरों की शक्ल ले लेती है, तो फिर वह किसी भी हद तक हिंसक हो सकती है। धर्म की यह डरावनी हिंसा इंसानों को समझनी चाहिए जिन्होंने शेर को बनाकर प्राण फूंकने की एक कहानी की तरह धर्म को गढ़ तो लिया है, लेकिन वह धर्म आज उन्हें ही खा जा रहा है।
-सुनील कुमार

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