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ऊर्जा सुरक्षा और प्रौद्योगिकी सबसे पहली ज़रूरत.. सत्ता की वफादार पुलिस और बलि का बकरा आम जनता.. दम तोड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.. गरीब अडाणी का तो सत्यानाश हो गया.. प्रदूषण से दुनिया के शतरंज खिलाड़ियों के खेल पर खतरा.. महिला सशक्तिकरण से अधिक महिलाओं के नेतृत्व की ज़रूरत.. अडानी बना सरकार के गले की हड्डी.. अडाणी या धूमकेतु.?

हाल ही में दिल्ली में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। यहां की मॉडल बस्ती स्थित प्राथमिक शाला की दो शिक्षिकाओं के आपसी झगड़े के चलते 5वीं क्लास की बच्ची की जान खतरे में पड़ गई। गीता देशवाल नामक शिक्षिका ने वंदना नाम की बच्ची को पहले कैंची से मारा, फिर पहली मंजिल से फेंक दिया। पुलिस ने फ़ौरन गीता देशवाल को हिरासत में लिया और उस पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज कर लिया। पीड़ित बच्ची ने अस्पताल में बताया कि गीता ने उस पर पानी की बोतलें फेंकी और फिर उसे पकड़कर उसके बाल काटने लगी, जबकि क्लास में उसने कोई बदमाशी नहीं की थी। गीता देशवाल पर बच्चों को मारने-पीटने के आरोप पहले भी लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उसके ऐसे व्यवहार से परेशान होकर कुछ महिलाओं ने उसकी शिकायत भी की थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

इस हादसे को बमुश्किल चार ही दिन हुए थे कि कर्नाटक से भी ऐसे ही वाकये की ख़बर गई। इस सूबे के गडग जिले में हगली गांव के आदर्श प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक मुथप्पा ने चौथी क्लास के भरत नामक छात्र को फावड़े से पीटा, फिर उसे स्कूल की पहली मंजिल की बालकनी से धक्का दे दिया। इससे छात्र की मौत हो गई। पुलिस ने बच्चे के परिवार की शिकायत पर मुथप्पा के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। फिलहाल वह फरार है। पुलिस के मुताबिक मुथप्पा संविदा पर नियुक्त था और उसने भरत की माँ की भी पिटाई की थी, जो उसी स्कूल में एक शिक्षिका है। फिलहाल उसका स्थानीय अस्पताल में इलाज चल रहा है। पुलिस मुथप्पा की तलाश और पिटाई का कारण पता करने में जुटी है। हालांकि इस हादसे की वजह मुथप्पा और भरत के परिवार में कोई रंजिश मानी जा रही है।

हज़ारों किलोमीटर की दूरी पर स्थित देश के दो कोनों में कुछ ही दिनों के अंतराल से बच्चों के साथ एक जैसी घटनाएं होना एक दुखद और आश्चर्यजनक संयोग ही कहा जा सकता है। मुमकिन है कि मुथप्पा ने दिल्ली की घटना के बारे में पढ़ा या सुना हो और उससे दुष्प्रेरणा ग्रहण कर ली हो। हालांकि बच्चों के साथ हिंसा, उनका यौन शोषण या किसी और तरह से बाल अधिकारों की अवहेलना हमारे यहां कोई नई चीज़ नहीं है। कभी माँ-बाप की मज़ीर् से न चलने पर, कभी उनकी उम्मीदें पूरी न होने पर और कभी रोटी या मिठाई का एक टुकड़ा उठा लेने पर ही बच्चे अमानवीय प्रताड़ना का शिकार हो जाते हैं। घर-परिवार के ही किसी व्यक्ति द्वारा किसी बच्चे को हवस पूरी करने का साधन बना लेना आम बात है। दिल्ली और कर्नाटक में तो वे शिक्षक – जिन्हें माँ-बाप के बराबर माना जाता है, हैवानियत पर उतर आए।

गौरतलब है कि भारत ने बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के उस कन्वेंशन (1992) पर दस्तखत किए हैं, जिसमें बच्चों को सभी प्रकार के शारीरिक शोषण से बचाने के उपायों पर ज़ोर दिया गया है और सदस्य देशों पर किसी भी शारीरिक या मानसिक हिंसा, चोट या दुरुपयोग से बच्चों को बचाने की ज़िम्मेदारी लागू की गई है। इस कन्वेंशन से बहुत पहले हमारे संविधान में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार और गरिमा के साथ जीवन के अधिकार को शामिल किया गया है।

बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत भी शारीरिक दंड को शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ सम्मान के साथ जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है। अप्रैल 2013 में बच्चों के लिए अपनाई गई राष्ट्रीय नीति भी उनके खिलाफ होने वाली ‘सभी प्रकार की हिंसा’ से सुरक्षा देने की बात करती है, ख़ास तौर पर स्कूल में बच्चे को शारीरिक दंड से सुरक्षा प्रदान करती है।

पिछले साल मद्रास हाईकोर्ट ने शारीरिक दंड पर हैरानी जताई थी और कहा था कि तमाम कानूनी बंदिशों के बावजूद देश भर के स्कूलों और संस्थानों में बच्चों को शारीरिक दंड दिया रहा है। अदालत उस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक बच्चे को देर से स्कूल आने पर शारीरिक दंड दिया गया था और उसकी मौत हो गई थी। हालांकि मेडिकल रिपोर्ट में पाया गया कि मौत कुदरती वजहों से हुई थी। न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश ने कहा कि किसी बच्चे को शारीरिक दंड देना, दु:खद और अमानवीय प्रवृत्ति है। विद्वान न्यायाधीश ने उस शोध का भी उल्लेख किया, जिसके मुताबिक शारीरिक दंड के नतीजे गंभीर रूप से नकारात्मक होते हैं क्योंकि बच्चों के दिल-दिमाग पर इसका गलत असर होता है और उनमें हिंसक भावनाएं पनपती हैं। अदालत ने अंत में आरोपियों को बच्चे के परिजनों को 10 लाख का मुआवजा देने के निर्देश दिए।

ऐसा नहीं हो सकता कि स्कूलों के प्रबंधन और शिक्षकों को बच्चों से जुड़ी नीतियों और नियमों की जानकारी न होती हो और बच्चों की सज़ा को लेकर दिए गए अदालती फ़ैसले उनके कानों तक न पहुंचते हों। इसके बावजूद अगर किसी शिक्षक के हाथों किसी बेकसूर बच्चे की जान जाने की नौबत आ रही हो तो शिक्षा तंत्र को चलाने वालों को तुरंत चौकन्ना हो जाना चाहिए। शिक्षकों की ठेके पर नियुक्ति और पढ़ाना छोड़कर उन्हें दस तरह के कामों में जोतना बंद होना चाहिए। चिलचिलाती धूप या घनघोर बारिश में सड़क पर ट्राफिक संभालने वाले पुलिसकर्मियों की जिस्मानी और दिमागी सेहत की जैसी फ़िक्र हाल के बरसों में की जाने लगी है, वैसी ही फ़िक्र की ज़रुरत हमारे शिक्षकों के लिए भी है। कोई भी गुरु अपने विद्यार्थियों को गोविन्द के पैर छूने की सीख तभी दे सकता है, जब वह खुद कुंठाओं और परेशानियों से मुक्त हो।

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