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-सुनील कुमार।।
पिछले दिनों इसी जगह पर दो अलग-अलग दिन हमने दो अलग-अलग मुद्दों पर लिखा था, और आज उन दोनों को जोडक़र लिखने का एक मौका है। शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के एक फिल्मी डांस में दीपिका की भगवा-केसरिया बिकिनी को लेकर हिन्दुस्तान का एक बड़बोला तबका उबला हुआ है, और मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से लेकर तथाकथित साधू-संत तक सार्वजनिक रूप से कानूनी और गैरकानूनी धमकियां दे रहे हैं। दूसरा मुद्दा अमरावती का था जहां पर एक भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा के मोहम्मद पैगंबर के बारे में दिए गए आपत्तिजनक बयान को लेकर देश में कत्ल के जो फतवे चल रहे थे, उसमें नुपूर शर्मा के बयान के पक्ष में अमरावती के एक हिन्दू दुकानदार ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, और इसे लेकर मुस्लिमों के एक तबके ने इस दुकानदार के 16 बरस पुराने एक दोस्त की अगुवाई में उसका गला काटकर उसे मार डाला था। धर्म ने इंसानियत का गला काट दिया था, दोस्ती की मिसालों को भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। इन दोनों बातों पर हमने खुलासे से लिखा था, लेकिन हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता और धार्मिक हिंसा का नंगा नाच खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, इसलिए आज उस पर एक बार फिर लिखने की जरूरत है।
शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के फिल्मी डांस को लेकर अयोध्या के एक तथाकथित महंत परमहंस आचार्य ने यह धमकी दी है कि शाहरूख खान अगर मिल गया तो उसे वे जिंदा जला डालेंगे, और अगर किसी और ने शाहरूख को जलाने का साहस किया तो उसका मुकदमा वे (महंत) खुद लड़ेंगे। खबरें बताती हैं कि यह तथाकथित महंत पहले भी एक बार घोषणा कर चुका है कि अगर भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया गया तो वह जल समाधि ले लेगा, लेकिन फिर शायद धरती का जल उसके लिए कम पड़ गया। एक दूसरे तथाकथित महंत राजूदास ने लोगों से कहा है कि जहां भी पठान फिल्म दिखाई जाए, उस थियेटर को आग लगा दें, नहीं तो बात उनकी समझ में नहीं आएगी। हिन्दुत्व के हमलावर फौजियों ने सोशल मीडिया पर इस किस्म की बहुत सारी धमकियां लिखी हैं, जिनका अलग-अलग जिक्र मुमकिन नहीं है।

अब यह सब कुछ केन्द्र सरकार, अलग-अलग राज्य सरकारों, और देश की तमाम अदालतों, संवैधानिक आयोगों की नजरों के सामने हो रहा है। ऐसी हालत में एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि अपने नाम और चेहरे सहित जो लोग अपने को एक धर्म का महंत बताते हुए हिंसा का फतवा दे रहे हैं, खुद कत्ल करने की घोषणा कर रहे हैं, उनके खिलाफ सरकारों की पुलिस कोई जुर्म दर्ज क्यों नहीं कर रही है? सुप्रीम कोर्ट ने अभी कुछ महीने पहले ही नफरती बयान देने वाले लोगों पर मुकदमे दर्ज करने का जिम्मा उनके इलाके की पुलिस पर डाला था, और यह भी कहा था कि अगर अफसर यह काम नहीं करेंगे, तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। अब एक गाने में एक हिन्दू अभिनेत्री के पहने हुए कपड़े के रंग को लेकर अगर मुस्लिम अभिनेता को जिंदा जलाने की बात हो रही है, तो इससे बड़ी हेट-स्पीच और क्या हो सकती है? यह फिल्म एक हिन्दू सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनी है, इसकी कहानी एक और हिन्दू श्रीधर राघवन ने लिखी है, फिल्म का निर्माण आदित्य चोपड़ा नाम के प्रोड्यूसर ने यशराज फिल्म्स नाम की एक हिन्दू की कंपनी के लिए किया है। इसके बाद अगर फिल्म के अभिनेता को मुस्लिम होने की वजह से जिंदा जलाने की बात हो रही है, उसकी ऐसा करने की कसम खाई जा रही है, दूसरों को उकसाया जा रहा है कि अगर वे शाहरूख को जिंदा जला दें तो वे (महंत) उसका मुकदमा लड़ेंगे, तो फिर इस हेट-स्पीच पर अगर यूपी की पुलिस मुकदमा दर्ज नहीं कर रही है, तो क्या वह सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के दायरे में नहीं आ रही है?

सुप्रीम कोर्ट को तो मध्यप्रदेश के गृहमंत्री से भी सवाल करना चाहिए कि संविधान की शपथ लेने के बाद वे संविधान को कुचलने वाला यह बयान कैसे दे रहे हैं, और इसे संविधान के खिलाफ किया गया काम मानकर उन पर कार्रवाई क्यों न की जाए? सरकारी और अदालती कामकाज में कुछ बातें नजीर बन जाती हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस किस्म के कुछ मामलों में लोगों को कटघरे में घसीटना चाहिए, और वहां से जेल भेजना चाहिए। धर्म के नाम पर दुकानदारी करने वाले 10-20 लोग और संविधान की शपथ लेकर संविधान पर थूकने वाले 10-20 लोग अगर जेल भेजे जाएंगे तो इस देश से हिंसक, साम्प्रदायिक, और नफरती बकवास कम हो सकेगी। आज तो सुप्रीम कोर्ट अपनी खुद की दी गई चेतावनी को लेकर नाखून और दांत खो बैठे एक ऐसे प्राणी की तरह दिख रहा है जो कि लाचार है, और जिसके बस का कुछ नहीं रह गया है। जब देश में इस तरह की साम्प्रदायिक हिंसा की एक परंपरा विकसित की जा रही है, तब अदालत को दखल देनी होगी क्योंकि देश की सरकार, अधिकतर प्रदेशों की सरकारें इस हिंसा के साथ खड़ी दिख रही हैं, सरकारों में बैठे हुए बड़े-बड़े मंत्री ऐसे खुले फतवे दे रहे हैं, संसद में बाहुबल का संतुलन साम्प्रदायिकता के पक्ष में इतना अधिक झुका हुआ है कि साम्प्रदायिकता विरोधी लोग पासंग में भी नहीं बैठ रहे हैं। ऐसे माहौल में देश की न्यायपालिका की एक बड़ी जिम्मेदारी बनती है, और उसे इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को उठाना चाहिए, वरना इतिहास में यह अच्छी तरह दर्ज होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जज महज अपनी सहूलियतों को लेकर, अपनी लंबी छुट्टियों के हक को लेकर लड़ते रहे हैं, और देश की आम जनता को उन्होंने एक छोटे और हिंसक तबके के सामने ठीक उसी तरह छोड़ दिया जिस तरह रोम में शेर के सामने निहत्थे इंसान को छोडक़र स्टेडियम में बैठे बाकी लोग उसका मजा लेते थे। सुप्रीम कोर्ट अगर अपनी ही चेतावनी, अपने ही हुक्म की अवमानना की फिक्र नहीं कर रहा है, तो इससे देश की जनता के हक कुचले जा रहे हैं, और देश की हवा जहरीली होती जा रही है।
-सुनील कुमार

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