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-सुनील कुमार।।

नए साल का मौका बहुत से नए संकल्पों का भी रहता है। लोग अपनी कुछ बुरी आदतों को छोडऩा तय करते हैं, और नए साल के पहले दिन से कुछ अच्छी आदतें पकडऩे का पक्का इरादा रखते हैं। पहला हफ्ता गुजरते गुजरते साल भर के लिए किए गए अधिकतर संकल्प गुजर जाते हैं। जो लोग क्रिसमस और नए साल के मौके पर बच्चों की जिद में उनके लिए कुत्ते-बिल्ली लेकर आते हैं, उनकी बेरहम बिदाई भी अगले कुछ महीनों में होने लगती है, और जनवरी के बाद जल्द ही दुनिया ऐसे लावारिस पालतू जानवरों को देखती है, और इनके पुनर्वास में लगी संस्थाएं एक मुश्किल दौर से गुजरती हैं कि इतने जानवरों के लिए नए घर कहां से ढूंढे जाएं। लेकिन जिस तरह कुदरत में सालाना पतझड़ का एक दौर आता है, वैसा ही एक दौर दीवारों पर से कैलेंडर के टपकने का होता है, और नए पत्तों की तरह नए साल का कैलेंडर दीवारों पर उग आता है।

ऐसे माहौल के बीच जब लोगों को अपनी-अपनी जिंदगी में कई नई चीजें तय करने का मौका मिलता है, तो नए साल के ऐसे मौके का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। संकल्प आमतौर पर इसीलिए लिए जाते हैं कि जितने वक्त तक उन्हें ढोया जा सके, ढो लिया जाए, और बाद में उन्हें सहूलियत के साथ भुला दिया जाए। लेकिन जिन लोगों के संकल्प कायम रह जाते हैं, वे लोग तो कामयाब होते ही हैं, और ऐसी कामयाबी की कोशिश में ही हर किसी को नए साल के मौके पर कुछ न कुछ तो तय करना चाहिए, और तय करने से परे भी कुछ चीजों के बारे में सोचना चाहिए। अब हिन्दुस्तान में रहते हुए आम लोग अगर रूस और यूक्रेन में से किसी एक से कोई रिश्ता याद रख पाते हैं, तो वह सोवियत संघ के समय से रूस के साथ भारत की दोस्ती है, जिसके चलते भिलाई इस्पात संयंत्र जैसे कारखाने बने हैं, और अंतरराष्ट्रीय मुसीबत के समय रूस ने जिस तरह भारत का साथ दिया था, वह भी भारत के लोगों को याद है। लेकिन वह दौर निकल गया है, और आज खुद रूस अपने इतिहास से कुछ परे-परे चल रहा है, और जिस अंदाज में वह रात-दिन यूक्रेन की नागरिक आबादी पर हमले कर रहा है, उसे अनदेखा करना ठीक नहीं है। इसलिए लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज दुनिया का एक सबसे ताकतवर देश किस तरह एक छोटे पड़ोसी देश को खत्म करने पर आमादा है, और हिन्दुस्तानी नागरिक इसमें सीधे कोई दखल चाहे न दे सकें, उन्हें इसकी जानकारी तो रखनी चाहिए, यूक्रेन के हित में न सही, अपने खुद के हित में इस अंतरराष्ट्रीय जुल्म को समझना चाहिए। इसी तरह लोगों को यह भी समझना चाहिए कि इजराइल में आज एक कैसी कट्टरपंथी और जुल्मी सरकार बन रही है जो कि फिलीस्तीन को धरती से मिटा देने पर आमादा है। इस पर न महज फिलीस्तीनी, बल्कि दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी फिक्रमंद हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ सहित। कुल मिलाकर हमारा यह सोचना है कि नया साल निजी अच्छी और बुरी आदतों को पकडऩे और छोडऩे से परे एक सरोकार की सोच का भी रहना चाहिए जिसमें हम उन लोगों के बारे में सोचें जिनसे हमारी जिंदगी सीधी-सीधी जुड़ी हुई नहीं है। अफगानिस्तान में तालिबान नाम के दहशतगर्द आतंकी सरकार चलाते हुए अपनी महिलाओं और लड़कियों के साथ किस तरह का अमानवीय बर्ताव कर रहे हैं, इससे हिन्दुस्तान की जिंदगी पर आज तो सीधे-सीधे असर नहीं पड़ रहा है, लेकिन लोगों को इसे समझना चाहिए क्योंकि आज नहीं तो कल इन्हीं तालिबानों से हौसला पाकर दूसरे देशों में दूसरे धर्मों के लोग भी ऐसी ही तालिबानी हरकतें करेंगे, और हिन्दुस्तान इनसे अछूता नहीं रह जाएगा, आज भी अछूता नहीं है।

दुनिया पर एक नजर दौड़ाने के बाद हम हिन्दुस्तान लौटें तो यहां भी इस किस्म की ज्यादतियां कम नहीं हैं, और इस नए साल का एक संकल्प यह भी हो सकता है कि देश के कुछ लोगों पर, और कुछ तबकों के साथ होने वाले ऐसे जुल्म के बारे में हम कम से कम पढ़ेंगे तो सही, बातों को समझेंगे तो सही, और कुछ कहेंगे। कहने के लिए लोगों के पास मुफ्त का सोशल मीडिया हासिल है जिस पर कोई खर्च नहीं लगता है, महज जरा सा हौसला लगता है सच कहने के लिए, और सच का होने वाला विरोध झेलने के लिए। हिन्दुस्तान के भीतर आज अलग-अलग तबकों के साथ जितने किस्म के जुल्म चल रहे हैं, उन्हें अनदेखा करना बंद करने का एक संकल्प भी लोगों को लेना चाहिए क्योंकि इसके बिना यह लोकतंत्र अधिक लंबा नहीं चल पाएगा। इसको खत्म करने की कोशिशें तेज होती चल रही हैं, और अगर माहौल ऐसा ही रहा तो इसकी जिंदगी बहुत लंबी भी नहीं रहेगी। इसलिए जिंदा कौमों की तरह हिन्दुस्तानियों को देखने, सोचने, समझने, और मुंह खोलने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए, और नए साल का मौका यह सोचने का भी हो सकता है कि किस तरह लोग दिन का थोड़ा सा वक्त ऐसी कड़वी हकीकत को जानने और उस पर कुछ करने में भी लगाएंगे।

नए साल का मौका यह तय करने का भी हो सकता है कि लोग अपने-अपने दायरे में किस तरह कुछ लोगों को एकजुट करके कुछ नेक काम कर सकते हैं। इसी जगह दस बरस से भी पहले हमने अपने खुद का एक इरादा लिखा था कि समाज में थोड़ी-बहुत भी पकड़ रखने वाले लोग दस-दस लोगों का ऐसा समूह तैयार कर सकते हैं जो कि अपने आसपास के और दस-दस लोगों के घरों से बेकार सामान को इकट्ठा करें, और उसे जरूरतमंद लोगों के बीच बांटें। अगर कुल दस लोग कमर कस लें, और इनमें से हर कोई अपने इर्द-गिर्द के दस-दस घरों का जिम्मा ले, तो महीने में दो-चार घंटे देकर ही सौ घरों का फालतू सामान लाया भी जा सकता है, और जरूरत की जगह पर पहुंचाया भी जा सकता है। दुनिया के अलग-अलग देशों और शहरों में बहुत से लोग इसी तरह की पहल करते हैं, और उनमें से कुछ कोशिशें दुनिया की सबसे बड़ी कोशिशें हो जाती हैं। पाकिस्तान में ईधी फाउंडेशन बनाकर पूरे देश में एम्बुलेंस सेवा का जाल बिछा देने वाले एक बुजुर्ग की लोगों को याद होगी जिन्होंने भारत से किसी गलती से पाकिस्तान चली गई एक मूकबधिर लडक़ी गीता को आसरा दिया था, और उस मुस्लिम परिवार में वह अपने हिन्दू धर्म के साथ बड़ी हो रही थी, और पांच-दस बरस पहले वह हिन्दुस्तान लाई गई थी। अब कट्टरपंथ और धर्मान्ध आतंक के शिकार पाकिस्तान के भीतर अब्दुल सत्तार ईधी नाम के एक सज्जन ने 1951 में जो समाजसेवी संगठन शुरू किया था, वह न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी समाजसेवी एम्बुलेंस सेवा चला रहा है। एक अकेले इंसान की शुरू की हुई एक पहल, उसका रोपा गया एक पौधा किस तरह इतिहास का सबसे बड़ा बरगद बन सकता है और जरूरतमंदों को अपनी छांह दे सकता है यह देखने की जरूरत है।

इसलिए नए साल के इस मौके पर हम लोगों को बस उन बातों को याद दिला रहे हैं जो कि उन्हीं के बीच के, उन्हीं के सरीखे आम लोगों ने कभी शुरू की थी, और जो कोशिशें बढक़र कभी बाबा आम्टे बनीं, कभी मदर टेरेसा बनीं, और कभी रेडक्रॉस जैसी संस्था बनी। लोगों को नेक काम की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए। नेक काम शुरूआत में कुछ महत्वहीन से दिखते हैं, चर्चा से परे रहते हैं, लेकिन जब वे पनपते हैं, तो दूर-दूर तक उनकी हरियाली का खूबसूरत नजारा दिखता है, और खूब सारे लोगों को उनकी छांह मिलती है, उसके फल मिलते हैं। इसलिए चाहे खून देने जैसी छोटी पहल हो, चाहे अंगदान करने जैसे दानपत्र भरने हों, ऐसे बहुत से कामों के बारे में सोचना चाहिए, आसपास के लोगों से उसकी चर्चा करनी चाहिए, और अपने बीच उनकी संभावनाएं देखनी चाहिए।

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