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-सुनील कुमार।।

अमरीका के सबसे चर्चित शहर न्यूयॉर्क में वहां के गवर्नर ने मानव शरीर को खाद में बदलने को कानूनी इजाजत दे दी है। इसके पहले अमरीका के कई और प्रदेश ऐसी इजाजत दे चुके हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि किसी शव को खाद के ढेर पर या गड्ढे में डाल दिया जा सकेगा, इसके लिए अलग से बनाए गए अंतिम संस्कार सेंटरों में उसे छोडऩा होगा जहां उन्हें वैज्ञानिक तरीके से ऐसे माइक्रोब के बीच छोड़ दिया जाएगा जहां वे उस शरीर को खाद में बदल देंगे। इससे अंतिम संस्कार में लगने वाले ताबूत, और बाकी दुनिया भर की चीजों, कब्र की जगह, उस पर लगने वाले पत्थर, इन सबसे बचा जा सकेगा, और धरती पर बोझ घटेगा। कुछ धर्मों में वैसे भी मरने के बाद शरीर को पंचतत्वों में विलीन कर देने, खाक में मिला देने, या चील-कौवों को खिला देने जैसी सोच बनी हुई है, अभी अमरीका के इन आधा दर्जन राज्यों में जो किया जाने वाला है, वह बिना कब्र बनाए मिट्टी में दफना देने किस्म का ही काम है जिसमें शरीर तेज रफ्तार से खाद में चाहे न बदले, वह पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाए बिना दफन हो जाता है, और जमीन के भीतर जाहिर है कि तरह-तरह के कीड़े उसे खाकर खत्म कर देते हैं। अब ऐसे दफन से, या हिन्दुओं के जलाने वाले अंतिम संस्कार से धरती को कुछ वापिस हासिल नहीं होता, लेकिन अमरीका में यह नया चलन धरती को खाद देता है, और एक शरीर से करीब 36 बोरे खाद मिल सकेगी। लोग जीते-जी अपनी अंतिम इच्छा लिखकर जा सकेंगे कि वे अपना अंतिम संस्कार किस तरह से चाहेंगे, और क्या वे खाद में बदल जाना चाहेंगे।

लोगों को मृतकों के शरीर से निपटने के बेहतर तरीके सोचने चाहिए। हिन्दुस्तान के कुछ शहरों में बिजली से चलने वाले शवदाह गृह काम कर रहे हैं, और कई शहरों में गैस से चलने वाले। इन दोनों का खर्च लकड़ी से शव जलाने के मुकाबले कम आता है, वक्त भी कम लगता है, प्रदूषण भी शायद कम ही होता है, लेकिन कई किस्म के धार्मिक रीति-रिवाजों की गुंजाइश इनमें कम रहती होगी, इसलिए पेशेवर पंडित इसका समर्थन नहीं करते हैं। वैसे भी अगर अंतिम संस्कार के रीति-रिवाजों में कटौती हो जाए, तो फिर पंडितों के जजमान तो खत्म ही हो जाएंगे। लेकिन शव को जलाने का मतलब कुछ क्विंटल लकडिय़ों को साथ जलाना होता है, जिससे धरती पर घटते हुए पेड़ों पर एक हमला होता ही है। फिर इसके साथ-साथ कई किस्म का प्रदूषण भी होता है, और सच तो यह है कि अंतिम संस्कार में पहुंचने वाले लोगों का बहुत सा वक्त भी लगता है। इसलिए अगर कोई बेहतर तरीका सोचा जा सकता है तो उससे कई किस्म की बचत हो सकती है।

सबसे अच्छा तो यही हो सकता है कि लोग मरने के पहले अपने अंगदान करने की घोषणा कर जाएं, और अगर वे ऐसी मेडिकल हालत में पहुंच जाएं कि उनकी दिमागी मौत हो चुकी रहे, तो घरवालों को उनके अंगदान के बारे में सोचना चाहिए। अब तो बहुत से मामलों में छोटे-छोटे बच्चों के गमगीन मां-बाप भी उनका अंगदान करके कई लोगों को जिंदगियां देते हैं, और उनके बच्चे कई अलग-अलग लोगों की शक्ल में जिंदा रहते हैं। अगर ऐसी नौबत न रहे तो भी लोग अपना शरीर मेडिकल कॉलेज को देकर जा सकते हैं जहां पर चिकित्सा-छात्र-छात्राओं को मानव शरीर समझने के लिए मृत शरीरों की हमेशा ही कमी रहती है। ऐसा भी बहुत से लोग करते आए हैं, और इस तरीके से भी अंतिम संस्कार में होने वाली लकड़ी या दूसरे किस्म की बर्बादी बचती है, लोगों का वक्त बचता है।

अलग-अलग धर्मों में मृत शरीर के अलग-अलग किस्म के निपटारे के तरीके हैं। पारसी समुदाय में मृतकों की लाश को उनके पूजा स्थल पर एक ऊंचे टॉवर पर रख दिया जाता है, जहां पंछी उन्हें खाकर खत्म कर देते हैं। हिन्दुस्तान में ही कई जगहों पर लकड़ी की कमी से गरीब अपने लोगों के अंतिम संस्कार करने के बजाय लाशों को नदी में बहा देते हैं जिससे प्रदूषण का खतरा रहता है क्योंकि इन्हीं नदियों से किनारे के गांव-कस्बों, और शहरों में पीने का पानी जाता है। अमरीका में बिना किसी धार्मिक आधार के पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से शव को खाद में बदलने का जो काम शुरू हुआ है, वह बाकी दुनिया के लिए भी बड़ा दिलचस्प हो सकता है जहां कब्रगाह के लिए जगहें कम पड़ रही हैं, और अब तो जमीन न रह जाने से बहुमंजिला कब्रगाह बन रही है जहां लोगों को महज ताबूत जितनी जगह मिलती है, और सामने नाम की तख्ती लग जाती है। अभी ब्राजील में दुनिया के सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी पेले का अंतिम संस्कार ऐसी ही एक बहुमंजिला कब्रगाह में किया गया है जिसमें 32 मंजिला ढांचे में 16 हजार कब्रे हैं। आज बड़े शहरों से लेकर गांवों तक कब्रिस्तान और श्मशान की जगहें कम पडऩे लगी हैं, लोगों में झगड़े हो रहे हैं, एक ही धर्म के भीतर अलग-अलग सम्प्रदायों के लोगों के बीच अंतिम संस्कार की जगह के झगड़े होने लगे हैं। ऐसे में बिना धार्मिक आधार के, सिर्फ वैज्ञानिक सोच के साथ होने वाले ऐसे अंतिम संस्कार शायद सबसे अच्छे हो सकते हैं जो कि जाने के बाद भी खाद बनकर पौधों की शक्ल में जिंदा रह सकें। इस बारे में लोगों को सोचना चाहिए। और यह तकनीक ऐसी हो सकती है कि लोगों के शरीर की खाद उनके ही गांव-कस्बे या शहर के खेतों में काम आ सके। हिन्दुस्तान में वैसे भी बहुत से लोग शवदाह के बाद बचने वाली राख को नदियों में विसर्जित करते हैं, या खेतों में डालते हैं। नेहरू भी अपनी अस्थियों को इन्हीं दो जगहों पर बिखेर देने की इच्छा जाहिर कर गए थे। हालांकि नेहरू यह लिख गए थे कि उनका अंतिम संस्कार किसी धार्मिक रीति-रिवाज से न किया जाए, लेकिन इर्द-गिर्द के नेताओं के दबाव में इंदिरा ने हिन्दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया था, और फिर उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित की गईं, और विमान से भारत के खेतों पर बिखरा दी गई थीं।

अमरीका में जिस तकनीक से यह अंतिम संस्कार किया जा रहा है, वह कोई मुश्किल बात नहीं है, और हिन्दुस्तान तो किसान आबादी और खेतों से भरा हुआ देश है। अगर यह सोच यहां पर बढ़ निकली, तो यहां के पेड़ों पर से दबाव घटेगा, धरती का बेहिसाब बेजाइस्तेमाल थमेगा, और प्रदूषण भी रूकेगा। और लोग खाद बनकर पौधों और पेड़ों से होकर हमेशा के लिए जिंदा रह सकेंगे।

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