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-सुनील कुमार।।

अमरीकी संसद के निचले सदन, हाऊस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत के बाद भी उस पार्टी का स्पीकर बनना नहीं हो पा रहा है क्योंकि प्रत्याशी केविन मैक्कार्थी का उन्हीं की पार्टी के कई सांसद विरोध कर रहे हैं, और खुलकर उनके खिलाफ वोट दे रहे हैं। अमरीका की संवैधानिक व्यवस्था के तहत यह वोटिंग बार-बार होते रहेगी, जब तक कि किसी उम्मीदवार को बहुमत मिल जाए। अब तक छह बार वोट डल चुके हैं, लेकिन रिपब्लिकन सांसदों में से कुछ लोग अपनी पार्टी के इस उम्मीदवार के खिलाफ हैं, और वोट डालने के अलावा वे बार-बार बयान भी दे रहे हैं। जब तक स्पीकर का चुनाव नहीं हो जाता, तब तक ये वोट इसी तरह डलते रहेंगे, और अमरीकी संसद में यह नौबत करीब सौ साल के बाद आई है। इस संसद के इतिहास में कुल सात बार ऐसा हुआ है जब तीन बार से अधिक वोट डाले गए। जब तक स्पीकर चुन नहीं लिया जाता तब तक न तो नए सांसद शपथ ले सकते, और न ही कोई संसदीय कामकाज हो सकता। एक बार तो इस संसद के इतिहास में स्पीकर चुनने का सिलसिला करीब दो महीने तक चला था, और 133 बार वोट डाले गए थे। यह वाकया 1855 का है, संसद गुलामों के मुद्दे पर बुरी तरह से बंटी हुई थी, और शुरू में स्पीकर के लिए 21 उम्मीदवार थे, जो घटते-घटते कम हुए, लेकिन आखिर में 133वीं बार के मतदान से स्पीकर का चुनाव हुआ था।

अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा में कौन स्पीकर बने इसमें हमारी इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन इस पर लिखने की एक वजह है। इससे यह पता लगता है कि एक पार्टी का उम्मीदवार संसद के भीतर अपनी ही पार्टी के 18-20 सांसदों का विरोध किस तरह झेलता है, और स्पीकर नहीं बन पाता। इसके लिए किसी दूसरी पार्टी को सांसद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, बगावत करवाने की जरूरत नहीं पड़ती, और वहां की प्रचलित संसदीय व्यवस्था, और राजनीतिक परंपराओं के तहत ही ऐसा हो रहा है। अब अगर हिन्दुस्तान में मुख्यमंत्री या विधानसभा अध्यक्ष चुनने की बात आए, तो पहले थोड़े-बहुत विधायक बिकते थे, अब दल-बदल विधेयक की वजह से वे थोक में बिकते हैं, और एक अनुपात से अधिक फूट होने पर ही विधायक दल बंटा हुआ माना जाता है, और उसे दल-बदल नहीं माना जाता। मतलब यह कि थप्पड़ मारना जुर्म है, और कत्ल करने पर कोई सजा नहीं है। अमरीका के इस ताजा मामले को देखते हुए हिन्दुस्तान के दल-बदल कानून के बारे में एक बार फिर सोचने की जरूरत है कि क्या यह सचमुच ही असरदार साबित हो रहा है, या फिर यह सांसदों और विधायकों की मंडी में थोक में खरीद-बिक्री को बढ़ाने वाला साबित हो रहा है?

आज भारतीय संसदीय व्यवस्था में संसद और विधानसभाओं में किसी छोटे से छोटे मुद्दे पर भी अगर वोट डालने की नौबत आती है, तो तमाम राजनीतिक दल अपने सांसदों या विधायकों को एक पार्टी व्हिप जारी करते हैं जिसके बाद वे अगर उसके खिलाफ वोट डालते हैं, तो उनकी सदस्यता खत्म हो सकती है। मतलब यह कि विधायकों या सांसदों के निजी विवेक को पार्टी के फैसले से एक फौलादी जंजीर से बांध दिया गया है, और वे उससे परे नहीं जा सकते। यह बात तो वोटिंग के समय की है, वोटिंग से परे की भी सोचें, तो संसदीय बहस के दौरान भी हिन्दुस्तान के सांसदों और विधायकों को यह आजादी नहीं रहती कि वे पार्टी की तय की गई सोच से परे की कोई बात कर सकें। पार्टी अनुशासन के नाम पर निजी विवेक को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है, और अब वह किसी पार्टी के संसदीय दल के सामूहिक फैसले से परे कुछ भी नहीं है। यह बात पहले भी हमें खटकती रही है कि भारतीय मतदाता किसी को अपना सांसद या विधायक सिर्फ पार्टी निशान पर नहीं बनाते हैं, बल्कि वे उम्मीदवार के निजी व्यक्तित्व, उनकी निजी सोच को भी ध्यान में रखकर उसे वोट देते हैं। लेकिन एक बार चुन लिए जाने के बाद संसद या विधानसभा में उनके सारे फैसले पार्टी के हुक्म के मुताबिक होते हैं जिससे कि उनके मतदाताओं की उम्मीद भी पूरी नहीं हो सकती, और ऐसे निर्वाचित सदस्यों की निजी सोच और समझबूझ का कोई फायदा भी सदन को नहीं मिल पाता। जब कभी एक निर्वाचित प्रतिनिधि के हिस्से का फैसला उसका संगठन करने लगता है, तो उस सांसद या विधायक की प्रतिभा का फायदा संसदीय व्यवस्था को नहीं मिल पाता। भारत में आज अगर कोई पार्टी कोई बुरे से बुरा उम्मीदवार खड़ा कर दे, तो उसके खिलाफ पार्टी के लोग तभी वोट दे सकते हैं जब वे बिक चुके हों, उसके पहले तक उन्हें पार्टी के सामूहिक फैसले को ही मानना पड़ता है।

हर लोकतांत्रिक और संसदीय व्यवस्था को इस किस्म की दूसरी व्यवस्थाओं के तजुर्बों और उनकी मिसालों से सीखना चाहिए। इसीलिए हम अलग-अलग देशों से सामने आने वाली अलग-अलग व्यवस्थाओं पर चर्चा करते हैं। अमरीका में किसी को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाते हुए जिस तरह वहां की संसदीय कमेटी उस संभावित जज के इतिहास से लेकर उसकी आत्मा तक सबको टटोल लेती है, वह भी हमें भारत में अमल में लाने लायक एक बात लगती है जहां पर आज सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम नाम तय करने का एकाधिकार रखता है, और उसे मंजूर या नामंजूर करने का काम केन्द्र सरकार के हाथ रहता है। इस व्यवस्था को लेकर भी आज कई लोगों का यह मानना है कि भारतीय संविधान बनाने वाले लोगों ने ऐसी कॉलेजियम प्रणाली की कल्पना नहीं की थी। ठीक उसी तरह आज यह मामला भी लग रहा है कि संसद के भीतर क्या सांसदों को पार्टी अनुशासन से परे अपने निजी विवेक से वोट देने का हक रहना चाहिए? और खासकर दल-बदल कानून आने के बाद से चिल्हर में दल-बदल गैरकानूनी, और थोक में दल-बदल कानूनी हो जाने का तजुर्बा देखते हुए क्या ऐसे कानून का कोई फायदा दिखता है?

फिलहाल अमरीकी संसद का निचला सदन, प्रतिनिधि सभा, को छह बार वोट डालने के बाद भी थकान नहीं है, क्योंकि उसके पास 133 बार के मतदान की एक ऐतिहासिक मिसाल है। वहां की संसद सदन में सांसदों की निजी राय को पार्टी के किसी भी हुक्म के ऊपर महत्व देते दिख रही है, और शायद यह लोकतंत्र की जिंदादिली का एक सुबूत भी है। अमरीकी राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनने के पहले अपनी पार्टी के भीतर देश भर में घूमकर पार्टी के वोटरों के बीच अपनी काबिलीयत साबित करने की व्यवस्था सबकी देखी हुई है, और विपक्षी उम्मीदवार से मुकाबले के पहले अपनी ही पार्टी के प्रतिद्वंद्वी से कड़े मुकाबले की परंपरा पार्टी के भीतर के सबसे लोकप्रिय और कामयाब व्यक्ति को सामने रखती है। इसके मुकाबले भारत के राजनीतिक दलों में उम्मीदवार तय करना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसमें कुछ भी पारदर्शी नहीं है। जरूरी नहीं है कि इसमें से हर बात हिन्दुस्तान में अमल के लायक हो, लेकिन दूसरी संसदीय व्यवस्थाओं की ऐसी मिसालों को ध्यान से देखते हुए ही बाकी लोकतंत्र परिपक्व हो सकते हैं।

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