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केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने लैंगिक भेदभाव खत्म करने की एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए हाल ही में एक आदेश जारी किया है कि सभी स्कूली शिक्षकों को ‘सर’ या ‘मैडम’ के बजाय ‘टीचर’ शब्द से ही संबोधित किया जाना चाहिए। आयोग के मुताबिक ‘सर’ या ‘मैडम’ के बजाय ‘टीचर’ शब्द लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं रखता। दरअसल शिक्षकों को ‘सर’ या ‘मैडम’ संबोधित करने से होने वाले भेदभाव को खत्म करने के मकसद से एक व्यक्ति ने याचिका दाखिल की थी, जिस पर विचार करते हुए आयोग ने यह आदेश जारी किया है। आयोग का कहना है कि ‘सर’ या ‘मैडम’ के बजाय ‘टीचर’ कहने से सभी स्कूलों में बच्चों के बीच समानता बनाए रखने में मदद मिल सकती है और शिक्षकों के प्रति उनका लगाव भी बढ़ेगा। बाल अधिकार आयोग का यह आदेश दूरदर्शितापूर्ण है, क्योंकि बच्चे जब शुरु से लैंगिक समानता का पाठ पढ़ेंगे, तो बड़े होने पर उनके व्यवहार में यह समानता झलकेगी। आज देश में जिस लैंगिक असमानता की समस्या से हम जूझ रहे हैं, उसके पीछे एक बड़ा कारण यही है कि सदियों से पुरुषों को स्त्रियों से ऊपर का दर्जा देने का रिवाज चलता आया है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह बरकरार है। अब भी घरों का मुखिया ही होता है, घर की मुखिया जैसी अवधारणाएं अपवाद जैसी देखने मिलती हैं।
सभ्यता के विकास के साथ-साथ समाज में कई तरह के बदलाव आए, लेकिन पुरुष प्रधान समाज की संरचना नहीं बदली। नतीजा ये हुआ कि पुरुषों का अहं स्त्री समाज पर हावी होता गया। स्त्रियों ने भी इसे अनिवार्यता की तरह स्वीकार कर लिया और अपनी दोयम स्थिति को प्राकृतिक मान लिया। जबकि प्रकृति ने स्त्री और पुरुष में शारीरिक संरचना के अलावा और कोई भेद नहीं किया है। लैंगिक भेदभाव मानव निर्मित समस्या है और इसका निवारण जरूरी है। क्योंकि इस भेदभाव के कारण महिलाओं को कई स्तर पर, कई तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है। घर, विद्यालय, कार्यक्षेत्र हर जगह स्त्री व पुरुष के बीच भेदभाव कायम है। जैसे-जैसे महिला अधिकारों के लिए जागरुकता बढ़ी है, इस भेदभाव को दूर करने के अनेक प्रयास हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस लैंगिक समानता के उद्देश्य को लेकर मनाना शुरु हुआ। अभी देश में संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण का मसला कई बरसों से अटका हुआ है, क्योंकि पुरुषसत्तात्मक समाज की परवरिश महिला और पुरुष की समानता को आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रही है।
कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी भारत। जिसमें नायक सलमान खान द्वारा नायिका कटरीना कैफ को मैडम सर का संबोधन देना काफी चर्चित हुआ था। बाद में इसी शीर्षक से एक धारावाहिक भी बना, जो चार महिला पुलिसकर्मियों के कामों और चुनौतियों पर केन्द्रित था। फिल्म में मैडम सर का संबोधन इसलिए शुरु हुआ, क्योंकि नायक अपने रोजगार के लिए जब दफ्तर पहुंचता है, तो वहां अधिकारी के तौर पर एक पुरुष की जगह एक स्त्री को देखकर चकित हो जाता है। और तब वह कहता है अच्छा आप मैडम सर हो। इस संबोधन को हंसी-मजाक में लिया जा सकता है। लेकिन बारीकी से सोचें तो यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आजाद भारत में स्त्री को किसी कार्यालय में उच्च पद पर देखना अब भी अचरज की बात लगती है। हालांकि फिल्म में 70-80 के दशक को दिखाया गया है, लेकिन तब से अब तक कुछ खास बदलाव नहीं आया है। सिवाए इसके कि देश में अब दो महिलाएं राष्ट्रपति बन चुकी हैं और दो महिलाएं लोकसभा अध्यक्ष के पद पर आसीन हुई हैं। लेकिन इससे व्यापक समाज में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है।
पिछले साल 15 अगस्त के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को नारी शक्ति की महिमा का बखान करना पड़ा था। उन्होंने आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नारी शक्ति के उपयोग की बात की थी। लेकिन आक्सफैम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी कम है, क्योंकि यहां लैंगिक भेदभाव है। रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव में 98 प्रतिशत केवल लैंगिक असमानता के कारण है और बाकी 2 प्रतिशत भेदभाव शिक्षा या कार्य अनुभव के कारण होता है। इसके अलावा जाति और धर्म के कारण भी भेदभाव होता ही है। कार्यालयों में लैंगिक भेदभाव एक वैश्विक समस्या भी है, जिसे दूर करने के लिए अक्सर समान काम के लिए समान वेतन की मांग उठती रहती है।
लैंगिक भेदभाव दूर करने के लिए फ्रांस में एक अनूठी पहल हाल ही में हुई है। पेरिस से लगे शहर ‘पौंतां’ के महापौर बर्ट्रांड कर्न ने घोषणा की है कि लैंगिक बराबरी के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए इस साल के लिए उनके शहर के नाम में एक ‘ई’ जोड़ा जाएगा, ताकि उसे स्त्रीलिंग बनाया जा सके। फ्रांसीसी भाषा में संज्ञा के अंत में ‘ई’ लगा कर उसे स्त्रीलिंग रूप दिया जा सकता है। महापौर कर्न ने उम्मीद जतलाई है कि यह कदम ‘महिलाओं और पुरुषों’ के बीच बराबरी के लिए लोगों को जगाएगा। फ्रांस का यह प्रयोग कितना सफल होगा, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन इससे कम से कम लोगों को अपने नजरिए के बारे में सोचने का मौका मिलेगा।
दो साल पहले 2021 में केरल की माथुर ग्राम पंचायत ने अपने कार्यालय परिसर में ‘सर’ या ‘मैडम’ जैसे सामान्य अभिवादन पर प्रतिबंध लगाने के लिए इसी तरह का निर्णय लिया था। इस तरह के अभिवादन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाला यह देश का पहला नागरिक निकाय बन गया। माथुर पंचायत के उपाध्यक्ष पी.आर. प्रसाद ने कहा, ‘राजनीति से हटकर हमारी पंचायत में हर कोई कार्यालय में एक दोस्ताना वातावरण बनाने के बारे में विशेष रूप से चिंतित है। हम सभी को लगता था कि ‘सर’ या ‘मैडम’ जैसे अभिवादन हमारे और अपने मुद्दों को लेकर हमसे संपर्क करने वाले लोगों के बीच एक खाई पैदा करते थे।’
माथुर ग्राम पंचायत के बाद अब केरल बाल अधिकार आयोग का लैंगिक समानता के लिए उठाया गया यह कदम अनुकरणीय है। अगर देश की सभी स्कूलों में बच्चों को शुरु से इसी तरह की बराबरी का पाठ पढ़ाया जाए और घरों में भी इसी तरह परवरिश हो, तो भावी समाज लैंगिक भेदभाव की एक गंभीर समस्या से मुक्त होगा।

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