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-सुनील कुमार।।

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस को लेकर छिड़ी ताजा बहस में दलितों का मुद्दा भी सामने रहा है कि किस तरह उन्होंने शूद्रों को प्रताडऩा (ताडऩ या पिटाई) का हकदार लिखा था। अब वह बहस तो बहुत से और लोग आगे बढ़ा रहे हैं, हमने भी कल इसी पेज पर उस बारे में लिखा है, लेकिन आज हिन्दुस्तान के शूद्रों के बारे में। विख्यात अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर ने अभी दुनिया के कुछ देशों के बारे में रिपोर्ट छापी है कि किस तरह वहां पर विशेष दर्जे के लोग प्रमुख विश्वविद्यालयों में अधिकतर सीटों पर काबिज हो जाते हैं। दुनिया के कुछ और देशों के बारे में भी इसमें है, और साथ-साथ हिन्दुस्तान के बारे में भी इसमें एक रिपोर्ट है। भारत में दलित और आदिवासी सबसे ही पिछड़े हुए तबके हैं, और रिजर्वेशन के बावजूद उनकी हालत आज कैसी है, यह इन आंकड़ों से दिखाई पड़ता है। इस पत्रिका की रिपोर्ट बताती है कि देश भर के विश्वविद्यालयों में अगर ग्रेजुएशन तक की गिनती देखें, तो आदिवासी छात्र-छात्राओं की सीटें आधी भी नहीं भरी हैं। इसके बाद देश के आईआईटी में देखें, तो वहां आदिवासी कोटा पीएचडी छात्रों में शायद चौथाई के करीब भरा है, वहां असिस्टेंट प्रोफेसर इस तबके की आरक्षित कुर्सियों पर दो-चार फीसदी ही हैं, और प्रोफेसर हैं ही नहीं। इस पत्रिका में प्रकाशित चार्ट देखकर हम अंदाज से इन आंकड़ों को देख रहे हैं। देश भर में दलित छात्रों की आरक्षित सीटों से अधिक छात्र-छात्राएं ग्रेजुएशन तक हैं। आईआईटी में पीएचडी छात्रों में भी दलितों की संख्या आरक्षित कोटे से कुछ अधिक है। लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसर आरक्षित कोटे से करीब एक तिहाई ही हैं, एसोसिएट प्रोफेसर और भी कम हैं, और प्रोफेसर गिनती के हैं। जब देश में हर तरह के छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों को मिला लिया जाए, तो दलित और आदिवासी अपने निर्धारित कोटे से बहुत ही कम हैं, ओबीसी में भी ग्रेजुएशन के छात्रों को छोडक़र बाकी की हालत यही है। लेकिन अनारक्षित वर्ग के प्राध्यापक लगभग सौ फीसदी सीटों पर काबिज हैं, एसोसिएट प्रोफेसर की 90-95 फीसदी सीटों पर अनारक्षित वर्ग के लोग हैं, और सहायक प्राध्यापक की कुर्सियों पर भी 90 फीसदी से अधिक सामान्य वर्ग के लोग हैं। ये सारे आंकड़े 2019-20 तक के हैं, और ये सरकार और आईआईटी जैसे संस्थानों से लिए गए हैं। इस रिपोर्ट के आंकड़े सब कुछ कह रहे हैं, इसलिए हम अपनी अधिक टिप्पणियों के बिना भी इन आंकड़ों को लिखते चले जा रहे हैं। भारत के सबसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थान, आईआईटी में प्रोफेसरों की कुर्सियों पर दलित-आदिवासी तबकों के एक फीसदी से कम प्रोफेसर हैं। इस बारे में इस पत्रिका से एक रिटायर्ड दलित वरिष्ठ प्राध्यापक ने कहा कि यह सोची-समझी नौबत है, वे लोग हम लोगों को कामयाब नहीं होने देना चाहते। ये उच्च शिक्षा संस्थान आरक्षण के नियम नहीं मान रहे, और सरकारें इन पर कुछ नहीं कर रहीं। कुछ प्राध्यापकों का मानना है कि अगर आरक्षित तबकों को उनका जायज हक दिलाना है, तो ऐसे बड़े इंस्टीट्यूट के डायरेक्टरों को जब तक सजा नहीं दी जाएगी, तब तक वंचित तबकों को उनका हक नहीं मिलेगा।

इस रिपोर्ट के आगे के आंकड़े भी दिलचस्प हैं कि देश भर के विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन में दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओं की गिनती उनके वर्गों के आरक्षण से कुछ अधिक दिखती है, लेकिन जब बारीकी से देखें तो यह दिखता है कि यह सिर्फ आर्टस् के विषयों में है, दूसरी तरफ इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, और टेक्नालॉजी में आदिवासी सीटें खाली पड़ी हैं, और यही हाल दलितों में भी है। मतलब यह है कि गांवों से निकलकर आने वाले दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को विज्ञान की अच्छी पढ़ाई नहीं मिलती है, इसलिए वे कॉलेज पहुंचकर भी आर्टस् के विषय लेकर पढ़ते हैं। इनके मुकाबले ओबीसी की हालत कुछ बेहतर है जो कि अपने आरक्षित कोटे से अधिक सीटों पर हैं, लेकिन उनकी आबादी शायद सीटों के इस अनुपात से और अधिक मानी जाती है।

तुलसीदास का शूद्रों को लेकर जो लिखा हुआ है, वह आज भी हिन्दू धर्म और समाज के अधिकतर हिस्सों में चले आ रहा नजरिया बना हुआ है। वो जिन तबकों को पिटाई के लायक पाते हैं, उन तबकों की आज भी देश भर में जमकर पिटाई हो रही है। वीडियो-कैमरों के सामने महिलाएं भी पीटी जा रही हैं, दलित तो पीटे ही जा रहे हैं, इनके मुकाबले जानवरों की हालत बेहतर है क्योंकि पशु प्रताडऩा के खिलाफ कड़ा कानून बन गया है। तुलसीदास ने ऐसी बातें लिखते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि अनपढ़ लोगों के बीच भी मशहूर उनकी रामचरितमानस की उनकी सोच 21वीं सदी में देश की दिग्गज आईआईटी में अमल में आती रहेगी। हिन्दुत्ववादी लोगों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि दूसरे धर्म के लोगों के मुकाबले अपनी अधिक आबादी गिनाने के लिए तो वे दलित और आदिवासी तबकों को हिन्दू समुदाय में गिन लेते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे धर्मों के साथ कोई तुलना बंद होती है, तो घर के भीतर वे दलित-आदिवासी तबकों को मारने के लिए अपने चमड़े के बेल्ट उतार लेते हैं, इन तबकों के खानपान से लेकर इनके कामकाज तक को कुचलने की कोशिश करते हैं, और उन्हें एक सवर्ण जीवनशैली का गुलाम बनाने में जुट जाते हैं। यह पाखंड ही लोगों को, दलितों और आदिवासियों को कभी बौद्ध धर्म की तरफ ले जाता है, तो कभी ईसाई धर्म की तरफ। और फिर ऐसे एक-एक मामले को लेकर वे धर्मांतरण का हल्ला बोलने लगते हैं, और जब ऐसा हल्ला बोलने का मौका नहीं मिलता, तो फिर वे अपने घर के भीतर वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे वाले दलित-आदिवासियों को कूटने में लग जाते हैं। लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि तुलसी की रामकथा के वानर कौन थे? क्या वे जंगलों में बसे हुए आदिवासी ही नहीं थे जो कि वहां से गुजरते हुए राम के साथ हो गए थे, और जिन्हें सवर्ण, शहरी कथाकारों की कल्पना में वनवासी आदिवासी की जगह बंदर का रूप दे दिया गया था? आज कम से कम यह तो अच्छा हुआ कि बिहार के एक मंत्री ने रामचरितमानस को नफरत फैलाने वाला ग्रंथ करार दिया, तो रामचरितमानस के बचाव में, और उसके खिलाफ लोग टूट पड़े हैं, और ‘वानरों’ से लेकर दलितों तक का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है।

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