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-दुर्गाप्रसाद अग्रवाल॥

सृजन की दुनिया पहले ही काफी फिसलन और विचलन भरी थी. हम आए दिन यह देखते-पढ़ते सुनते रहे हैं कि अमुक रचना, चाहे वह कोई लेख-कविता-कहानी हो, कोई धुन हो, कोई छवि हो, कुछ भी हो, अमुक मूल की हूबहू नकल है. संगीत की, विशेष रूप से लोकप्रिय संगीत -बॉलीवुड संगीत- की दुनिया में तो ऐसा करना बहुत आम रहा है. वहां कहानियां ही नहीं, पूरी की पूरी फ़िल्में ही कहीं अन्यत्र से फ्रेम-दर-फ्रेम उठा कर हमारे सामने रख दी गईं. कवियों-शायरों ने औरों के कलाम अपने नाम से हमें सुना कर वाहवाही लूट ली. अगर बहुत पीछे न भी जाएं तो कहानियों के मामले में हुए अनेक ऐसे प्रकरण आपको भी याद आ जाएंगे जहां किसी अन्य कहानी के अनेक अंश शब्दश: प्रयुक्त कर लिये गए और जब पकड़े गए तो बहाने बना कर बच निकलने की हास्यास्पद कोशिशें की गईं. वैचारिक लेखन की दुनिया में भी ऐसा खूब हुआ है. आप एक लेख पढ़ने लगें और पाएं कि एक पैरेग्राफ़ के बाद भाषा-शैली एकदम अलग हो रही है तो संदेह होना स्वाभाविक ही है. आजकल तकनीक के कारण यह पकड़ पाना कि कोई पैरेग्राफ कहां से उठाया गया है बहुत मुश्क़िल भी नहीं रह गया है. लेकिन इसके बावज़ूद अति महत्वाकांक्षी किंतु प्रतिभा विहीन लोग ऐसा करने से बाज़ नहीं आते हैं. अकादमिक दुनिया भी इस उठाईगिरेपन से अछूती नहीं है. यह चर्चा आम है कि पूरे के पूरे शोध ग्रंथ इसी कला से रच दिये जाते हैं और लोग डॉक्टर बन जाते हैं. और हां, आप ‘कला’ शब्द के प्रयोग पर आहत अनुभव न करें. हमारे यहां चोरी को चौंसठ कलाओं में से एक माना गया है.

चोरी को पकड़ने में तकनीक के उपयोग का ज़िक्र मैंने किया. विश्वविद्यालय तो आजकल इस निमित्त अनेक सॉफ्टवेयर्स और टूल्स का प्रयोग अनिवार्यत: करने लगे हैं. हमारा समय कृत्रिम बुद्धि के प्रसार का समय है और इसके माध्यम से भी बौद्धिक चोरी पकड़ने के अनेक प्रयास होते रहते हैं. लेकिन मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ और काफी चिंता भी हुई कि अब कृत्रिम बुद्धि आपके दिये हुए संकेतों को ग्रहण कर आपके लिए सृजन भी कर सकती है. क्या यह बात आपको चकित नहीं करती है कि अब आप इस कृत्रिम बुद्धि को कुछ चरित्र दे दें, उनकी विशेषताएं और कुछ घटनाएं बता दें तो और यह निर्देश दे दें कि इनको मिलाकर इतने शब्दों की एक कहानी तैयार कर दी जाए, तो आपके आदेश की पालना कर जाएगी. पलक झपकते ही एक कहानी आपकी सेवा में पेश कर दी जाएगी! असल में ऐसा हो भी चुका है. सन 2020 में लेखकों-कवियों के एक समूह ने चैटजीपीटी नामक एक एआई टूल को क्लासिक कविताओं के मॉडल पर प्रशिक्षित किया और फिर उससे नई कविताएं लिखवाईं, जो न केवल निर्दोष थीं, बेहतरीन भी थीं.

वैसे एक हद तक यह काम काफी पहले से हो रहा है. अब आप अनुवाद की ही बात लीजिए. एक भाषा के सृजन को दूसरी भाषा में बदलने का काम बहुत कठिन होता है. लेकिन कृत्रिम बुद्धि ने इस काम को बहुत आसान कर दिया. बेशक मनुष्य द्वारा किया गया अनुवाद जितना सटीक होता है, कृत्रिम बुद्धि द्वारा किया गया अनुवाद उतना सटीक नहीं हो सकता, फिर भी इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि उसका स्तर निरंतर बेहतर होता जा रहा है. आज यह बहुत आम है कि आप मेरे इस सम्पादकीय को गूगल ट्रांसलेट या इसके समान किसी अन्य टूल या एप पर चिपका कर यह निर्देश दें कि इसका अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रेंच या इतालवी भाषा में अनुवाद कर दिया जाए, और लगभग रियल टाइम में वैसा कर दिया जाएगा. हममें से बहुत सारे लोग आपात स्थिति में इस सुविधा का उपयोग करते भी हैं. यांत्रिक रूप से जो अनुवाद किया जाता है, जब उसकी नोक-पलक दुरुस्त कर दी जाती है तो वह काफी हद तक मनुष्य द्वारा किए गए अनुवाद जैसा ही होता है. अब अगर इस तकनीक से अनुवादकों के सामने रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है तो चिंता होना स्वाभाविक है. लेकिन शांत भाव से सोचता हूं तो पाता हूं कि रोज़गार के स्वरूप तो पहले भी बदले हैं और निरंतर बदलते रहते हैं. बहुत सारे पुराने काम अब केवल स्मृति में रह गए हैं, उनकी जगह नए कामों ने ले ली है. यह एक स्थायी और सतत ज़ारी रहने वाली प्रक्रिया है.

लेकिन, विचारणीय यह है कि क्या कृत्रिम बुद्धि के बढ़ते कदम लेखक-सर्जक को भी विस्थापित कर देंगे? एक उदाहरण से शायद बात अधिक स्पष्ट हो. कृत्रिम बुद्धि के ऊपर उल्लिखित भाषा मॉडल प्लेटफॉर्म पर जाकर मैंने यह अनुरोध किया कि समय की चुनौतियों पर लगभग तीन सौ शब्दों की एक टिप्पणी लिख कर दो. उसने लगभग तुरंत जो लिखकर जो दिया, वह बिना एक भी संशोधन के आपके सामने रख रहा हूं: समय की चुनौतियों से सम्बंधित लेख लिखना कठिन काम है। समय की अंतराल को पलटने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है, साथ ही काम के साथ समय को संयोजित करने की कुशलता की आवश्यकता होती है। समय को संवेदनशील रूप से प्रबंधित करने से हम अपने काम को सफलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं, साथ ही जीवन की अन्य कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को भी ध्यान में रख सकते हैं। यह समझा जा सकता है इस प्लेटफॉर्म ने मेरे अनुरोध को समझने में चूक की. मैं समय की चुनौतियों पर लिखवाना चाहता था, उसने समय प्रबंधन की चुनौतियों पर लिख दिया. लेकिन जो लिख कर दिया, वह औसत से बेहतर ही था. मैंने एक और प्रयोग किया. इस बार इस प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया कि पिताजी के लिए एक श्रद्धांजलि लिखो. लगभग दस सेकेण्ड में मुझे यह श्रद्धांजलि प्राप्त हुई: पिताजी, आपने हमें सब कुछ सिखाया है। आपने हमें अपनी शक्ति, संवेदनशीलता, और प्यार से पूर्ण किया। आपके संदेशों को ध्यान में रखते हुए, हम अपने जीवन में सफल होंगे। आपको हमेशा याद करेंगे और आपकी श्रद्धा से हमेशा प्रेरित रहेंगे। आपको धन्यवाद। मैं बताता चलूं कि इस बार प्लेटफॉर्म ने एक ग़लती भी की. उसने सिखाया को सीखाया लिखा. इस बार मैंने एक अपेक्षाकृत कठिन विषय इसे दिया. मैंने कहा कि मुझे ‘जीवन का सौंदर्य’ विषय पर कुछ लिख कर दिया जाए. जो मिला वह शब्दश: इस प्रकार है: जीवन का सौंदर्य हमेशा बदलता रहता है, कुछ समय के लिए यह स्वस्थ रहने से होता है, कुछ समय के लिए परिवार से, कुछ समय के लिए प्रेम से और कुछ समय के लिए सफलता से। हम सभी को अपने जीवन के सौंदर्य को खोजने की ज़रूरत है, जो हमेशा हमारे साथ होगा। मैंने कोई बीसेक विषय इसे दिये और इसने हर बार मेरे आदेश का पालन करते हुए ठीक ठाक उत्तर लिखकर दे दिये. यह कम चकित करने वाली बात नहीं थी. यहीं यह भी बता देना ज़रूरी है कि कृत्रिम बुद्धि के ये टूल कॉपी पेस्ट न करके नया रचते हैं. इसलिए एक तरह से कहा जा सकता है कि यह मौलिक सृजन होता है.

सोचने की और चिंता करने की बात यह है कि निरंतर विकसित होती हुई कृत्रिम बुद्धि क्या निकट भविष्य में हमारे रचने के काम को अप्रासंगिक नहीं बना देगी? हम देखते हैं कि विभिन्न सामयिक प्रकाशनों में पहले जो लेख आदि विभिन्न लेखकों से लिखवाए जाते थे अब उनकी जगह इण्टरनेट से ली गई सामग्री का प्रयोग आम हो चला है. मैं उस भविष्य की कल्पना करता हूं जहां इसी तरह कृत्रिम बुद्धि द्वारा रचित कविताएं, कहानियां, लेख आदि हमारे लेखकों और विचारकों को विस्थापित कर चुके होंगे! क्या वास्तव में ऐसा होगा? कृत्रिम बुद्धि का प्रयोग विद्यार्थी अपने गृह कार्य को करने में कर सकते हैं, करने भी लगे हैं. इससे उनकी प्रतिभा का स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होगा, यह कहना अनावश्यक है. निश्चय ही जब ऐसा होने लगेगा तो पढ़ाने और परीक्षा लेने के तौर तरीकों में बदलाव ज़रूरी हो जाएगा. अगर कृत्रिम बुद्धि को ग़लत सूचनाएं दे दी जाएं तो वह उन्हीं के आधार पर सृजन कर देगी, और इस बात के अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं.

निश्चय ही कृत्रिम बुद्धि का त्वरित विकास जहां हमारे लिए अनेक सुविधाएं रचेगा वहीं यह मानवता के लिए बहुत सारी चुनौतियां भी लेकर आएगा. यह तो समय ही बताएगा कि हम उन चुनौतियों से बचते हुए इस सुविधा का कितना और कैसा उपयोग कर पाएंगे.

(लेखक की यह रचना राष्ट्रदूत में प्रकाशित हो चुकी है)

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