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-सुनील कुमार।।

छत्तीसगढ़ के कोरबा में कल एक आदतन मुजरिम को जिलाबदर किया गया। उसे एक साल के लिए कोरबा जिले से बाहर रहने को कहा गया है। गोपू पांडेय नाम के इस नौजवान के खिलाफ बहुत से हिंसक मामले दर्ज थे, और पुलिस की कार्रवाई का कोई असर न देखते हुए उसे चौबीस घंटे के भीतर जिला छोड़ देने को कहा गया। इसके साथ ही उसे कोरबा से लगे हुए जिलों, बिलासपुर, जांजगीर-चाम्पा, सक्ती, रायगढ़, सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया, मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, और गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिलों से भी एक साल के लिए बाहर चले जाने के लिए कहा गया। ऐसे जिलाबदर के मामले जिला पुलिस की बनाई गई फाईल के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट के हुक्म से पूरे होते हैं। जिलाबदर के मामले कम होते हैं, और ऐसे ही आदतन गुंडे-बदमाश, मुजरिम के खिलाफ होते हैं जो कि पुलिस की आम कार्रवाई से काबू में नहीं आ रहे हैं।

अंग्रेजों के वक्त का बना हुआ जिलाबदर कानून आजाद हिन्दुस्तान के मानवाधिकार के किसी पैमाने को देखते हुए नहीं बना था। किसी को पूरे एक बरस के लिए उसके जिले, और आसपास के तमाम जिलों के बाहर भेज देने का मतलब उसके लिए जिंदा रहने की एक चुनौती भी खड़ी कर देना है, क्योंकि अगर वह ऐसा ही आदतन मुजरिम या गुंडा-बदमाश है, तो उसके लिए बाहर जाकर कोई काम करना आसान नहीं होगा। दूसरी बात यह कि जो एक जिले के लिए खतरनाक साबित हो रहा है, उस खतरे को उठाकर बाकी जिलों पर डाल दिया जाए, यह उनके साथ बेइंसाफी है कि ऐसे गुंडे का जिला अपनी बला दूसरों पर डाल रहा है, और उन दूसरे जिलों में इस अपराधी की कोई शिनाख्त भी नहीं है, वहां पर वह अपने आदतन जुर्म और आसानी से कर सकता है, वहां वह लोगों के लिए एक अधिक बड़ा खतरा बन सकता है क्योंकि उसे आते-जाते देखकर उस पराये जिले की पुलिस मुजरिम की तरह पहचान भी नहीं पाएगी।

इस बारे में बात करने पर कुछ पुलिस अफसरों का यह कहना है कि यह बहुत ही दुर्लभ मामलों में होने वाली कार्रवाई है, और ऐसे मामले गिने-चुने रहते हैं, इसलिए इन्हें किसी मानवाधिकार से जोडक़र देखना जायज नहीं है। पुलिस का यह भी तर्क रहता है कि ऐसे लोग स्थानीय स्तर पर अपने बाहुबल, और अपने गिरोह के चलते बाकी तमाम लोगों के मानवाधिकार कुचलने की हालत में रहते हैं, कुचलते ही रहते हैं, और ऐसे लोगों को अगर एक साल बाहर रहकर जिंदा रहने को कहा जाए, तो यह उन्हें उनके गिरोह की ताकत से दूर रखना भी होता है, और आज के वक्त हर किसी के पास किसी न किसी तरह की मजदूरी करने का विकल्प रहता है, इसलिए ऐसे कोई गुंडे दूसरे जिलों में भी जाकर भूखे नहीं मर सकते। अपने खुद के जिलों में ये इतने बड़े दबंग गुंडे रहते हैं कि वहां जुर्म करना उनके लिए आम बात रहती है, और इलाके के लोगों के लिए उनके खिलाफ शिकायत करना खतरे की बात हो जाती है। पुलिस का यह भी कहना रहता है कि यह किसी को भूखे मारने का काम नहीं है, और खुले समाज में मेहनत-मजदूरी करके या अपने हुनर का और कोई काम करके लोग आसानी से जिंदा रह सकते हैं।

अब मानवाधिाकर के नजरिए से देखें तो ऐसे गुंडे-बदमाश या मुजरिम जुर्म के अलावा भी हो सकता है कि कोई और काम करके अपने परिवार को भी चला रहे हों। जिन्हें कोई अदालती सजा मिले, उनका तो जेल जाना, और परिवार को बेसहारा छोड़ देना एक कानूनी नौबत है, लेकिन बिना सजा मिले जिलाबदर कर देना एक बड़ी सजा है, जो कि पुलिस की कार्रवाई नहीं कही जा सकती, यह कार्रवाई से अधिक है, और सजा है। यह अपने आपमें एक अलोकतांत्रिक बात है कि अदालती कार्रवाई का विकल्प मौजूद रहते हुए पुलिस और प्रशासन मिलकर किसी को जिलाबदर की ऐसी सजा दें, जिसे वे सजा में नहीं गिनते। लेकिन पुलिस का एक तर्क देखने-समझने लायक है कि ऐसे आदतन या पेशेवर गुंडे-बदमाश या मुजरिम आए दिन करने वाले जुर्म के लिए अदालतों से हाथों-हाथ जमानत पा जाते हैं। कायदे से तो होना यह चाहिए कि हर जुर्म के साथ पिछले जुर्मों के रिकॉर्ड भी अदालत में पेश होने चाहिए जिससे न तो ताजा जुर्म पर जमानत मिल सके, और न ही पिछले जुर्म में मिली जमानत जारी रह सके, लेकिन ऐसा होता नहीं है। पुलिस और अदालत का सिलसिला इतना बेअसर और शायद भ्रष्ट भी रहता है कि लोग दस-दस अलग-अलग जुर्मों पर जमानत लिए हुए घूमते रहते हैं, और उनके मामलों की सुनवाई की बारी नहीं आती, सजा की बात तो दूर रही।

जिलाबदर के ऐसे मामलों को देखें तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि दर्जन-दर्जनभर जुर्म जिन पर दर्ज है, वे हर मामले में जमानत लिए घूम रहे हैं, और हर नए मामले में पुराने तमाम जुर्म का जिक्र भी हो रहा है, और पहले की कोई भी जमानत रद्द भी नहीं हो रही है। मतलब यह कि आज जिलाबदर की नौबत इस बात का सुबूत है कि जुर्म के खिलाफ अदालती कार्रवाई इतनी बेअसर हो गई है कि पुलिस फैसलों और सजा का इंतजार करते-करते जिलाबदर को मजबूर हो रही है। भारत की न्याय व्यवस्था में सुधार की बात करने वालों को यह आसानी से समझ में आएगा कि अदालत की नियमित प्रक्रिया के बेअसर हो जाने से अंग्रेजों के वक्त के ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों का इस्तेमाल जरूरी हो रहा है, या जायज लग रहा है। कायदे की बात यह है कि जिलाबदर की कार्रवाई से होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन पर फिक्र होनी चाहिए, लेकिन अदालती रफ्तार ने उस फिक्र की गुंजाइश को खत्म कर दिया है। जब मौजूदा कानून के तहत, जुर्म के सीधे-सीधे मुकदमों में सजा नहीं हो पाती है, उसमें बरसों लग जाते हैं, तब पुलिस को असाधारण ताकत का इस्तेमाल करना पड़ता है, और लोगों को उसके अलोकतांत्रिक होने का अहसास भी नहीं होता। यह भारत की न्याय व्यवस्था के बेअसर होने के हजार किस्म के नुकसानों में से एक है, और यह इस बात का पुख्ता सुबूत है कि इस व्यवस्था में सुधार की कितनी जरूरत है।

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