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-सुनील कुमार॥

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर बनाए गए कुछ कार्टून सोशल मीडिया पर महज औरों को फॉरवर्ड कर देने के जुर्म में गिरफ्तार एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर को बंगाल की एक जिला अदालत ने सरकारी मुकदमे से 11 बरस बाद बरी किया है। 2012 में जाधवपुर विश्वविद्यालय के इस प्रोफेसर को सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री की आलोचना वाले कार्टून किसी को ईमेल करने के जुर्म में आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत गिरफ्तार किया गया था, और जमानत पर वे रिहा हो पाए थे। यह कानून 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए इसे खारिज कर दिया था, लेकिन अदालत में मुकदमा चलते ही रहा। अब प्रोफेसर की याचिका पर यह मामला खारिज हुआ, और दी गई जमानत भी छोड़ी गई। इस प्रोफेसर को टीएमसी के गुंडे-कार्यकर्ताओं ने पीटा भी था, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा। इस मामले को बंगाल भाजपा ने लोकतंत्र की जीत बताया है, और ममता बैनर्जी को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा है। भाजपा का कहना है कि यह सरकार के मुंह पर तमाचा है, और इससे उसे सबक लेना चाहिए।

यह खबर अडानी नाम की सुनामी के बीच किधर से आई और बहकर कहां चली गई, यह किसी को पता भी नहीं चल पाया। कुछ अखबारों में यह खबर छपी जरूर, लेकिन जब गिनी-चुनी खबरें सिर चढक़र बोलती हैं, तो दूसरी खबरों के हिस्से की जगह और वक्त दोनों ही छीन लेती हैं। अडानी ने कुछ ऐसा ही किया है। हालांकि देश में कई दूसरे किस्म की खबरों को अडानी की खबरों पर लादने की कोशिश जरूर की गई, लेकिन यह सुनामी इतनी बड़ी थी, और है, कि कामयाबी नहीं मिली।

अब कुछ वक्त जरूर निकल गया है, लेकिन एक पखवाड़े बाद सही, बंगाल की मुख्यमंत्री और एक कार्टून आगे बढ़ाने की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दे पर लिखे जाने की जरूरत है। यह मामला पूरी तरह से अनोखा मामला भी नहीं है क्योंकि दूसरे कुछ राज्यों में भी सत्ता पर काबिज लोगों ने इस तरह की कार्रवाई की है। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक तरफ तो मीडिया के एक कार्यक्रम में एक स्थानीय व्यंग्यकार को किताब छपवाने के लिए दो लाख रूपये मंजूर किए थे, और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के खिलाफ समझे जाने वाले प्रतीकात्मक तीखे व्यंग्य लिखने वाले एक वेबपोर्टल के व्यंग्यकार को गिरफ्तार भी किया गया था। और प्रतीकों में लिखे गए राजनीतिक असंतोष को एक कांग्रेस कार्यकर्ता की तरफ से असंतोष फैलाकर सरकार को नुकसान पहुंचाने की साजिश की रिपोर्ट लिखाई गई थी, और कुछ घंटों के भीतर ही इस व्यंग्यकार को गिरफ्तार कर लिया गया था। और ये दोनों बातें कुछ महीनों के भीतर ही हुई थीं। इसलिए सत्ता के बर्दाश्त को लेकर किसी एक पार्टी पर अधिक तोहमत लगाना जायज नहीं होगा। और पूरे देश में कहीं भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में जरा सी आलोचना गैरसरकारी सजा का सैलाब ला देती है। सोशल मीडिया पर ऐसे आलोचकों के खिलाफ हिंसक और अश्लील बेहिसाब हमले शुरू हो जाते हैं, और अधिकतर लोगों का यह मानना है कि यह भाजपा के आईटी सेल की तरफ से किए जाने वाले हमले रहते हैं। एक ही वक्त पर हजार-हजार लोग गंदी गालियां, हिंसक धमकी, और मां-बहन के लिए अश्लील बातें लिखी हुई वही की वही, एक सरीखी गलतियों वाली ट्वीट करने लगते हैं, तो जाहिर है कि इनके पीछे कोई न कोई संगठित ताकत तो रहती है।

लोकतंत्र एक बड़ी सुहावनी व्यवस्था है, तब तक, जब तक कि उसमें लोगों को मिली आजादी का निशाना सत्ता न बन जाए। जब तक लोग विपक्ष में रहते हैं, तब तक वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती रहते हैं, लेकिन जब वे सत्ता पर आते हैं, और कार्टून या व्यंग्य के स्वाभाविक निशाने पर रहते हैं, तो आजादी से उनकी मोहब्बत कमजोर होने लगती हैं, धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास को जानने वाले बताते हैं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने वक्त के कार्टूनिस्टों का हौसला बढ़ाते रहते थे कि वे उनके साथ कोई नरमी न बरतें। लेकिन असुरक्षा की भावना से घिरी हुई इमरजेंसी के पहले की इंदिरा गांधी ने कार्टून और व्यंग्य को कुचलकर रख दिया था। दुनिया का इतिहास यह बताता है कि कार्टून और व्यंग्य से सबसे अधिक दहशत तानाशाहों को होती है जिन्हें वे साजिश लगते हैं।

लेकिन हिन्दुस्तानी कानून पर एक नजर डालने की जरूरत है जिसके तहत एक कार्टून आगे बढ़ाने वाले प्रोफेसर को 11 बरस तक अदालत का सामना करना पड़ा, सत्ता के गुंडों के हाथों मार तो खानी ही पड़ी। यह बात भी हैरान करती है कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट आईटी एक्ट की जिस धारा 66-ए को असंवैधानिक करार दे चुका था, उसके तहत 2023 तक मुकदमा जारी था। जब देश में सत्ता अपनी पुलिस के मार्फत अभिव्यक्ति को इस तरह कुचल सकती है, और अदालतें दस-दस बरस तक कोई राहत नहीं दे सकतीं, तो फिर यह देर अपने आपमें एक सजा रहती है, और सरकार जज भी रहती है, और जल्लाद भी।

अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने का दंभ भरते नहीं थकने वाले हिन्दुस्तान को दरअसल आईने यह देखना चाहिए कि उसके घर इस लोकतंत्र की इज्जत कितनी है। आकार बड़ा होने से किसी चीज की इज्जत नहीं बढ़ जाती, इज्जत पाने के लिए खूबी की जरूरत होती है। आज योरप के बहुत से देश दुनिया के सबसे बुरे आतंकी हमलों का सामना करते हुए भी अपने देश के कार्टूनिस्टों को बचाने के लिए चट्टान की तरह खड़े हुए हैं। वे अपने देश में संविधान के तहत मिली हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने वाले लोगों का सम्मान करते हैं, फिर चाहे उनके कार्टूनों की वजह से उन पर मजहबी आतंकी हमले करके लोगों को थोक में ही क्यों न मार दिया जाए। ऐसे बहुत से लोकतंत्र हैं जो कि सलमान रुश्दी जैसे लेखक को न सिर्फ शरण देते हैं, बल्कि उनकी हिफाजत का पूरा इंतजाम भी करते हैं। ये देश आबादी और इलाके के हिसाब से हिन्दुस्तान के किसी एक छोटे प्रदेश जितने भी हो सकते हैं, लेकिन वहां लोकतंत्र का स्तर बहुत ऊंचा है।

लोकतंत्र तंगदिली पर नहीं चल सकता, और न ही सत्ता की, बहुसंख्यक आबादी की असहिष्णुता से चल सकता है। लोकतंत्र गौरवशाली परंपराओं का नाम रहता है, दरियादिली का नाम रहता है, अपनी जिम्मेदारी और दूसरे के अधिकार का सम्मान करने का नाम रहता है। अभी 2021 की ही बात है कि मोदी सरकार ने एक प्रमुख कार्टूनिस्ट मंजुल के ट्विटर पेज के खिलाफ बंदिश लगाने के लिए ट्विटर को कानूनी चि_ी लिखी थी। इस पर ट्विटर ने इस कार्टूनिस्ट को यह जानकारी भेजते हुए सुझाया था कि वे खुद भारत सरकार के लिखे हुए पर गौर कर सकते हैं, और कानूनी मदद जुटा सकते हैं।

हिन्दुस्तान में सुप्रीम कोर्ट को अधिक खुलासे के साथ ऐसा फैसला करने की जरूरत है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक सचमुच की आजादी मिल सके, और संविधान का यह बुनियादी अधिकार एक सत्ता के दबाव में थानेदार की कुर्सी की गद्दी के नीचे दम न तोड़े।

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