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एडवोकेट एलसी विक्टोरिया गौरी आखिरकार मद्रास हाईकोर्ट की जज बन ही गई। केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच जजों की नियुक्ति और कोलेजियम के अधिकारों पर चल रही तनातनी के बीच एक नया मसला खड़ा हो गया था, जब कॉलेजियम ने सीनियर एडवोकेट गौरी को मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया। कॉलेजियम में भारत के प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ ने 17 जनवरी को उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए गौरी और चार अन्य वकीलों के नाम का प्रस्ताव दिया था। अब तक एडवोकेट गौरी मदुरै बेंच में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के तौर पर केंद्र सरकार का पक्ष रखती आ रही थीं।
जज के पद पर उनकी नियुक्ति को लेकर मद्रास हाईकोर्ट बार के सदस्य, वकील एन.जी.आर. प्रसाद, आर. वैगई, एस.एस. वासुदेवन, अन्ना मैथ्यू, और डी. नागासैला ने आपत्ति दर्ज करते हुए इस प्रस्ताव को वापस लेने का आग्रह किया था। उनकी नियुक्ति को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई। इन वकीलों का कहना था कि गौरी के ‘प्रतिगामी विचार’ मूलभूत संवैधानिक मूल्यों के लिए पूरी तरह से ‘विपरीत’ हैं और उनकी गहरी धार्मिक कट्टरता को दर्शाते हैं जो उन्हें हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए अयोग्य बनाती हैं। वकीलों ने कहा था कि इस तरह की नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम करने का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं। इस समय, संस्थान को अपनी प्रशासनिक कार्रवाई से कमजोर होने से बचाने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
याचिकाकर्ताओं ने एक अपुष्ट अकाउंट से 2019 में किए गए ट्वीट का जिक्र किया था, जिसके मुताबिक विक्टोरिया भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महासचिव रही हैं। इसके अलावा विक्टोरिया के दो कथित इंटरव्यू को लेकर भी विरोध दर्ज किया गया, जिनमें उन्होंने मुसलमानों और ईसाई समुदाय के खिलाफ टिप्पणियां की थी। सरल शब्दों में कहें तो भाजपा से संबंध रखने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ टिप्पणी करने के आधार पर एल सी विक्टोरिया की जज पद पर नियुक्ति का विरोध किया जा रहा था। क्योंकि इससे भविष्य में पक्षपातरहित न्याय की संभावनाओं के क्षीण होने की आशंका है।
विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की गई थी, क्योंकि मंगलवार को सुबह 10.35 पर उन्हें मद्रास हाईकोर्ट में शपथ लेनी थी। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बीआर गवई की विशेष बेंच ने इस मामले की सुनवाई की, जबकि तमिलनाडु के रहने वाले जस्टिस सुंदरेश ने गौरी की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम द्वारा परामर्श किए जाने के कारण खुद को अलग कर लिया। 10 बजकर 25 मिनट पर सुनवाई शुरु हुई। इधर शीर्ष अदालत में सुनवाई चल रही थी, उधर एलसी विक्टोरिया गौरी ने मद्रास हाईकोर्ट के जज पद पर नियुक्ति की शपथ ली। शीर्ष अदालत में सुनवाई के कुछ ही मिनटों में याचिका को खारिज कर दिया गया। जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि जज के तौर पर कोर्ट से जुड़ने से पहले मेरा भी राजनीतिक बैकग्राउंड रहा है।
मैं 20 साल से जज हूं और मेरी राजनीतिक पृष्ठभूमि कभी मेरे रास्ते में नहीं आई। वहीं जस्टिस खन्ना ने कहा कि गौरी की नियुक्ति के संबंध में मुद्दा योग्यता का नहीं बल्कि उपयुक्तता का है। पात्रता पर, एक चुनौती हो सकती है, लेकिन अदालतों को उपयुक्तता में नहीं पड़ना चाहिए अन्यथा पूरी प्रक्रिया गड़बड़ हो जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत न्यायिक पक्ष पर कॉलेजियम को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का निर्देश नहीं दे सकती है। पीठ ने कहा कि ये नहीं माना जा सकता है कि कॉलेजियम गौरी की राजनीतिक पृष्ठभूमि या उनके आर्टिकल से अवगत नहीं था जो बाद में सार्वजनिक डोमेन में सामने आए।
भारत के न्यायिक इतिहास में कई फैसले विवादों के घेरे में आए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों का राजनैतिक झुकाव, राज्यसभा की सदस्यता, उत्पीड़न के गंभीर आरोप ऐसे मुद्दों पर भी विवाद खड़े हुए हैं। लेकिन किसी जज की नियुक्ति के फैसले को रद्द करने की मांग कम ही उठी है। 30 साल पहले ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जब केएन श्रीवास्तव को गुवाहाटी हाईकोर्ट का जज बनाया गया था और उन्होंने इसकी शपथ भी ले ली थी। लेकिन तब बार के एक वर्ग ने इस नियुक्ति पर इस आधार पर आपत्ति जताई थी कि उन्होंने कभी वकील के रूप में अभ्यास नहीं किया और कभी न्यायिक कार्यालय नहीं संभाला।
श्रीवास्तव भ्रष्टाचार के आरोपों में भी फंसे थे। तर्क यह था कि केएन हाईकोर्ट का जज होने के लिए संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत निर्धारित मूल योग्यता को पूरा नहीं करते। श्रीवास्तव वास्तव में मिजोरम सरकार के कानून और न्यायिक विभाग में सचिव स्तर के अधिकारी थे और उस क्षमता में कुछ न्यायाधिकरणों और आयोगों के सदस्य थे।
सुप्रीम कोर्ट में कुमार पद्म प्रसाद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य 1992 2 एससीसी 428 नाम से इस मामले की सुनवाई हुई। जस्टिस कुलदीप सिंह, जस्टिस पीबी सावंत और जस्टिस एनएम कासलीवाल की तीन जजों की पीठ ने पाया कि श्रीवास्तव कार्यकारी के नियंत्रण में एक पद पर थे और इसलिए यह एक न्यायिक कार्यालय नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने केएन श्रीवास्तव की नियुक्ति गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज के रूप में शपथ लेने के बाद भी रद्द कर दी थी। इस असाधारण स्थिति में अदालत ने कहा कि नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति के वारंट के बावजूद उन्हें जज के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता। अभी विक्टोरिया गौरी के मामले में, याचिकाकर्ता 1992 के इस मामले को ही मिसाल बना रहे थे कि न्यायिक हस्तक्षेप के दरवाजे सिर्फ इसलिए बंद नहीं हो जाते हैं क्योंकि जज के लिए नियुक्ति आदेश जारी कर दिया गया है। हालांकि इस बार नियुक्ति का आदेश वापस नहीं हुआ।
संविधान और कानून के विद्यार्थियों के लिए ये दोनों नजीरें आगे भी महत्वपूर्ण रहेंगी। अदालतें तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर फैसले करती हैं, जिनमें भावनाओं के पोषण की गुंजाइश नहीं होती। यही वजह है कि कुछ फैसलों से एक वर्ग खुश होता है, दूसरा निराश। न्यायाधीश की आसंदी पर बैठे लोगों के लिए यही बड़ी चुनौती होती है कि वे नीर-क्षीर विवेक करने की क्षमता और पारदर्शी न्याय का पैमाना हर वक्त बनाए रखें। जज विक्टोरिया गौरी पर भी अब यही महती जिम्मेदारी आ गई है। प्रेमचंद के पंच परमेश्वर की तरह कर्तव्य को हर पूर्वाग्रह और राजनीति से परे रखने की जिम्मेदारी।

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