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-सुनील कुमार॥

हिंदुस्तानी बाग-बगीचों और सार्वजनिक जगहों पर बवाल आने में अभी चार दिन बाकी हैं, लेकिन समय रहते इस पर लिख लेना ठीक है। वेलेंटाइन -डे 14 फरवरी को पड़ता है, और तथाकथित भारतीय संस्कृति के स्वघोषित ठेकेदारों ने डंडों पर तेल मलना शुरू कर दिया होगा, और धर्म के झंडे उन पर बांधना भी। हिंदुस्तान के सबसे बेवकूफ प्रदेशों में ये गुंडे लाठियां लेकर निकलेंगे, और नौजवान लडक़े-लड़कियों को साथ देखकर उन्हें पीटना शुरू करेंगे कि कहीं वे मोहब्बत तो नहीं कर रहे हैं। बात नफरत की होती, तो इन लोगों को ठीक लगती, इनके मिजाज की लगती, लेकिन पश्चिम के किसी नाम पर प्रेम के पर्व का नाम होने से इन हिंदुत्ववादियों को कम से कम इस एक दिन तो पे्रम से नफरत हो जाती है। और हिंदुस्तान के बेवकूफ प्रदेशों में सरकारें भी इन गुंडों की लाठियों के सामने आत्मसमर्पण करते हुए अपने शहरों के बाग-बगीचों से नौजवान लडक़े-लड़कियों को दूर भगाने में जुट जाती हंै। यह घोर साम्प्रदायिक, कट्टर, और नफरती सोच के सामने सरकार का समर्पण होता है, और यही बात इन गुंडों को मान्यता देती है।

छत्तीसगढ़ में पिछली भाजपा की डॉ. रमन सिंह की सरकार ने बलात्कारी आसाराम (उस वक्त बलात्कार कर चुका था, पर कैद नहीं हुई थी) के एक साम्प्रदायिक फतवे पर अंग्रेजी कैलेंडर के वेलेंटाइन-डे के दिन को मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाना शुरू किया था। उसी वक्त हमने इसी जगह पर उसका विरोध किया था कि माता-पिता की पूजा तो साल भर की जा सकती है, और इस पूजा को पे्रमी जोड़ों के प्रेम का कत्ल करके करवाने की जरूरत नहीं है। जिस आसाराम को अपने बुढ़ापे में पहुंचकर भी नाबालिग शिष्याओं से बलात्कार ठीक लगता था, उस आसाराम को नौजवान जोड़ों में प्रेम ठीक नहीं लग रहा था, और भाजपा की सरकार ने उसके दिए फतवे को सिर-आंखों पर उठाया था। एक तो आसाराम, ऊपर से भाजपा, और उनसे भी ऊपर उन्मादी हिंदू संगठन, इन सबने एक ऐसा माहौल बना रखा है कि मोहब्बत से बड़ा कोई जुर्म नहीं है। वैसे तो ये सब कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराने में लगे हुए हैं, लेकिन उन्हें कृष्ण का बचपन ही पसंद है, पे्रम करने की उनकी जवानी पसंद नहीं है। कृष्ण के वक्त से, कृष्ण के पहले से, और हाल के संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य से ये लोग पे्रम को अनदेखा करना चाहते हैं। इन्हें सबसे बड़ा डर यह है कि प्रेम धर्म और जाति के दायरों को तोडऩे की ताकत रखता है, और अगर ये दायरे टूट गए, तो फिर हिंदुत्व की बुनियाद ही हिल जाएगी। इसलिए प्रेम का अंकुर निकले, और उसे कुचल देना चाहिए। फिर इसके बाद भले मध्यप्रदेश के भाजपा मंत्री अपने नौकर से बलात्कार करते पकड़ाएं, या तरह-तरह के बलात्कार करते हुए हिंदुत्व के झंडाबरदार जगह-जगह पकड़ाएं, वह सब ठीक है, लेकिन दो बालिग लोगों के बीच सार्वजनिक जगह पर बैठ जाना भी इन लोगों की नजरों में जुर्म है, और इनकी नफरत के लिए हिंदुस्तान के बेवकूफ राज्यों में मोहब्बत से अधिक इज्जत है।

और मानो तुलसी पूजन दिवस, मातृ-पितृ पूजन दिवस काफी न हों, अब भारत सरकार के पशु पालन मंत्रालय के पशु कल्याण बोर्ड की तरफ से एक अपील जारी की गई है कि 14 फरवरी को काऊ-हग दिवस मनाया जाए। अंग्रेजी का शब्द हग, गोबर से अलग है, और इसका मतलब लिपटाना होता है। इस सरकार अपील में कहा गया है कि गौमाता कामधेनु होती है और पश्चिमी संस्कृति के बढऩे की वजह से वैदिक परंपराएं खत्म होने को हैं। चौदह फरवरी को सभी गौ प्रेमी गौमाता को लिपटाकर यह दिन मनाएं। यह अपील केंद्र सरकार के निर्देश पर जारी करने की बात भी लिखी गई है। मतलब यह कि इंसानी जोड़े एक-दूसरे को गले लगाने के बजाय, और ऐसा खतरनाक धर्मनिरपेक्ष, जातिनिरपेक्ष काम करने के बजाय तुलसी की पूजा कर लें, माँ-बाप के चरणों की पूजा कर लें, गाय को गले लगा लें, लेकिन जिन जोड़ों को अगली पीढ़ी लानी है, वे एक-दूसरे के गले न लगें। मोहब्बत जिन लोगों में इतनी दहशत पैदा करती है, और जो हर दिन नफरत फैलाने की कोई वजह तलाशते रहते हैं, आज अगर हिंदुस्तान में वही लोग इतिहासकार हो गए हैं, वही लोग संस्कृति के ठेकेदार हो गए हैं, चौकीदार हो गए हैं, तो फिर यह देश, इसकी जवान पीढिय़ां अंतरिक्ष की तरफ नहीं, घसीटकर गुफा की तरफ ले जाई जा रही हैं।

हिंदुस्तान की एक ऐसी काल्पनिक संस्कृति का इतिहास लेखन चल रहा है जिसमें मोहब्बत की कोई जगह नहीं थी। विरोध करने वाले ऐसे मवालियों को बलात्कार से परहेज नहीं है, बल्कि बलात्कारी कोई हिंदू हो तो उसके समर्थन में ये देश के तिरंगे झंड़े से लेकर, हिंदू झंड़ों तक को लेकर जुलूस निकालते हैं, आसाराम जैसे भयानक बलात्कारी के समर्थन में आज भी परिवार के बच्चों सहित जुलूस निकालते हैं, लेकिन जिन नौजवानों से वे हिंदुओं की अगली पीढ़ी लाने की उम्मीद करते हैं, उन नौजवानों को वे मिलने से तब तक रोकना चाहते हैं, जब तक उनके माँ-बाप अपने धर्म के भीतर, अपनी जाति के भीतर, अपनी मर्जी से उनके लिए जीवनसाथी तय न कर दें। ऐसे गिरोह की दहशत सिर्फ पश्चिमी संस्कृति से नहीं है, हिंदुस्तान के भीतर रक्त की शुद्धता खत्म हो जाने की दहशत भी उन पर हावी है, अगर नौजवान दूसरे धर्म, दूसरी जाति में शादी करने लगेंगे, तो अपने धर्म के कट्टर लोगों, धर्मांध हिंसकों की लठैती उन पर से खत्म हो जाएगी। ये लोग वेलेंटाइन-डे पर सिर्फ ईसाई इतिहास से आए हुए शब्द का विरोध नहीं कर रहे हैं, ये लोग भारत की जाति-व्यवस्था को जारी रखने के लिए मेहनत भी कर रहे हैं। और बेवकूफ सरकारें इन गिने-चुने मुट्ठी भर गुंडों को जेल में डालने के बजाय प्रेमी जोड़ों को भगाकर कानून व्यवस्था बनाए रखने का झूठ गौरव पाती हैं।
-सुनील कुमार

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