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-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तानी मीडिया में नफरत फैलाने की अधिकतर जिम्मेदारी टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने उठा रखी है क्योंकि अपनी पुरानी पहचान के मुताबिक टीवी के दर्शकों का अक्ल से अधिक रिश्ता नहीं रह जाता, और उन्हें नफरत बेचना उसी तरह आसान हो जाता है जिस तरह सडक़ किनारे कोई तमाशा दिखाकर मंजन बेचना। हिन्दुस्तान में नफरत के ये सौदागर अच्छी तरह पहचाने हुए हैं, और इन्हें अपने इस काम पर बड़ा फख्र भी दिखता है। इन्हें हिन्दुस्तान की दिक्कतों पर चर्चा के बजाय यहां के मुकाबले पाकिस्तान में महंगा बिकता आटा और पेट्रोल चर्चा के लायक लगता है ताकि हिन्दुस्तानी लोग अपनी दिक्कतों को लेकर किसी बेचैनी से न घिरें। और फिर देश के भीतर, पड़ोसी देशों से, एक धर्म के खिलाफ दूसरे धर्म को खड़ा करके, मोहब्बत की बात करने वाले राहुल गांधी को खिलौनों से खेलने वाला पप्पू साबित करते हुए ये लोग नफरत को दूर-दूर तक और नई ऊंचाईयों तक ले जाने में लगे रहते हैं। ऐसे में अभी सोशल मीडिया पर कांग्रेस के एक नेता के साथ ऐसे दो नफरतजीवी एंकरों की तस्वीरों को पोस्ट करते हुए एक महिला पत्रकार ने लिखा- नफरत के इन सौदागरों को कभी इंटरव्यू न दें, इंटरव्यू देना ही है तो मुझे दे दें, मैं ले लूंगी। उसने आगे लिखा- नफरत, हिंसा, और राष्ट्र की एकता को तोडऩे वालों के सामने आना पाप है।

इससे एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या जाहिर तौर पर नफरत फैलाने में लगे हुए ऐसे टीवी एंकरों, या मीडिया के दूसरे लोगों से धर्मनिरपेक्ष और अमन-पसंद लोगों को बात नहीं करना चाहिए? यह सवाल दिलचस्प इसलिए भी है कि बड़े कारोबारी मीडिया का मालिकाना हक इन दिनों तरह-तरह के आर्थिक अपराधियों या विवादास्पद कारोबारियों के पास आ गया है। और अगर जाहिर तौर पर इनकी नीयत पल-पल उजागर न भी होती हो, तो भी उनका वह एजेंडा तो रहेगा ही। कभी-कभी उनके सवाल मासूम लग सकते हैं, लेकिन अपना नाखूनों और दांतों के बिना वे आखिर खाएंगे क्या? इसलिए यह तो तय है कि वे या तो हर बातचीत में नफरत को आगे बढ़ाने का अपना एजेंडा लागू करते होंगे, या फिर वे कुछ भले लोगों से भली या बुरी कैसी भी बातें करके उनकी साख का इस्तेमाल अपनी साख को बनाने और बढ़ाने में करते होंगे। टीवी से परे अखबारों में भी कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी सारी साम्प्रदायिकता के बीच किसी एक धर्मनिरपेक्ष लेखक का एक कॉलम छापकर उसकी साख को अपनी साख में तब्दील करने का काम करते हैं। तो ऐसे में लिखने वाले लोगों, बहस में शामिल होने वाले लोगों, और इंटरव्यू देने वाले नेताओं या प्रमुख लोगों को क्या करना चाहिए?

वैसे तो जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, उनके लिए यह कुछ मुश्किल काम ही होता है कि वे किसी भी माइक्रोफोन और कैमरे को मना कर सकें। और ऐसी मनाही का एक मतलब आगे के लिए दुश्मनी भी होता है। लेकिन भारतीय राजनीति में भी कुछ ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने कुछ चैनलों या कुछ अखबारों के लोगों के सवालों का जवाब देने से साफ मना कर दिया। इस वक्त अर्नब गोस्वामी टाईम्स नाऊ चैनल का मुखिया था, और वहां से नफरत फैलाता था, तो कुछ नेताओं ने भरी प्रेस कांफ्रेंस में भी टाईम्स नाऊ के रिपोर्टर के सवालों का जवाब देने से मना कर दिया था। ऐसा करना आसान नहीं रहता है क्योंकि कई बार नफरत से परे काम करने वाले मीडिया के लोग भी अपने नफरतजीवी साथी का साथ देने के लिए गिरोहबंदी पर उतर आते हैं, और नेता को एक पूरा बहिष्कार झेलना पड़ सकता है। फिर यह भी है कि इंटरव्यू देने वाले या प्रेस कांफ्रेंस लेने वाले लोगों का अपना नैतिक मनोबल भी इतना ऊंचा रहना चाहिए कि वे किसी बुरे मीडिया को मुंह पर साफ-साफ मना करने का हौसला रख सकें, और दिखा सकें।

लेकिन बुनियादी बात पर अभी भी चर्चा बाकी है कि ऐसे बदनाम मीडिया के बदनाम लोगों से बात करनी चाहिए या नहीं? इसका जवाब आसान नहीं हो सकता, लेकिन है जरूर। लोग इंटरव्यू दे सकते हैं, सवालों के जवाब दे सकते हैं, लेकिन उनमें से किस जवाब के किस हिस्से को किस तरह से पेश किया जाएगा, यह तो उसी बदनाम मीडिया के बदनाम रिपोर्टर या एंकर के हाथ में रहेगा। इसलिए ऐसे लोगों से बात करना कम खतरनाक नहीं होता है क्योंकि वे लोग वैचारिक रूप से असहमत लोगों से बात करने, उन्हें जगह देने का दिखावा भी करते हैं, और उनकी बातों को कुल मिलाकर तोड़-मरोडक़र अपने एजेंडा के मुताबिक इस्तेमाल भी कर लेते हैं। अगर पांच उंगलियां एक माईक और एक मुंह होने से ही कोई इंटरव्यू लेने के हकदार हो सकते हैं, तो बदनाम मीडिया के बदनाम लोगों के मुकाबले बेहतर साख वाले छोटे मीडिया के अनजान लोगों से भी बात करना बेहतर है।

नेताओं के मुकाबले सडक़ों पर आम जनता अधिक जागरूक रहती हैं क्योंकि उसका दांव पर कम लगा रहता है। वह कई बार कई बदनाम चैनलों के लोगों से बात करने से मना कर देती है, और उन्हें आईना भी दिखाती है कि उनकी किन हरकतों की वजह से वे उनसे बात करना नहीं चाहते। लेकिन वोटों की राजनीति में लगे हुए लोग हर बार इतना खरा-खरा नहीं बोल पाते। बीच-बीच में ऐसा जरूर होता है कि कोई राजनीतिक पार्टी किसी चैनल का कम या अधिक समय तक पूरा बहिष्कार करती है, वहां पर अपने प्रवक्ता नहीं भेजती है, लेकिन धीरे-धीरे फिर बीच का कोई रास्ता निकाला जाता है, और सार्वजनिक जीवन की इस बात को मान लिया जाता है कि राजनीति में कोई स्थाई शत्रु नहीं होते। लेकिन अभी सोशल मीडिया पर यह सवाल उठना एक बड़ा प्रासंगिक मामला है, और इस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। ऐसी चर्चा से नफरतजीवी लोगों में थोड़ी सी बेचैनी होगी क्योंकि सवाल पूछने के उनके पेशेवर एकाधिकार के खिलाफ जाकर दूसरे लोग भी उनसे सवाल कर सकेंगे। और सवाल करने वालों से सवाल न करना कोई शर्त तो हो नहीं सकती। ऐसी जागरूकता से ही नफरत फैलाने वाले लोगों के हौसले पस्त हो सकते हैं। जो उनका बहिष्कार करना चाहें, वह भी ठीक है, और जो उनसे बात करते हुए कुछ असुविधाजनक सवाल करना चाहें, वह भी ठीक है। लेकिन उन्हें स्वाभाविक मीडिया मानकर उनकी नफरत को अनदेखा करना ठीक नहीं है। वरना नफरत पर टिकी हुई मीडिया आज के लिए नवसामान्य हो जाएगी। आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कई किस्म की नफरत नवसामान्य हो गई है, लेकिन बदनाम मीडिया को नवसामान्य का दर्जा देना देश में नफरत को और फैलाने से कम कुछ नहीं होगा।

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