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पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में जानलेवा हिंसा की खबरें बेहद चिंताजनक है। लोकतंत्र में मतों की गिनती होनी चाहिए, लेकिन ये चुनाव शोकतंत्र में तब्दील हो गए हैं, जहां मतों की जगह शवों की गिनती हो रही है। ये पहली बार नहीं है जब प.बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा हुई हो। इससे पहले 2013 के पंचायत चुनाव में 13 और फिर 2018 के पंचायत चुनावों में भी मतदान के दिन 14 लोगों की हिंसा की वजह से मौत हो गई थी। यही हालात लोकसभा और विधानसभा चुनावों में रहे। 2019 के लोकसभा चुनावों में 9 और 2021 के विधानसभा चुनावों में 16 मौतें प.बंगाल में हुई थीं। हिंसा के इस इतिहास को देखते हुए ये भी कहा जाने लगा कि प.बंगाल में चुनाव में हिंसा अब जानी-पहचानी बात है। ऐसी धारणा का बनना निश्चित ही लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। अगर किसी राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा की आशंका हो, तो पहले से समूचे प्रशासनिक तंत्र और केंद्र व राज्य सरकार को मिलकर शांतिपूर्ण चुनाव के लिए प्रतिबद्ध होकर उस आशंका को गलत साबित करने में जुट जाना चाहिए। लोकतंत्र किसी एक के भरोसे नहीं चल सकता। इसमें वाकई सबका साथ चाहिए। प.बंगाल में इस साथ की बहुत कमी दिखाई दी।

8 जून को पंचायत चुनाव की घोषणा के बाद से माहौल बिगड़ता दिख रहा था। मतदान के दिन ही 18 लोगों की मौत हो गई और जून से लेकर अब तक कुल 37 लोग मारे जा चुके हैं। हिंसा की आशंका देखते हुए ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने छह जुलाई को कहा था कि 11 जुलाई को मतदान का नतीजा घोषित होने के बाद भी दस दिनों तक केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान राज्य में तैनात रहेंगे। लेकिन उच्च अदालत के निर्देश के बावजूद सुरक्षा इंतजामों में कहीं कोई बड़ी चूक हुई है, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। दुख इस बात का है कि हालात का तार्किक विश्लेषण करने की जगह एक दूसरे पर आऱोप-प्रत्यारोप का खेल शुरु हो चुका है। लाशों पर राजनैतिक रोटी सेंकना किसे कहते हैं, प.बंगाल के हालात इस वक्त इसका जीता-जागता नमूना दिखा रहे हैं। चुनाव आयोग पर सवाल उठे तो राज्य के चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा ने जवाब दिया कि कानून और व्यवस्था की ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की है, आयोग का काम पूरी व्यवस्था को संभालना है। उनका यह भी कहना है कि केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान अगर कुछ पहले राज्य में पहुंच गए होते तो हिंसा पर अंकुश लगाया जा सकता था। शनिवार दोपहर तक केंद्रीय बलों की 660 कंपनियां ही राज्य में पहुंची।

जबकि कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश के बाद आयोग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से 822 कंपनियों की मांग की थी। वैसे इससे पहले चुनाव आयोग ने केवल 22 कंपनियां ही मांगी थी। फिर यह खींचतान राज्य में चली कि चुनाव केंद्रीय बलों की निगरानी में होने चाहिए या नहीं। हाईकोर्ट के निर्देश के खिलाफ ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। जहां उनकी अपील को खारिज करते हुए सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के निर्देश को बरकरार रखते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि ‘चुनाव कराना हिंसा के लिए लाइसेंस नहीं हो सकता और हाईकोर्ट ने पहले हुईं हिंसा की घटनाओं को देखा है… चुनाव के साथ हिंसा नहीं हो सकती। अगर लोग अपने नामांकन ही नहीं दाखिल कर पा रहे हैं और उन्हें नामांकन करने जाते समय मार दिया जा रहा है तो मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कहां रह गए?Ó इसके बाद राज्य चुनाव आयोग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से और आठ सौ कंपनियां भेजने का अनुरोध किया। लेकिन उसमें से आखिर तक 660 कंपनियां ही यहां पहुंचीं।

इस समूचे घटनाक्रम को देखते हुए लगता है कि भविष्य में क्या होने वाला है, इसका अनुमान होते हुए भी महज राजनैतिक वर्चस्व दिखाने के लिए लोगों की सुरक्षा से समझौता किया गया। अब जबकि 30 से अधिक मौतें हो चुकी हैं, तमाम राजनैतिक दल एक-दूसरे पर उंगली उठाने लगे हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिख कर राज्य में लोकतंत्र की बहाली के लिए हस्तक्षेप की मांग की है।

भाजपा की राज्य ईकाई ने राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग तक कर दी है। जिसे देखकर लगता है कि भाजपा मौके पर चौका लगाने की फिराक में ही बैठी है। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में तो दो महीने से अधिक समय से हिंसा चल रही है, वहां न शांति बहाली की कोशिश भाजपा की ओर से हो रही है, न राष्ट्रपति शासन लगाने जैसी कोई मांग हुई, क्योंकि राज्य में भाजपा की ही सरकार है। मगर प.बंगाल में सत्तारुढ़ टीएमसी के हाथों से शक्ति छीनने का यह माकूल अवसर भाजपा को दिख रहा है। इधर ममता बनर्जी भी इसके लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। उनका तर्क है कि मृतकों में सबसे अधिक टीएमसी के लोग हैं। अनुभवी राजनेता ममता बनर्जी को यह तो पता होगा ही कि जो सत्ता में रहता है, पहली जिम्मेदारी उसकी बनती है। दूसरी बात यह कि आग जब फैलती है तो अपने-पराए का भेद किए बिना सबको खाक करती जाती है। चुनाव के दौरान हुई हिंसा में अपने पार्टी कार्यकर्ताओं की मौत को ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

प.बंगाल में जब वामपंथी सरकार रही, तब भी चुनाव में हिंसा होती थी और अब तृणमूल कांग्रेस के लंबे शासन में भी हालात नहीं बदले हैं, तो इसका सीधा अर्थ यही है कि राज्य में राजनैतिक विभाजन इतना गहरा है कि जनता के साथ-साथ लोकतंत्र को चलाने वाली संस्थाएं भी इसमें बंट चुकी हैं। इसका एक ही तरीका है कि इसे एक या दूसरे की समस्या न मानकर समूचे लोकतंत्र की समस्या समझा जाए और उसी समग्रता के साथ उसका समाधान तलाशा जाए।

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