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हर मुद्दे पर चर्चा से भागने वाली केन्द्र सरकार लगता है कि आलोचना से बचने के लिये अब तमाम मुखर विपक्षी जन प्रतिनिधियों को देश की सर्वोच्च पंचायत से बाहर का रास्ता दिखाने का तरीका अपना चुकी है। राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता समाप्त करने के बाद सोमवार को आम आदमी पार्टी के संजय सिंह को भी जारी सत्र के शेष समय के लिये राज्यसभा से निलम्बित कर दिया गया। विभिन्न नियमों का हवाला देते हुए चाहे संसद के ऊपरी सदन के सभापति ने उन्हें निलम्बित किया हो, पर यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि सरकार के खिलाफ हमलावर होने की कीमत संजय सिंह ने चुकाई है। देखना होगा कि भाजपा सरकार के विरूद्ध बेखौफ बोलकर अपने संसदीय दायित्व का निर्वाह करने वाले अभी और कितने सांसद सरकार की गिलोटिन के नीचे आते हैं।
मणिपुर में व्यापक हिंसा और महिलाओं के उत्पीड़न के वीभत्स मामले सामने आने के बाद से ही भाजपा की केन्द्र व मणिपुर दोनों की ही सरकारें बुरी तरह से घिर गयी हैं। बहुसंख्यक मैतेइयों द्वारा कुकी आदिवासियों पर हो रहे भीषण अत्याचार की कहानियां जैसे-जैसे खुल रही हैं, देश में बेचैनी है। दुनिया में भी भारत की साख को बट्टा लगा है। सरकार की छिछालेदार जो हो रही है सो अलग। मणिपुर की हिंसा और खासकर देश में अल्पसंख्यकों पर होने वाली ज्यादतियों एवं धार्मिक आजादी के हनन को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने पिछले विदेशी दौरों तक में जवाब देना पड़ गया था। उत्तर-पूर्व के इस राज्य में हो रही हिंसा के तांडव पर मोदी सरकार वैसी ही चुप रह जाती जिस प्रकार वह अपने 9 वर्षों के कार्यकाल में नोटबन्दी, नये नागरिकता कानून, कश्मीर में अनुच्छेद 370 के विलोपन, किसान आंदोलन, राफेल विमान खरीदी, अदानी और मोदी के रिश्तों, देश में बलात्कारों व दलित हत्याओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न आदि से संबंधित सवालों पर चुप्पी साधती रही है। मणिपुर के वायरल वीडियो से व्यथित सुप्रीम कोर्ट द्वारा संज्ञान लेकर जब सरकार से जवाब मांगा गया, तो आनन-फानन में मोदी संसद का सत्र प्रारम्भ होने के पहले संसद भवन के बाहर आये। उन्होंने संक्षिप्त उद्बोधन में खुद को क्रोध और पीड़ा में बतलाते हुए किसी भी दोषी को न बख्शने की बात की।
मामला संसद में उठना ही था। भाजपा द्वारा स्थापित गलत परम्परा का पालन करते हुए खुद सत्ता दल के सांसदों ने गतिरोध प्रारम्भ कर दिया। हालांकि मामला इतना संवेदनशील था कि प्रधानमंत्री को स्वयं ही संसद में बयान देना चाहिये था क्योंकि दोनों ही जगहों (केन्द्र व मणिपुर राज्य) में उनके ही दल की सरकारें हैं। डबल इंजन की बार-बार दुहाई देने व उसकी आवश्यकता निरूपित करने वाले मोदी व उनकी पार्टी में से कोई भी यह बताने के लिये खड़ा नहीं हुआ कि इन परिस्थितियों का जिम्मेदार कौन है। सदन के बाहर पूर्व मंत्री रविशंकर प्रसाद और एक बार सदन के भीतर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार का बचाव करने की आधी-अधूरी कोशिश की। प्रसाद ने कांग्रेस पर ही चर्चा से भागने व गम्भीर न होने का आरोप लगाया, तो राजनाथ सिंह कहते रहे कि सरकार की ओर से जवाब दिया जायेगा।
पिछले हफ्ते के पहले के दो दिन तो हंगामे की भेंट चढ़ ही गये थे, सोमवार को एकजुट विपक्ष ने फिर सरकार पर जमकर धावा बोला। प्रतिपक्ष नियम 267 के तहत लम्बी चर्चा मांग रहा है तो सत्ता पक्ष नियम 176 के अंतर्गत संक्षिप्त चर्चा पर अड़ा है। विपक्षी सदस्यों की मांग है कि प्रधानमंत्री स्वयं बयान दें जबकि सरकार का कहना है कि सरकार की ओर से कोई भी बयान दे सकता है। विपक्ष की मांग को अध्यक्ष ओम बिरला ने यह कहकर खारिज कर दिया कि बयान के लिये किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता।। विस्तृत चर्चा की जायज मांग पर विपक्ष के अड़ने और इससे बचने हेतु दोनों सदनों में सत्ता पक्ष के हथकंडों से यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
राज्यसभा में जब आप के संजय सिंह सदन की वेल में आकर इस मांग को दोहरा रहे थे तभी सदन के नेता व केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने सभापति जगदीप धनखड़ से सत्र की बची अवधि के लिये सिंह को निलम्बित करने की मांग की जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया।
संजय सिंह सर्वश्रेष्ठ सांसदों में से एक हैं जो अपने अध्ययन व तर्कों से सरकार के खिलाफ बड़े मोर्चे खोलते रहे हैं। अयोध्या में जमीन बिक्री घोटाले से लेकर अदानी मामले तक वे सदन के भीतर-बाहर तूफान खड़ा करते रहे हैं। स्वाभाविक है कि वे सरकार की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। लगता है कि झल्लाई सरकार एक-एक कर सभी मुखर सांसदों को निकाल बाहर करने पर आमादा है ताकि वह निरंकुश शासन चला सके। इसका सभी को विरोध करना चाहिये।

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