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-सुनील कुमार॥

इजराइल के बारे में आज एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यह देश अपने इतिहास के सबसे गंभीर घरेलू संकट से घिरा हुआ है। वहां लाखों जनता सडक़ों पर है, और पुलिस की पानी की बौछारों के सामने भी लाख से अधिक लोग राजधानी में संसद को जाने वाले रास्तों को घेरकर खड़े हैं, देश के बहुत से और शहरों में सरकार के खिलाफ ऐसे प्रदर्शन हो रहे हैं जिन्हें इजराइल में, या दुनिया के अधिकतर लोकतंत्रों में किसी ने देखा-सुना नहीं था। ऐसे विरोध-प्रदर्शन में इजराइल की एयरफोर्स के रिजर्व पायलटों ने भी विमान उड़ाने से इंकार कर दिया था।

यह सारा विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि आज की वहां की सरकार संसद में संविधान में ऐसे बुनियादी फेरबदल का कानून पास कर रही है जिससे देश की अदालतें सरकार के लिए गए फैसलों को असंवैधानिक करार नहीं दे पाएंगी। इस कानून के बाद अब वहां का सुप्रीम कोर्ट सरकारी फैसलों को नहीं पलट सकेगा। इसे इजराइल की जनता देश में लोकतंत्र का खात्मा मान रही है। संसद में विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया है, लेकिन वहां की आज की सरकार इजराइल की इतिहास की सबसे कट्टर, दकियानूसी, और दक्षिणपंथी सरकार मानी जा रही है क्योंकि उसमें शामिल कुछ पार्टियां, और उसके कुछ नेता फिलीस्तीन के खिलाफ भयानक अलोकतांत्रिक और हमलावर नजरिया रखते हैं, और वे धर्मान्ध कट्टरता से भरे हुए हैं। इजराइल में वहां पहले से चले आ रहे एक प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने इस बार बहुमत न मिलने पर सभी किस्म की पार्टियों का एक गठबंधन बनाकर सत्ता पर कब्जा किया है, और इसीलिए वे अधिक से अधिक कट्टर फैसले लेने के लिए मजबूर भी हैं। इस साल के शुरूआत से ही सरकार की इस तथाकथित न्यायिक सुधार योजना के खिलाफ इजराइल की जनता प्रदर्शन करते आ रही है, और देश के तमाम बड़े शहरों और कस्बों में यह चल रहा है। इजराइल के इतिहास में ऐसे प्रदर्शन कभी नहीं हुए थे, और वहां की जनता के एक छोटे हिस्से के शांतिप्रिय होने, और फिलीस्तीन पर हमलों का विरोध करने के बाद भी इजराइली जनता लोकतंत्र को लेकर इतनी संवेदनशील है, यह पहली बार पता लगा है। देश के प्रमुख तबकों के बड़े-बड़े लोग, आज काम कर रहे और रिटायर्ड लोग खुलकर इस सरकारी फैसले के खिलाफ हैं, और जनता का मानना है कि इससे एक किस्म से देश में ऐसी सरकारी तानाशाही खड़ी हो जाएगी जिसके खिलाफ कोई अदालती राहत नहीं मिल सकेगी। जैसा कि किसी भी और लोकतंत्र में होता है, सरकारी मनमानी के खिलाफ अदालतें राहत की एक जगह रहती हैं, लेकिन इजराइल ने यह नया कानून बनाकर इसे खत्म कर दिया है। ऐसा कहा जाता है कि मौजूदा सरकार में प्रधानमंत्री सहित कुछ और लोग भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप और मुकदमे झेल रहे हैं, और इसलिए उन्हें बचाने के लिए सरकार ने यह संवैधानिक फेरबदल किया है।

इजराइल में जनता का इस तरह से लोकतंत्र के पक्ष में उठ खड़ा होना दुनिया भर के बाकी देशों के लिए एक बड़ी मिसाल भी है कि अतिसंपन्न जनता भी लोकतंत्र के पक्ष में अपने आरामदेह घर-दफ्तर छोडक़र इस तरह सडक़ों पर सरकारी फौज के सामने सीना तानकर खड़ी हो सकती है। इजराइल की जनता गरीब और भूखी नहीं है, वहां के लोग दुनिया के सबसे कामयाब कारोबारी हैं, और यही इजराइल जब पड़ोस के फिलीस्तीन पर रात-दिन जुल्म करता है, लोगों की हत्या करता है, हवाई हमले करता है, तब यह इजराइली जनता कभी इस तरह से अपने देश के किए जा रहे ऐसे हमलों के खिलाफ खड़ी नहीं हुई है। लेकिन जब देश के भीतर लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को तोडऩे की यह कार्रवाई चल रही थी, तो पिछले महीनों में इसी जनता ने अपने घरेलू लोकतंत्र के लिए यह ऐतिहासिक और असाधारण प्रदर्शन किया, और ऐसा लगता है कि आज यह सरकार यह सब कर तो पा रही है, लेकिन जनता के ऐसे विरोध के बाद इस सरकार, ऐसे नेताओं, और उनकी पार्टियों का कोई भविष्य नहीं है। अपने देश की न्यायपालिका को इस हद तक कमजोर करने की सरकारी कोशिश के खतरे जनता समझ रही है यह उसकी लोकतांत्रिक समझ का एक सुबूत है। हिन्दुस्तान के एक महान विचारक और नेता राममनोहर लोहिया ने यह कहा भी था कि जिंदा कौमे पांच बरस इंतजार नहीं करतीं, इजराइल की जनता ने यह साबित किया है कि वह अगले चुनाव में इन नेताओं को खारिज करने का इंतजार नहीं करने वाली है, उसने लगातार महीनों से इतना ताकतवर प्रदर्शन करके अपनी लोकतांत्रिक समझ और पक्के इरादों को सामने रखा है। किसी भी जागरूक देश और समाज के लिए ऐसी जागरूक जनता ही सबसे बड़ी ताकत होती है। आज इजराइली जनता ने अपनी ही सरकार को इस हद तक खारिज कर दिया है कि जिसकी कोई हद नहीं। यह देखकर दुनिया के और लोकतंत्रों को एक नसीहत लेनी चाहिए।

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