रूसी फौज वियाग्रा खाकर कर रही यूक्रेनी महिलाओं पर हमले..

-सुनील कुमार।।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक बड़ी अफसर प्रमिला पैटन ने अभी कहा है कि रूसी सैनिकों को एक फौजी रणनीति के तहत वियाग्रा देकर यूक्रेन के मोर्चे पर भेजा जा रहा है ताकि कैद की जाने वाली यूक्रेनी महिलाओं, और वहां के बच्चों, आदमियों को बलात्कार करके तमाम यूक्रेनी आबादी में दहशत पैदा की जा सके, और उन्हें हताश किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र जो कि आमतौर पर देशों के बीच विवाद में निष्पक्ष बने रहने की भरसक कोशिश करता है, उसकी अफसर की कही गई यह बात भयानक है, और अगर यह सच है तो यह एक नए किस्म का युद्ध अपराध है। वैसे तो दुनिया में जब कभी आम जिंदगी से हटकर कुछ भी होता है, तो उसका पहला शिकार औरतें और बच्चे होते हैं। चाहे यह पर्यटन हो, प्राकृतिक या मानव निर्मित विपदाओं की वजह से बेदखली हो, किसी जंग की वजह से देश छोडक़र जाने को मजबूर आम जनता हो, हर किस्म के अचानक और बुरे हालात की पहली मार औरत-बच्चों पर पड़ती है, और यूक्रेन में भी वही हो रहा है। जिस तरह यूक्रेन से आज करोड़ों लोगों को देश छोडक़र जाना पड़ रहा है, और दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ रही है, उससे भी सेक्स-शोषण और मजबूरी में सेक्स के कारोबार के शिकार औरत-बच्चों की भयानक कहानियां अगले कई बरस तक आती ही रहेंगी। लेकिन अपनी फौज को बलात्कारी बनाकर उस तैयारी से भेजने की बात दुनिया की सारी कहानियों से आगे बढक़र दिल दहलाती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की इस महिला अधिकारी की इस बात पर बांग्लादेश से निर्वासित और भारत में शरण पाकर बसी हुई लेखिका तसलीमा नसरीन ने लिखा है कि रूसी सैनिकों को वियाग्रा देकर यूक्रेन भेजा गया है ताकि वे बलात्कार कर सकें, लेकिन 1971 के जंग में पाकिस्तानी फौज ने दो लाख बांग्लादेशी महिलाओं से बलात्कार किया था और उनके पास वियाग्रा भी नहीं थी। तसलीमा ने जो लिखा है वे बातें उस वक्त भी हिन्दुस्तानी, पूर्वी पाकिस्तानी (अब बांग्लादेश) और दुनिया के मीडिया में खुलासे से आई थीं कि किस तरह पश्चिम पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) से आई हुई फौजों ने अपने ही देश के पूर्वी हिस्से की क्रांति को कुचलने के लिए जुल्म ढहाए थे, जिसके तहत महिलाओं से बड़े पैमाने पर बलात्कार किए गए थे। इन्हीं तमाम स्थितियों का जिक्र करते हुए, और पूर्वी पाकिस्तान से भारत में आने वाले करीब एक करोड़ शरणार्थियों का जिक्र करते हुए भारत ने इस जंग में दखल दी थी, और पाकिस्तान की फौज का आत्मसमर्पण करवाया था, और पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाए थे। आज दुनिया के अधिकतर हिस्सों से जंग के बीच फौजों के संगठित बलात्कार की खबरें आती हैं, और उन्हें जंग का एक हिस्सा मानकर चला जाता है।

महिलाओं पर जंग का पहला वार शुरू होता है, और वह अंत तक चलते रहता है। लेकिन महिलाओं से भेदभाव के मामले में हमलावर देशों की सरकारें या वहां के फौजी अकेले नहीं रहते। आज जब यूक्रेन पर रूस के परमाणु हमले के खतरे पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा चल रही है, अटकलें लगाई जा रही हैं, तब परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का कैसा असर होगा, यह सुनना अपने आपमें दहशत तो पैदा करता ही है, लेकिन वैज्ञानिकों के निकाले गए कुछ निष्कर्ष आज ही एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक इंटरव्यू में सामने आए हैं जो कि विज्ञान के लैंगिक भेदभाव को बताते हैं। यह भला किसने सोचा होगा कि परमाणु बम बनाने वाले वैज्ञानिकों से यह एक ऐसी विनाशकारी तकनीक बन रही है जो कि औरत और मर्द में भेदभाव करेगी! वैज्ञानिक नतीजे बतलाते हैं कि परमाणु विस्फोट के बाद जो विकिरण फैलता है, या फैलेगा, उसका असर आदमियों के मुकाबले औरतों के बदन पर अधिक होगा, और वयस्कों के मुकाबले बच्चों के बदन पर अधिक होगा। यह तकनीक इस तरह के भेदभाव के साथ जनसंहार करने के लिए बनाई नहीं गई है, लेकिन वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि चाहे किसी परमाणु-बिजलीघर से फैले हुए परमाणु विकिरण की बात हो, या परमाणु हथियारों से, महिलाओं के बदन पर इसका असर पुरूषों के बदन के मुकाबले अधिक होता है। जंग की दुनिया की इस सबसे खतरनाक तकनीक का असर भी इस तरह भेदभाव का हो सकता है यह बात किसी को शायद सूझी भी नहीं होगी, लेकिन यही हकीकत है।

और यह बात महज दुश्मन देशों के बीच फौजियों की की हुई नहीं होती है। देश के भीतर ही जो पुलिस या पैरामिलिट्री हथियारबंद लोग होते हैं, वे भी हथियारबंद संघर्ष के कई मोर्चों पर इस तरह के जुर्म करते मिलते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर के नक्सल मोर्चे पर कई बार पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर स्थानीय गरीब आदिवासी ग्रामीण महिलाओं के साथ बलात्कार और उनके यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना रहा है कि बीते करीब दो दशक में बलात्कार को आदिवासी समुदाय का आत्मविश्वास तोडऩे के लिए भी एक मौन सहमति या अनुमति दी गई थी, ताकि समुदाय का आत्मगौरव खत्म हो, उनका आत्मविश्वास कुचल जाए। इस बारे में बिना अधिक सुबूतों के अधिक खुलासे से लिखना ठीक नहीं होगा, लेकिन अभी कुछ बरस पहले तक की पुलिस ज्यादती के दौर में बस्तर में, उत्तर-पूर्वी राज्यों में जगह-जगह सुरक्षाबलों पर इस तरह के आरोप लगते आए हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया भर में हथियारबंद वर्दीधारियों के बीच बलात्कार को एक और हथियार की तरह इस्तेमाल करने की एक संस्कृति रही है, और उसे जिस तरह आज शायद रूस वियाग्रा देकर बढ़ावा दे रहा है, उसे कुछ सरकारें अनदेखा करके भी बढ़ावा दे सकती हैं। जब दुनिया के किसी और कोने में इस तरह की फौजी रणनीति सामने आती है, तब बाकी देशों को भी अपने भीतर लगने वाले ऐसे आरोपों, और उनकी अनदेखी के बारे में सोचना चाहिए, आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन करना चाहिए।

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