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-सुनील कुमार॥

फ्रांस में 17 साल के एक नौजवान को पुलिस ने सडक़ पर रूकने कहा लेकिन उसने गाड़ी नहीं रोकी, इस पर चौराहे पर जब गाड़ी रूकी, तो पुलिस ने उसे गोली मार दी। इसे लेकर पिछले पांच दिनों से फ्रांस बुरी तरह जल रहा है। चूंकि राष्ट्रपति से लेकर बाकी तमाम लोगों ने पुलिस की इस हड़बड़ कार्रवाई की आलोचना की है, इसलिए पुलिस अभी चारों तरफ चल रही आगजनी पर भी अपने पर काबू रख रही है। यह एक अलग बात है कि देश के विपक्ष से लेकर पुलिसकर्मियों के संगठन तक राष्ट्रपति से कह रहे हैं कि ऐसी भयानक हिंसा के खिलाफ आपात कार्रवाई के कानून का इस्तेमाल करना चाहिए। अफ्रीकी मूल के इस लडक़े को पुलिस ने जिस अंदाज में मारा है उससे लोगों को याद पड़ रहा है कि पिछले बरस भी एक दर्जन से ज्यादा लोगों को पुलिस ने इसी तरह रेडलाईट पर थमी कार में मार डाला था। पुलिस को कड़ी कार्रवाई करने के लिए जो अधिकार दिए गए हैं, उनका जाहिर तौर पर बेजा इस्तेमाल माना जा रहा है। अल्पसंख्यक लोगों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर पहले से रंगभेद और पूर्वाग्रह के आरोप लग रहे थे। अब फ्रांस के अलग-अलग कई शहरों में भारी आगजनी चल रही है, सडक़ों पर गाडिय़ां जल रही हैं, सरकारी इमारतों को जलाया जा रहा है। यह पूरा आंदोलन सिर्फ काले लोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसमें और समुदायों के लोग भी शामिल हैं जो कि पुलिस की कार्रवाई से असहमति रखते हैं। राष्ट्रपति ने पुलिस की इस कार्रवाई की जमकर आलोचना की है, और पुलिस संगठन ने कहा है कि राष्ट्रपति को जांच के पहले इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए था।

योरप के देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलग पैमाने हैं, और पुलिस या समाज में किसी की रंगभेदी-नस्लभेदी दिखने वाली कार्रवाई के खिलाफ कड़े कानून हैं। समाज में नागरिकों, और शरण पाए हुए शरणार्थियों के अधिकार भी बहुत अधिक हैं, और समाज के एक बड़े तबके में यह जागरूकता भी है कि अल्पसंख्यकों और शरणार्थियों को भी हिफाजत और बराबरी का हक है। वहां पुलिस और सरकार अपनी छोटी-छोटी कार्रवाई के लिए भी जनता और कानून के प्रति जवाबदेह रहती हैं। लोगों को याद होगा कि अभी किस तरह लॉकडाउन और कोरोना नियमों के दौरान ब्रिटेन में प्रधानमंत्री निवास पर काम कर रहे लोगों ने एक जगह इकट्ठा होकर एक छोटी पार्टी कर ली, तो वह मामला बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ा कि लंदन की पुलिस ने जाकर प्रधानमंत्री निवास पर जांच की, बयान लिए, और पेनाल्टी के चालान जारी किए। दूसरी तरफ इस विवाद के दौरान ही प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन को पहले प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, और फिर इस बारे में संसद में झूठ बोलने के आरोप में अब संसद से इस्तीफा देना पड़ा है।

दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों में जवाबदेही बड़ी होती है, लोगों को अपनी एक-एक सार्वजनिक और निजी हरकत के लिए जनता, कानून, और संसद के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान जैसे देश हैं जहां लोकतंत्र एक ऐसी बदहाली में पहुंच चुका है कि सत्ता पर बैठे हुए लोग, संविधान की शपथ लिए हुए लगातार नफरत फैलाने का काम करते हैं, और कई किस्म के जुर्म करते हैं, लेकिन बिना किसी जवाबदेही के देश की आखिरी अदालत तक लड़ते भी जाते हैं, और सत्ता पर काबिज भी रहते हैं। किसी तरह की कोई शर्म या झिझक अब भारतीय लोकतंत्र में अपने कुकर्मों को लेकर नहीं रह गई है। यह देखकर लगता है कि जहां एक शरणार्थी, या अफ्रीकी मूल के लडक़े की पुलिस के हाथों मौत पर पूरा देश जल उठा है, वहां पर हिन्दुस्तान में सत्ता की मेहरबानी से हिंसा करते हुए लोग सडक़ों पर खुलेआम कैमरों के सामने भीड़त्या करते हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ता। लोग अपनी ऐसी हिंसा के वीडियो बनाकर फैलाते हैं, ईश्वर के नाम के नारे लगाते हैं, देश के तिरंगे झंडे का इस्तेमाल करते हैं, परले दर्जे की साम्प्रदायिक और नफरती हिंसा करते हैं, और उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता। सभ्य समाज वही होता है जो कि अपने सबसे कमजोर तबके के लोगों के हक का भी सम्मान करता है, उनके हक के लिए लड़ता है। आज फ्रांस में सडक़ों पर चल रही आगजनी और तोडफ़ोड़ खराब बात है, हम उसको लोकतंत्र नहीं कह रहे हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि जिस लोकतांत्रिक जागरूकता के चलते हुए फ्रांसीसी जनता सडक़ों पर उतर आई, कानून अपने हाथ में ले रही है, पुलिस के अधिकारों में कटौती की मांग कर रही है, वह सब कुछ एक जिंदा देश होने का सुबूत है। यह एक अलग बात है कि लोगों का गुस्सा इतना अधिक है कि वे लोकतंत्र के तहत मिले हुए अधिकारों का हिंसक इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन यह बात भी है कि इस आक्रोश को देखकर देशों की सरकारें और संसद यह सोचने पर मजबूर होती हैं कि कानून और व्यवस्था में फेरबदल की जरूरत है।

दुनिया के बाकी लोकतंत्रों को भी यह समझना चाहिए कि उनके भीतर के सबसे कमजोर तबके, चाहे वे किसी देश की संस्कृति में दलित और आदिवासी हों, अल्पसंख्यक और गरीब हों, या किसी देश की संस्कृति में वे शरणार्थी हों, या गैरकानूनी रूप से आकर वहां ठहरे हुए हों, उनके बुनियादी मानवाधिकारों का जितना सम्मान जो समाज करता है, वही लोकतांत्रिक समाज के रूप में सम्मान का हकदार होता है। आज हिन्दुस्तान जैसे देशों में जिस तरह का बहुसंख्यकवाद चल रहा है उसमें देश की सबसे बड़ी धार्मिक आबादी वाले समुदाय से परे किसी के कोई हक नहीं माने जा रहे हैं। बाकी तमाम लोगों को चुनावों में खारिज करवाने का काम आसान लगता है क्योंकि जब चुनाव धार्मिक जनमत संग्रह में तब्दील कर दिया जाए, तो अल्पसंख्यक तबकों का कोई भी हक नहीं रह जाता। लेकिन लोगों को याद रखना चाहिए कि लोग धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर समाज के छोटे या कमजोर तबकों को आमतौर पर तो कुचल सकते हैं, लेकिन जब ऐसी हिंसा के खिलाफ वे छोटे तबके एक अलग किस्म की हिंसा पर उतारू होंगे, तो फिर बहुसंख्यक तबका भी अपने को बचा पाना मुश्किल पाएगा। फ्रांस से कई किस्म के सबक भी लेने की जरूरत है।

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