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46 दिन बाद ग़ज़ा में हिंसा रुकने की कोई उम्मीद जागी है। 7 अक्टूबर को हमास ने इजरायल पर हमला किया था, जिसमें 12 सौ लोग मारे गए। यह पचास वर्षों में किए गए सबसे भयावह हमलों में से एक था। फिलिस्तीन पर किसी भी तरह कब्जा जमाने की फिराक में लगे इजरायल के लिए यह हमला सुनहरा मौका लेकर आया। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बिना समय गंवाए युद्ध का ऐलान कर दिया। 12 सौ इजरायलियों के बदले 14 हजार फिलिस्तिनियों को मारा जा चुका है।

नेतन्याहू शायद इस सदी का सबसे भयावह नरसंहार अपने नाम करवाने में सफल हो गए होंगे। हालांकि रूस और अमेरिका से उन्हें चुनौती मिल रही होगी, लेकिन फिलहाल नेतन्याहू की टक्कर में कोई नहीं दिख रहा है। रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी यूक्रेन के साथ जंग छेड़ी हुई है, लेकिन अपने हमलों में वे नैतिकता और लोकतंत्र का पाठ दुनिया को नहीं समझाते हैं, बल्कि साफ-साफ अपने मतलब की बात करते दिखते हैं। वहीं अमेरिका बड़ी चालाकी से अपनी गोटियां रखता है। यूक्रेन से लेकर इजरायल और फिलिस्तीन तक हर युद्धग्रस्त क्षेत्र में अमेरिकी मौजूदगी नजर आएगी, मगर वो कहीं भी युद्ध का सीधे भागीदार नहीं बनता।

विश्वशांति से लेकर लोकतंत्र और निरस्त्रीकरण तक सारे दायित्व उसने अपने नाम लिखवा लिए हैं और शातिराना तरीके से ऐसा माहौल बना दिया है कि अब अमेरिका से उसकी जवाबदेही के बारे में कोई सवाल नहीं करता। कभी किसी ने कर भी लिए तो अमेरिका उनका जवाब देना जरूरी नहीं समझता। तो इस तरह नरसंहार की दौड़ में फिलहाल नेतन्याहू सबसे आगे हैं।

हिटलर के बाद शायद अब नेतन्याहू की ही मिसालें दी जाएंगी कि किस तरह मासूम लोगों को नफरत का शिकार बनाया गया। संयोग ऐसा है कि हिटलर ने यहूदियों पर जुल्म ढाए और अब यहूदियों को इंसाफ के नाम पर नेतन्याहू उसी राह पर हैं। हालांकि दुनिया भर में लोग इजरायल की क्रूरता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। कई जगहों से लोगों ने युद्ध को तत्काल रोकने की अपील की है, ताकि निर्दोषों की मौत का सिलसिला रुके। इजरायल के खिलाफ आवाज उठाने वालों में यहूदी भी शामिल हैं। इससे जाहिर है कि अपने नाम पर की जा रही ये हिंसा यहूदियों को बर्दाश्त नहीं हो रही है। दुनिया में अगर सभी लोग धर्म के नाम पर चलाई जा रही राजनीति और हिंसा को रोकने के लिए उठ खड़े हों, तो काफी हद तक शांति स्थापित हो सकती है।

बहरहाल, फिलहाल अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच इजरायल की कैबिनेट ने 50 बंधकों की रिहाई को सुरक्षित करने के लिए हमास के साथ युद्ध विराम के समझौते को मंज़ूरी दे दी है। इसके तहत लड़ाई में चार दिन के विराम के दौरान बंधक रिहा किए जाएंगे, यह भी कहा गया है कि अतिरिक्त दस बंधकों की रिहाई पर युद्ध विराम को एक और दिन के लिए बढ़ाया जाएगा। हालांकि खबर ये भी है कि कैबिनेट की बैठक से पहले इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा था कि बंधकों की रिहाई के लिए समझौता होने के बावजूद हमास के साथ युद्ध जारी रहेगा। अब इजरायल की केबिनेट की बात सुनी जाएगी या नेतन्याहू की, ये अगले दो-तीन दिनों में ही साफ हो जाएगा। अगर युद्ध रुका रहा, तो यह बहुत बड़ी राहत होगी। इस समझौते के बाद हमास ने बताया है कि इजरायली बंधकों के बदले इजरायल की जेलों से 150 फ़िलिस्तीनियों को रिहा किया जाएगा। क्या इजरायल वाकई ऐसा करेगा, ये देखना होगा।

इस समझौते के तहत राहत सामग्री और दवाइयां लेकर आने वाले सैकड़ों ट्रकों को ग़ज़ा में दाख़िल होने की अनुमति दी जाएगी। गौरतलब है कि ईंधन, भोजन, पानी और दवाओं के अभाव में गज़ा एक बड़े कब्रिस्तान में बदलता जा रहा है। फिलिस्तिनियों के लिए मात्र 10 प्रतिशत ही भोजन उपलब्ध है, अस्पतालों में बिजली और दवाओं के न होने के कारण मरीजों का इलाज नहीं हो रहा। ऊपर से इजरायली विमानों ने चुन-चुन कर अस्पतालों को निशाना बनाया है, जबकि वहां आतंकियों के ठिकाने हैं, इसकी कोई पुष्टि नहीं है। जो लोग बमों और गोलियों से न मरें, वे भूख और बीमारी से मर जाएं, कुछ हालात ऐसे बन गए हैं। ऐसे में राहत सामग्री के पहुंचने से कुछ तो मदद मिलेगी।

चार दिनों के युद्ध विराम के इस समझौते को करवाने में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, और सीआईए के प्रमुख खास तौर पर शामिल रहे। अमेरिकी नेताओं ने क़तर और इजराइल के साथ लगातार वार्ताएं कीं ताकि समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके। दरअसल इस समझौते में अमेरिका के अपने हित भी जुड़े हैं। 7 अक्टूबर से दस अमेरिकी लापता हैं और ये माना जा रहा है कि उन्हें बंधक बनाकर रखा गया होगा। साफ हो गया कि बिना स्वार्थ के अमेरिका कुछ नहीं करता। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध विराम की कितनी कोशिशें की, लेकिन अमेरिकी रवैये के कारण वे सफल नहीं हो पाईं। दुख इस बात का है कि भारत भी अमेरिका के पीछे चलता दिखाई दे रहा है। कल ही यानी मंगलवार को ब्रिक्स देशों ने एक असाधारण वर्चुअल सम्मेलन में ग़ज़ा में तुरंत संघर्ष-विराम लागू करने की अपील की थी।

इसके सदस्य देशों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि फ़िलिस्तीनियों की अलग देश की मांग को लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, तो वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस संकट के लिए नाकाम अमेरिकी कूटनीति को ज़िम्मेदार बताया औऱ दक्षिण अफ्रीका ने इजरायल पर ‘युद्ध अपराधों’ और नरसंहार के आरोप लगाये हैं। लेकिन भारत की ओर से मोदी इस बैठक में शामिल नहीं हुए, शायद उनकी चुनावी व्यस्तता थी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसमें हिस्सा लिया। ब्रिक्स नेताओं ने जहां संघर्षविराम की मांग की वहीं भारतीय विदेश मंत्री ऐसा कहने से बचते नजर आए और केवल इतना कहा कि फ़िलिस्तिनियों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। इससे पहले भी युद्धविराम पर भारत संयुक्त राष्ट्र में हुए मतदान से दूर रहा था, जबकि बाक़ी सभी ब्रिक्स सदस्य देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया था।

प्रधानमंत्री मोदी का इजरायल और अमेरिका के लिए झुकाव अब छिपी बात नहीं है। लेकिन उनकी धारणाओं के कारण देश की विदेश नीति गलत राह पर चले या उसकी साख को धक्का लगे, ये सही नहीं है। बेंजामिन नेतन्याहू तो अपना नाम कैसे दर्ज कराएंगे ये तय है। अब श्री मोदी को विचार करना होगा कि वे भारत का परचम विश्वशांति के लिए लहराते हैं या फिर हिंसा और बदले की जुबान बोलने वालों के साथ खड़े होते हैं।

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