क्यों चाहिए फिरंगियों के एजेंटों की तरह के राज्यपाल.?

राज्यपाल

-सुनील कुमार।।

केरल सरकार अपने राज्यपाल से बुरी तरह थक गई है। लंबी जिंदगी कांग्रेस में गुजारने वाले आरिफ मोहम्मद खान जब मोदी सरकार की तरफ से केरल के राज्यपाल बनाए गए, तो उन्होंने संघ और जनसंघ के लोगों के भी मुकाबले अधिक कट्टर रूख दिखाया, और राज्य सरकार की फजीहत करने वाले राज्यपालों की फेहरिस्त में अपना नाम जल्द ही लिखा लिया। लोगों को याद होगा कि हाल के बरसों में ही राज्यपाल से एक सबसे बड़ा टकराव पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का वहां के जगदीप धनखड़़ के साथ चला जो कि बरसों तक चला, सार्वजनिक रूप से चला, और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर दोनों तरफ से एक-दूसरे पर हमले होते रहे। ऐसा नहीं कि इसके पहले मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के टकराव का कोई इतिहास नहीं है, लेकिन बंगाल के बाद अब केरल, यह टकराव कुछ अधिक बड़ा होते दिख रहा है। जगदीप धनखड़ तो उपराष्ट्रपति बन गए, लेकिन केरल अभी तक आरिफ मोहम्मद खान को भुगत रहा है। अब ऐसी खबर है कि केरल की वामपंथी सरकार इस राज्यपाल के मनमाने फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। केरल में यह टकराव इसलिए भी अधिक है कि आरिफ मोहम्मद मोदी सरकार के मनोनीत हैं, और केरल की सडक़ों पर वामपंथियों और आरएसएस के लोगों के बीच हिंसक टकराव चलते ही रहता है। यह टकराव संवैधानिक और सरकारी मुद्दों से आगे बढक़र निजी हमलों तक भी आ गया है, और पिछले हफ्ते राज्यपाल ने मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनका कार्यालय राज्य में तस्करी को संरक्षण दे रहा है। उन्होंने एक चर्चित सोना-तस्करी मामले के मुख्य आरोपियों में से एक महिला द्वारा लिखी किताब के हिस्से की चर्चा की जिसमें विजयन और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ कई आरोप लगाए गए हैं। दूसरी तरफ कुछ महीने पहले तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके ने राज्यपाल आर.एन. रवि के इस्तीफे की मांग की है।

हम केरल के इस मामले की खूबी और खामी पर जाना नहीं चाहते क्योंकि हम किसी एक राज्य से परे एक सैद्धांतिक बात पर चर्चा करना चाहते हैं। भारत में राजभवनों की परंपरा खत्म करने की जरूरत है। एक पुरानी संवैधानिक व्यवस्था के तहत केन्द्र सरकार राज्यों के राज्यपाल नियुक्त करती है जो कि राज्य सरकारों से सभी तरह के जवाब मांग सकते हैं, और वे खुद केन्द्र सरकार के गृहमंत्रालय को रिपोर्ट करते हैं, उसके तहत काम करते हैं। जब केन्द्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार रहती है, तब तो काम किसी तरह चल जाता है, लेकिन जब इन दोनों जगहों पर परस्पर विरोधी विचारधारा की सरकारें रहती हैं, तब राज्यपाल केन्द्र सरकार के औजार और हथियार की तरह काम करते हैं, और राज्य सरकारों का जीना हराम करने का काम आते हैं। राज्य सरकारों द्वारा तैयार विधेयकों को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजना एक संवैधानिक अनिवार्यता रहती है, और राजभवन ऐसे प्रस्तावों को, विधानसभा में पारित विधेयकों को भी बिस्तर के नीचे दबाकर उस पर चैन से सोते रहते हैं, क्योंकि उन्हें और कोई काम रहता नहीं है। जब-जब राज्यपालों के खिलाफ कोई राज्य सरकार अदालत तक जाती है, शायद हर मामले में राज्यपाल के खिलाफ ही आदेश होता है। और बहुत से मामलों में तो राज्य सरकार को अस्थिर करने के लिए, सत्तारूढ़ पार्टी के बागी विधायकों की सरकार बनाने के लिए, विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ आदेश देने के लिए राज्यपालों का इस्तेमाल होते ही रहता है। केन्द्र सरकार के एजेंटों की तरह काम करने वाले राज्यपालों को प्रदेश का संवैधानिक प्रमुख, और प्रथम नागरिक कहना एक फिजूल की सामंती व्यवस्था है, और यह व्यवस्था खत्म की जानी चाहिए।

बहुत पहले से यह सोच चली आ रही है कि राज्यपाल का पद खत्म किया जाए। वैसे भी राज्यपाल केन्द्र सरकार की तरफ से राज्य सरकार को हलाकान करने के अलावा निहायत गैरजरूरी जलसों का सामान रहते हैं, और उन पर लंबी-चौड़ी फिजूलखर्ची होती है। राजभवन केवल समारोह की जगह बने रहते हैं, और राज्यपाल मुख्यमंत्रियों की रैगिंग लेने के बाद बचे हुए समय में पुलिस बैंड बजवाते हुए अपने पसंदीदा चापलूसों, रिश्तेदारों, और उन्हें मनोनीत करने वाली सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से घिरे रहने का काम करते हैं। ऐसे कामों के लिए सैकड़ों कर्मचारियों वाले राजभवन पर हर महीने करोड़ों का खर्च क्यों किया जाना चाहिए? जहां तक मुख्यमंत्री या मंत्रियों को शपथ दिलाने की बात है, तो वह काम तो हाईकोर्ट के जज भी कर सकते हैं।

और जिस तरह के लोगों को राज्यपाल बनाया जाता है, वह भी सबके सामने है। केन्द्र मेें सत्तारूढ़ पार्टी के नाकामयाब नेताओं को उनकी जाति या उनके धर्म, उनके प्रदेश के आधार पर बारी-बारी से मौका देते हुए लोगों को राज्यपाल बनाया जाता है। इन लोगों की किसी संवैधानिक समझ की कोई बाध्यता नहीं होती, और न ही इनके संसद या विधानसभाओं के किसी तजुर्बे की। केन्द्र सरकार रिटायर होने वाले जिस जज से खुश रहती है, उसे भी राज्यपाल बना देती है, साम्प्रदायिक इतिहास वाले लोग भी राज्यपाल बन जाते हैं, और कई ऐसे राज्यपाल बन जाते हैं जिनका पूरा परिवार राजभवन से राज्य सरकार में दलाली करने का काम करता है। राजभवनों का कैसा-कैसा बेजा इस्तेमाल होता है यह देखना हो तो छत्तीसगढ़ के राजभवन के इतिहास को देखा जा सकता है जहां से एक राज्यपाल ने बहुत सारा सामान अपने प्रदेश अपने घर भेज दिया था, यहां पर एक दूसरे राज्यपाल एक दूसरे रिटायर्ड फौजी अफसर के साथ दारू पीते पड़े रहते थे, और उनके दबाव में राज्य सरकार के किए गए गलत फैसले सुप्रीम कोर्ट तक जाकर मुंह की खाकर आए थे। एक और राज्यपाल इस राजभवन में अपने साम्प्रदायिक इतिहास की गौरवगाथा खुद ही सुनाते रहते थे। और एक के बाद एक कई राज्यपाल इस राज्य में ऐसे हुए जिन्होंने आदिवासियों के बारे में उन्हें मिले अतिरिक्त संवैधानिक अधिकारों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। बिहार में एक ऐसे राज्यपाल हुए जिनके बेटे राजभवन को दलाली का अड्डा बना चुके थे। और आन्ध्र के राजभवन में एक ऐसे बुजुर्ग कांग्रेसी खुफिया कैमरे का शिकार होकर वहां से निकले जो कि 83 बरस की उम्र में तीन-तीन लड़कियों के साथ एक साथ कैमरे पर रिकॉर्ड हुए थे। ऐसी तमाम गंदगी को राजभवनों में क्यों रखा जाना चाहिए, और संविधान का नाम ऐसे भवनों के साथ जोडक़र लोगों की संविधान पर आस्था क्यों खत्म करनी चाहिए?

यह पूरा सिलसिला खत्म करने की जरूरत है। आज केन्द्र और राज्य के संबंधों को बर्बाद करने के लिए, देश के संघीय ढांचे को खत्म करने के लिए जिस आलीशान और सामंती भवन का इस्तेमाल होता है, वह खत्म होना चाहिए। केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी देश भर की राजधानियों के राजभवनों को अपने लोगों के वृद्धाश्रमों की तरह इस्तेमाल करती है, वह भी खत्म होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में राज्य सरकारों का पर्याप्त सम्मान होना चाहिए, और केन्द्र की तरफ से ऐसे तैनात किए गए अड़ंगे खत्म होने चाहिए। जिस तरह देश की राजधानी में राज्यों के अपने कमिश्नर होते हैं जो कि केन्द्र सरकार में उस राज्य के कामकाज करवाते हैं, उसी तरह हर राज्य में केन्द्र के कोई अफसर कमिश्नर की तरह रह सकते हैं, जिनका कोई संवैधानिक दर्जा नहीं हो, और जो प्रदेश की जनता की छाती पर बोझ न हों, और एक संपर्क-अधिकारी की तरह काम करें। देश के संघीय ढांचे में इससे अधिक कोई जरूरत नहीं होना चाहिए। राजभवनों का यह सिलसिला राज्यों के खर्च पर केन्द्र के एजेंटों की अय्याशी और साजिश के अलावा कुछ नहीं है, और यह फिजूल का संस्थान खत्म किया जाना चाहिए, बिना देर किए।

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