पर्यावरण को नहीं, जीवन को है खतरा

-सुनील कुमार।।
दुनिया में पर्यावरण को जितने किस्म के खतरे हैं, और बढ़ते चल रहे हैं, उनकी कल्पना भी आसान नहीं है। इंसान हर दिन अपने कई तरह के काम से धरती और उसके पर्यावरण के लिए तरह-तरह की चुनौतियां खड़ी करते जा रहे हैं, जिनका कोई आसान इलाज नहीं है। इनमें से एक चुनौती बहुत से लोग आबादी को मानते हैं जो कि अभी तीन दिन पहले आठ अरब पार कर चुकी है, और हर सेकेंड पर दो नए जन्म हो रहे हैं। ऐसा अंदाज है कि 2080 तक यह आबादी 10.4 अरब पहुंचकर फिर स्थिर हो जाएगी, या गिरने लगेगी। मतलब यह कि आज से सवा गुना आबादी हो जाने तक इसमें किसी गिरावट का अंदाज आज नहीं है। आबादी के मामले में पर्यावरण के संदर्भ में हमारी सोच कुछ अलग है, लेकिन आज हम इस जगह पर सिर्फ आबादी पर चर्चा खत्म करना नहीं चाहते हैं, इसलिए हम कई लोगों की नजरों में पर्यावरण को एक बड़ा खतरा कही जाने वाली आबादी की चर्चा भर कर रहे हैं कि बहुत से लोग उसे पर्यावरण तबाह करने की बड़ी वजह मानते हैं। लेकिन आबादी से परे भी कई और किस्म की चीजें हैं जिनके बारे में भी गौर करना चाहिए।

हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले दस से अधिक बरसों में एक से अधिक बार इस बात को लिख चुके हैं कि दुनिया में बढ़ते हुए मोबाइल फोन देखते हुए उसके चार्जर एक सरीखे करने की कोशिश करनी चाहिए, और अब जाकर यूरोपीय संघ ने इसकी पहल की है, और अगले एक-दो बरस के भीतर सारे योरप में एक ही एक किस्म के चार्जर रह जाएंगे जिसकी वजह से एप्पल जैसी बड़ी कंपनी को अपने फोन का चार्जिंग पोर्ट बदलना पड़ेगा। इससे धरती पर प्लास्टिक का कचरा कम होगा, और लोगों की जिंदगी तो आसान होगी ही होगी। कुछ ऐसा ही काम बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों की बैटरियों को लेकर भी सोचा जा रहा है, और भारत सरकार इस पर जो नीति बना रही है उसमें बैटरी और उससे चलने वाली गाडिय़ां बनाने वाले निर्माताओं से राय मांगी गई है कि इनके पैमाने कैसे तय किए जा सकते हैं ताकि कम किस्म की बैटरियों से सभी गाडिय़ां चलें, और ऐसी चार्ज की हुई बैटरियों को बदलने के सर्विस स्टेशन शुरू हो सकें ताकि लोगों को अपने-अपने घरों पर ऐसी चार्जिंग का इंतजाम न करना पड़े। इस बारे में भारत सरकार कोई नीति बनाने, और पैमाने लागू करने के पहले दुनिया भर से इस मामले के तजुर्बे का अध्ययन भी कर रही है, और लोगों से सलाह भी उसने मांगी है। आज जिस तरह गाडिय़ों से निकलने वाले टायरों के पहाड़ धरती के पर्यावरण के लिए एक समस्या बनने जा रहे हैं, उसी तरह कल को बैटरियों का यही हाल न हो कि उनके पहाड़ लग जाएं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि बैटरियों में जिस तरह की धातुएं लगती हैं, वे धरती पर सीमित तादाद में ही हैं, और उनकी कमी की वजह से नई बैटरियां बनना उतना आसान नहीं है। इसलिए बैटरियों को उनकी पूरी जिंदगी तक निचोड़ लेना भी जरूरी है, और उसके बाद भी उनके भीतर बची धातुओं का इस्तेमाल जरूरी है। इसके लिए सरकारों को बैटरी नीति बनानी होगी, और भारत जैसे बड़े देश में अगर यह समय रहते किया जा रहा है, तो उससे आगे की बर्बादी का खतरा घटेगा। ठीक इसी तरह की एक फिक्र पुराने मोबाइल फोन को लेकर हो रही है। मोबाइल फोन में कई तरह की धातुएं लगती हैं, और लोग नया फोन लेने के बाद पुराने फोन को री-साइकिलिंग के लिए देने की नहीं सोच पाते। पुराने सामान का मोह नहीं जाता, और उसे री-साइकिलिंग के लिए देने पर कोई फायदा नहीं दिखता। ऐसे में दुनिया के हर इंसान के पास एक से अधिक मोबाइल होने का खतरा खड़ा हो रहा है, और उसे बनाने में लगी धातुओं के दुबारा इस्तेमाल की संभावना खत्म हो रही है। अब देश और कुछ कंपनियां पुराने फोन वापिस लेने की पहल कर रहे हैं, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में, जहां पर लोग कबाड़ को सहेजकर रखने के आदी हैं, वहां पर यह परेशानी तो रहेगी ही।

पर्यावरण को सामान बनाने वाले कारखानों से भी बहुत नुकसान होता है, और जब गैरजरूरी सामान बढ़ते जाते हैं तो उन्हें बनाते हुए धरती पर कार्बन का बोझ बढ़ता है। अब इंसानों का एक ग्राहक के रूप में इस्तेमाल कंपनियों को बहुत सुहाता है, इसलिए जिसकी भी खरीदने की ताकत है, उसे जरूरत से कई गुना सामान बेचने की तरकीब बाजार चलाते ही रहता है। नई-नई फैशन के सामान हर दिन बाजार में उतरते हैं, और लोगों को लुभाते चलते हैं। पर्यावरण की फिक्र की बात करने वाले फिल्मी सितारे या खिलाड़ी भी किसी को खपत कम करने नहीं कहते क्योंकि लोगों की खपत बढऩे से ही उनकी मॉडलिंग जुड़ी हुई है, उनकी कमाई जुड़ी हुई है। इसलिए हर कुछ महीनों में फैशन बदलते जाती है, ताकि खरीदी बढ़ती जाए। अब यह जागरूकता कैसे आ सकती है, यह सोचने की बात है कि सितारों की चकाचौंध के झांसे में आकर गैरजरूरी सामान खरीदने में समझदारी नहीं है, धरती को बचाने में समझदारी है। और शुरू में हमने आबादी को लेकर जो अलग राय रखी थी, वह इससे भी जुड़ी हुई बात है। दुनिया की सबसे गरीब आबादी की प्रति व्यक्ति सामानों की खपत इतनी सीमित है, महज जिंदा रखने की उनकी जरूरतें इतनी गिनी-चुनी हैं कि दुनिया की संपन्न आबादी के एक-एक इंसान सैकड़ों विपन्न लोगों से अधिक खपत करते हैं। इसलिए बढ़ती हुई आबादी धरती पर बोझ नहीं है, साधनों और सुविधाओं के बंटवारे में गैरबराबरी बोझ है जिसकी वजह से गरीबों की भूख ऐसी दिखती है कि मानो वह बढ़ती आबादी की वजह से है, और अमीरों की चर्बी नहीं दिखती क्योंकि उसे जिम की मशीनों पर बिजली जला-जलाकर छांटा जाता है। अगर दुनिया की संपन्न और विपन्न आबादी के बीच सामानों का बंटवारा थोड़ा सा न्यायसंगत हो जाए तो 2080 में होने वाली सवा गुना आबादी भी धरती को बर्बाद नहीं करेगी।

आज संपन्नता के साथ दिक्कत महज निजी खपत की नहीं है, हम अपने आसपास की ऐसी म्युनिसिपलें देखते हैं जो कि अपनी संपन्नता की वजह से लोगों के घरों से कचरा इक_ा करते हुए उन्हें जागरूक करने की तरफ से बेफिक्र रहती हैं। लोग अगर अपने घर पर ही कचरे को छांटकर अलग-अलग करें तो उससे उसका उत्पादक उपयोग भी हो सकता है, और धरती बर्बादी से बच सकती है। लेकिन अगर म्युनिसिपलों के पास पैसा अधिक है, तो वे अपने नागरिकों को जिम्मेदार बनाने के बजाय उन्हें गैरजिम्मेदार वोटर बनाकर रखना चाहती हैं, और कचरे के निपटारे में लोगों की जिम्मेदारी का अहसास भी नहीं कराया जाता। नतीजा यह होता है कि कचरे के निपटारे की लागत बढ़ जाती है, और उसकी री-साइकिलिंग की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। ऐसी ही नौबत के चलते आज दिल्ली में कचरे के पहाड़ खड़े हो गए हैं, और अब वहां के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने घोषणा की है कि ब्रिटेन की किसी कंपनी को लाकर इस कचरे का निपटारा किया जाएगा।

पर्यावरण को मिलती चुनौतियां असीमित हैं, लेकिन आज इस चर्चा का मकसद इस बारे में ध्यान खींचना ही था, यहां पर किसी लेख की तरह तमाम बातों को शामिल करना मुमकिन नहीं है। पर्यावरण के साथ दिक्कत यह है कि जो पीढ़ी लापरवाह है, उसे आमतौर पर लापरवाही का नुकसान नहीं भुगतना पड़ता, इसका बोझ उसकी आने वाली पीढ़ी पर पड़ता है जो कि जहरीली, दमघोंटू हवा में फेंफड़ों की बीमारी पाने की वारिस बनती है। लोगों को अपने बच्चों के फेंफड़ों के बारे में सोचकर, उनको कैंसर के खतरे के बारे में सोचकर पर्यावरण के बारे में सोचना चाहिए। इंसान इस हद तक मतलबपरस्त हैं कि इस जुबान से कम में पर्यावरण के बारे में किसी को सोचने की जरूरत भी नहीं लगेगी।

Facebook Comments Box

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *