हिंसा की ताजा वारदातों से उपजे कई सवाल..

-सुनील कुमार॥

लिव-इन-रिलेशनशिप में एक मुस्लिम ने हिन्दू लडक़ी के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, तो हिन्दू समाज का मुस्लिमविरोधी तबका इस पर उबला हुआ है। जवाब में बहुत से समझदार लोगों ने ऐसी कई खबरें पोस्ट की हैं जिनमें किसी हिन्दू ने किसी गैरहिन्दू जीवनसाथी को मारा है। ऐसी खबरें तलाशने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी, ये खबरें इंटरनेट पर खूब अच्छे से सभी वेबसाईटों पर आई हुई हैं, और उनके सच होने में होने कोई शक नहीं है। अब इस एक ताजा घटना को लेकर इस किस्म की या दूसरी पारिवारिक हिंसा की और बहुत सी खबरें बढ़-चढक़र सामने आ रही हैं। मथुरा में हाईवे के किनारे एक सूटकेस में एक युवती की खून से सनी लाश मिली, और पुलिस ने न सिर्फ दिल्ली की इस लडक़ी की शिनाख्त कर ली बल्कि यह भी पता लगा लिया कि लडक़ी ने मर्जी से शादी की थी, और उसकी मां की मदद से बाप ने अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर से उसे मार डाला, और सूटकेस में बंद करके हाईवे किनारे फेंक आए। लाश ठिकाने लगाने में मां भी बराबरी से साथ गई थी। परिवार में सभी हिन्दू थे, और जिस लडक़े से उसने शादी की थी, वह भी हिन्दू ही था, बस अलग जाति का था।

परिवारों के भीतर जितनी भयानक हिंसा हो रही है, वह दिल दहलाती है और चौंकाती भी है। अपनी ही औलाद को, या अपने ही पति-पत्नी को इस बुरी तरह मारना, और खबरों से यह जानकारी पाने के बाद मारना कि ऐसे तमाम कातिल जल्द ही पकड़ में आ जाते हैं, क्योंकि पुलिस किसी लाश के मिलने पर सबसे पहले आसपास में कातिल ढूंढना शुरू करती है। और अब मोबाइल फोन, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की मेहरबानी से इस किस्म के तमाम जुर्म पकडऩा आसान हो गया है। पारिवारिक या पहचान के, प्रेमसंबंधों के कातिलों का पकड़ा जाना बस दो-चार दिनों की बात होती है, लेकिन लोग हैं कि जाने किस अतिआत्मविश्वास में ऐसे कत्ल करके बैठे रहते हैं। अभी चार दिन पहले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक दुकानदार नौजवान ने अपनी प्रेमिका के लाखों रूपये शेयर मार्केट में गंवा देने के बाद उसके पैसे मांगने पर अपनी दुकान में उसका कत्ल कर दिया, और फिर अपनी ही कार में उस लाश को रखकर शहर में ही एक जगह उसे छोड़ दिया, और दुकान चलाने लगा। अब इसमें लाश की बरामदगी और इस नौजवान की गिरफ्तारी में एक-दो दिन से अधिक लगने भी नहीं थे, और यह गिरफ्तारी तेजी से हो गई, लेकिन दूसरों की खबरों को पढऩे वाले हत्यारे भी क्या सोचकर ऐसा गेम करते हैं जिसमें उनका गिरफ्तार होना महज वक्त की बात रहती है, यह हैरान करने वाली बात है।

हिन्दुस्तान इतना बड़ा देश है कि यहां पर इस किस्म के जुर्म को किसी जाति या धर्म से जोडक़र देखना नासमझी होगी। हर धर्म और जाति में ऐसे मुजरिम मिल रहे हैं, और जुर्म के पहले तक के तनातनी के रिश्ते मिल रहे हैं। अभी जब प्रेमिका की लाश के 35 टुकड़े करके नया फ्रिज खरीदकर उसमें भरकर रखा गया, और रोज दो-दो टुकड़े जंगल में फेंके गए, तो इस खबर को पढक़र साम्प्रदायिक लोगों ने बड़े फ्रिज को ऊंचे कद की हिन्दू लडक़ी से जोडक़र मुस्लिम समुदाय पर हमला किया, तो कई लोगों ने ऐसे लतीफे गढ़े कि कोई बीवी रोज झगड़ा करती थी, लेकिन जब से उसका पति घर में एक बड़ा फ्रिज लेकर आया है, तब से वह चुप रहने लगी है। पारिवारिक या प्रेमसंबंधों की हिंसा को मजाक का सामान बना लेना यही बताता है कि समाज में लोग हिंसा के आदी हो चल रहे हैं, करने के न सही, तो कम से कम देखने और बर्दाश्त करने के। जिस समाज में बलात्कार की घटनाएं लोगों को चौंकाना बंद कर चुकी होती हैं, वहां पर बलात्कार को लेकर लतीफे बनने लगते हैं। सोशल मीडिया की मेहरबानी से हिन्दुस्तान अपने लोगों की ऐसी हर किस्म की बीमार और हिंसक सोच का गवाह बनते चल रहा है।

अब इस चर्चा में सोचने की एक बात यह है कि परिवार के भीतर के रिश्ते हों, या फिर प्रेमसंबंध हों, लोग अपने भूतकाल के साथ जीना क्यों नहीं सीख पाते? अगर बालिग औलाद है, और वह अपनी मर्जी से शादी करके कहीं चली गई है, तो फिर मां-बाप को उसमें खानदान की इज्जत का मुद्दा बनाकर खूनखराबा क्यों करना चाहिए? इसी तरह प्रेमसंबंध जब तक चले, तब तक चले, उसके बाद अगर नहीं निभता है, तो किसी को मारने पर क्यों उतारू होना चाहिए? लोग दरअसल अपने भूतकाल के साथ जीना नहीं सीख पाते, फिर चाहे वह भूतपूर्व मालिक और भूतपूर्व नौकर का रिश्ता ही क्यों न हो। अच्छे-खासे पढऩे-लिखने वाले लोग भी अपनी बकाया जिंदगी अपने भूतपूर्व मालिक या नौकर के खिलाफ लिखने, बोलने, और भडक़ाने को समर्पित कर देते हैं। लोग भूतकाल की फिक्र में इतने डूब जाते हैं कि वे जुर्म के बाद के अंधेरे भविष्य की भी नहीं सोच पाते। यह सिलसिला लोगों के मानसिक रूप से विकसित न होने की वजह से भी होता है। वे पढ़-लिख तो लेते हैं, पढ़े-लिखे लोगों सरीखी जिंदगी भी गुजारते हैं, लेकिन उनमें समझ नहीं आ पाती। कभी वे परिवार की साख के नाम पर ऑनरकिलिंग पर उतारू हो जाते हैं, तो कभी रिश्तों पर पूर्णविराम लगाकर नई जिंदगी शुरू करने के बजाय बाकी की जिंदगी जेल में गुजारने जैसा काम कर बैठते हैं।

लोगों को पहले तो समाज, फिर अपने आसपास के दायरे, और फिर खुद के बारे में यह सोचना चाहिए कि क्या किसी भी वजह से कोई ऐसा जुर्म करना चाहिए जिससे कि बाकी की पूरी जिंदगी खुद जेल में रहें, और बाकी परिवार बर्बाद रहे?

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