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भारत के पड़ोसी देश नेपाल में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन हुआ है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के शीर्ष नेता पुष्प कमल दहल ने तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभाला है। प्रचंड इससे पहले 2008-2009 और 2016-17 में भी नेपाल के प्रधानमंत्री पद पर रह चुके थे। 275 सीटों वाली नेपाली संसद में प्रचंड की पार्टी सीपीएन-माओवादी सेंटर के पास महज 32 सीटें हैं। लेकिन उन्हें सीपीआई-यूएमएल का समर्थन हासिल हुआ है, जिसके पास नेपाली संसद में 78 सीटें हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली की इस पार्टी के पास प्रचंड की पार्टी से कहीं ज्यादा सीटें हैं, लेकिन दोनों नेताओं का मकसद शायद किसी भी तरह सत्ता के शिखर तक आना है। इसलिए दोनों के बीच रविवार को एक नाटकीय घटनाक्रम में यह समझौता हुआ, जिसके तहत अगले ढाई साल तक प्रचंड के हाथ में सरकार की कमान रहेगी और उसके बाद केपी ओली फिर से नेपाल के प्रधानमंत्री बनेंगे।

गौरतलब है कि दो महीने पहले हुए चुनावों में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटें नहीं मिली थीं, लेकिन निर्वतमान प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें मिली थीं। ये तय हुआ था कि पांच दलों की गठबंधन सरकार बनेगी, जिसमें प्रचंड की पार्टी भी शामिल थी। मगर प्रचंड पहले प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और इसलिए वे इस गठबंधन से अलग हो गए। इसके बाद केपी ओली के दल के साथ उनका नया गठबंधन तैयार हुआ, जिसमें दोनों बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनेंगे।

नेपाल में 239 बरस तक राजशाही रही, जो 2008 को खत्म हुई। इसके बाद वहां लोकतंत्र की स्थापना हुई। महज 14 बरसों के नेपाली लोकतंत्र में संविधान और स्थायी सरकार दोनों के लिए काफी जद्दोजहद देखी गई है। अब तक वहां 10 सरकारें आ चुकी हैं। जिसमें 3 बार प्रधानमंत्री बनने का मौका प्रचंड को मिला। प्रचंड की गिनती उन नेताओं में होती है, जिन्होंने राजशाही खत्म करने के लिए लंबा हिंसक संघर्ष किया। माओवादी विचारों के समर्थक होने के बावजूद जब नेपाल में लोकतंत्र स्थापना के लिए संघर्ष हो रहा था, तो उन्होंने निर्वाचन प्रणाली में भागीदारी की। हालांकि सत्ता की लड़ाई में नेपाल के लोकतंत्र को बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ा है।

बहरहाल, अब नेपाल में जो सरकार गठित हुई है, उसमें सत्ता का हस्तांतरण पहले से तय है, इसलिए शायद इस सरकार को पूरे कार्यकाल तक काम करने का मौका मिले।
नेपाल की इस नई सरकार और राजनैतिक घटनाक्रम पर भारत की नजरें लगातार बनी हुई हैं। भारत-नेपाल के रिश्ते ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, भौगोलिक हर लिहाज से बेहद गहरे हैं। इसे बड़े भाई-छोटे भाई या रोटी-बेटी के संबंधों की तरह देख सकते हैं। मगर पिछले कुछ वत्त से नेपाल भी भारत के लिए संवेदनशील मसला बन चुका है।

पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे भारत के पड़ोसी देशों में आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, राजनैतिक अस्थिरता का संकट सिर उठाए ही रहता है, जबकि एक और पड़ोसी देश चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण भारत के लिए उलझनें बढ़ाता रहता है। चीन की कोशिश पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में अपना दखल बढ़ाकर किसी भी तरह भारत पर दबाव बनाने की रहती है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि नेपाल की मौजूदा सरकार के दो धड़ों में से एक का नजरिया भारत के लिए दोस्ताना रहा है, जबकि दूसरे धड़े ने भारत-नेपाल के बीच सीमा विवाद को हवा दी।

प्रचंड के साथ गठबंधन में शामिल केपी शर्मा ओली जब नेपाल के प्रधानमंत्री थे, तो उनका झुकाव चीन की ओर अधिक था। दो साल पहले ओली सरकार ने भारतीय क्षेत्रों कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के नक्शे में शामिल कर लिया था और नए नक्शे को नेपाली संसद की भी मुहर लगवा ली थी। ज्ञात हो कि महाकाली या शारदा नदी भारत की पूर्वी और नेपाल की पश्चिमी सीमा रेखा है। यह उत्तराखंड के कालापानी से निकलकर उत्तर प्रदेश पहुंचती है और घाघरा नदी में मिलकर समाप्त हो जाती है। कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख, इसी महाकाली नदी के पूर्वी हिस्से में आते हैं। लेकिन नेपाल 1816 की सुगौली संधि का हवाला देकर दावा करता है कि इन तीनों के साथ-साथ आसपास के अन्य क्षेत्र भी उसका हिस्सा हैं।

इस ऐतिहासिक विवाद के बावजूद भारत-नेपाल के बीच इस मुद्दे को लेकर संबंध तल्ख नहीं हुए। मगर केपी शर्मा ओली के सत्ता में आने के बाद नेपाल में इस मसले को लेकर भारत विरोधी भावना बढ़ती गई। इधर ओली का भारत विरोध इस कदर बढ़ गया कि उन्होंने जून 2020 में भारत पर उनकी सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप तक मढ़ दिया था।

जानकार इसके पीछे भी चीन की चाल देखते हैं। अब सवाल ये है कि जब ओली का रुख भारतविरोधी हालिया अतीत में रहा है, तो क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि जब ढाई साल बाद वो सत्ता संभालेंगे तो उनके रुख में परिवर्तन दिखेगा। और उससे पहले सवाल ये हैं कि अभी प्रधानमंत्री बने प्रचंड का रुख क्या रहेगा। क्या वे सीमा विवाद पर ओली के नजरिए से सहमत होंगे या अपने पुराने रुख पर कायम रहेंगे।

क्योंकि अभी नवंबर में चुनाव प्रचार के दौरान प्रचंड ने कहा था कि कथित नेपाली जमीन को हासिल करने के लिए भारत के साथ राजनयिक प्रयास करने होंगे। जबकि इससे पहले जुलाई में दिल्ली दौरे पर आए प्रचंड ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की थी और कहा था कि सीमा विवाद को भारत-नेपाल के बीच कबटनीतिक और राजनीतिक बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है।

भारत को लेकर दो विपरीत राय रखने वाले दो राजनेताओं का सत्ता में आना भारत के लिए चुनौती है और उसे काफी संभल कर नेपाल के साथ संबंधों पर काम करना होगा। अभी नई सरकार के गठन के पहले ही भारत-नेपाल सीमा पर पत्थरबाजी की घटनाएं जारी हैं और इसके पीछे नेपाली अधिकारियों की शह देखी जा रही है। बहरहाल, राजनैतिक विवाद चाहे जितने हों, दोनों देशों की जनता के बीच रिश्तों में सौहार्द्र और माधुर्य रहा है, यह हमेशा बरकरार रहे, यह देखना सरकारों का काम है।

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