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सत्ता की वफादार पुलिस और बलि का बकरा आम जनता.. दम तोड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.. गरीब अडाणी का तो सत्यानाश हो गया.. प्रदूषण से दुनिया के शतरंज खिलाड़ियों के खेल पर खतरा.. महिला सशक्तिकरण से अधिक महिलाओं के नेतृत्व की ज़रूरत.. अडानी बना सरकार के गले की हड्डी.. अडाणी या धूमकेतु.? एक लाड़ले बच्चे से परे स्कूल शिक्षा में कुछ नहीं

-सुनील कुमार।।

21वीं सदी के भारत में उत्तरप्रदेश के बाद हिन्दुत्व की दूसरे नंबर की प्रयोगशाला, मध्यप्रदेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी हैरानी भरी नाराजगी जाहिर की है। इस प्रदेश के एक लॉ कॉलेज की लाइब्रेरी में एक ऐसी किताब मिली जिसे हिन्दू धर्म की आलोचना ठहराते हुए मध्यप्रदेश की पुलिस ने प्रिंसिपल को गिरफ्तार करने की तैयारी कर ली। इस पर प्रिंसिपल ने अदालत से अग्रिम जमानत ले ली, तो प्रदेश की पुलिस इसके खिलाफ हाईकोर्ट गई, हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर रोक लगाने से इंकार कर दिया तो प्रिंसिपल इनामुर रहमान सुप्रीम कोर्ट गए। वहां मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने प्रिंसिपल को गिरफ्तार करने की पुलिस की जिद पर हैरानी जाहिर की, और पूछा कि क्या पुलिस गंभीरता से बात कर रही है? चीफ जस्टिस ने कहा कि लाइब्रेरी में एक किताब मिली है जिसमें साम्प्रदायिक प्रतिध्वनि की बात कही जा रही है, यह किताब 2014 में खरीदी गई और उस पर आज प्रिंसिपल को गिरफ्तार करने की कोशिश हो रही है! मुख्य न्यायाधीश ने मध्यप्रदेश की पुलिस को इस पर जमकर फटकार लगाई और कहा कि राज्य को कुछ गंभीर काम करने चाहिए। जाहिर है कि इस फटकार वाला यह मामला मध्यप्रदेश में मुस्लिमों के खिलाफ चल रही सत्ता की एक मुहिम का एक हिस्सा है, और यह भी एक संयोग है कि इसे दो दिनों में दो बार कुछ सुनना पड़ा।

अब कल ही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा नेताओं को दो नसीहतें दी हैं। पहली तो यह कि उन्हें फिल्मों पर गैरजरूरी बयानबाजी से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ लोग किसी फिल्म पर बयान देते हैं, फिर वह पूरे दिन टीवी और मीडिया में चलता है, ऐसे अनावश्यक बयानों से बचना चाहिए। प्रधानमंत्री की इस बात का सीधा रिश्ता मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से है जिन्होंने शाहरूख खान के किरदार वाली पठान नाम की फिल्म में दीपिका पादुकोण की भगवा बिकिनी को लेकर चेतावनी दी थी कि इस फिल्म को मध्यप्रदेश में दिखाने की इजाजत दी जाए या नहीं यह सोचा जाएगा। फिल्म का विरोध करने वाले नरोत्तम मिश्रा सबसे बड़े भाजपा नेता थे। और उनका यह विरोध 14 दिसंबर को सामने आया था। आज महीने भर से अधिक निकल जाने पर प्रधानमंत्री या किसी भी भाजपा नेता की ओर से ऐसे नरोत्तम मिश्राओं की बयानबाजी पर कुछ कहा गया। प्रधानमंत्री का भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में यह बयान भी खबरों में आया है कि उन्होंने पार्टी नेताओं से कहा है कि मुस्लिम समाज के बारे में गलत बयानबाजी करें। समाज के सभी वर्गों से मुलाकात करें, चाहे वे वोट दें, या न दें। उन्होंने कहा कि पार्टी के कई लोगों को मर्यादित भाषा बोलनी चाहिए।

अब मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री इन दोनों की कही हुई बातें मध्यप्रदेश पर तो पूरी तरह से लागू होती हैं जहां पर गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा हिन्दुत्व का एक सबसे ही आक्रामक प्रयोग लगातार कर रहे हैं। एक-एक फिल्म को लेकर उनकी बयानबाजी होती ही रहती है, और मुस्लिमों के मकानों को बुलडोजरों से गिरा देने वाले मामले में भी उनका बयान हक्का-बक्का करने वाला था। लेकिन आज सवाल यह है कि जब दिन-दिन भर किसी भाजपा मंत्री या नेता के बयान टीवी पर छाए रहते हैं, और जाहिर है कि वे प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के अध्यक्ष तक को दिखते ही होंगे, तो ऐसे कई विरोध हो जाने के बाद, और शाहरूख खान के अभिनय वाली फिल्म पठान को इन्हीं दो मुस्लिम नामों की वजह से निशाने पर लेने के महीने भर के बाद नरोत्तम मिश्रा से बिना उनका नाम लिए कुछ कहा गया। मध्यप्रदेश में उनसे ऊपर मुख्यमंत्री हैं, संगठन की तरफ से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, राष्ट्रीय संगठन की तरफ से कोई न कोई प्रभारी महासचिव होंगे, और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो हैं ही। लेकिन इनमें से किसी ने भी अपने से नीचे आने वाले गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को कोई नसीहत देने की कोशिश नहीं की? भगवा कपड़ों में उत्तेजक और वीभत्स किस्म के अश्लील डांस वाले दर्जनों वीडियो तो भाजपा के सांसद फिल्मकलाकारों के साथ अभिनेत्रियों के ही हैं जो कि पठान पर हमले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने डाले हैं, लेकिन उन सबको भुलाकर सिर्फ मुस्लिम नामों वाली एक फिल्म पर ऐसा साम्प्रदायिक हमला करना, देश की हवा को और जहरीला कर गया, लेकिन इस पर नरोत्तम मिश्रा को समझाईश देने का काम 34 दिनों बाद प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए किया है। क्या पार्टी के किसी भी और तरीके से भी ऐसे लोगों को चुप कराने का काम नहीं किया जाना चाहिए था? दूसरी बात नरेन्द्र मोदी की कही हुई ही है, उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ बयानबाजी न करने की सलाह भी दी है। यह तो बारहमासी खिले रहने वाले कंटीले पौधे की तरह के बयान हैं जिनके बिना हिन्दुस्तान में सूरज नहीं डूब पाता। इस पर भी अब जाकर अगर मोदी को सलाह देनी पड़ रही है, तो अब तक पार्टी का ढांचा इस पर क्या कर रहा था?

हम प्रधानमंत्री के शब्दों के भी महत्व को कम नहीं आंक रहे, लेकिन इस पर हैरानी है कि ये शब्द वक्त पर क्यों नहीं आए, बरसों देर से क्यों आए, और देश की हवा को जहरीला हो जाने देने के बाद क्यों आए? अगर उनके शब्दों के पीछे उनकी यही भावना भी है, तो फिर इसके जाहिर होने का मौका तो पिछले 8 बरस में हर दिन सामने आ रहा था, हर दिन फिल्मों को लेकर, मुस्लिमों को लेकर हवा में जहर घोला जा रहा है, और प्रधानमंत्री के आज के शब्द मानो भोपाल गैस त्रासदी के बाद वहां खोले गए एक क्लिनिक से दी जा रही दवाई सरीखे हैं। यह गैस त्रासदी रोज ही सोशल मीडिया और देश के मीडिया पर होते दिख रही है, टीवी की स्क्रीन से निकलकर जहरीली गैस लोगों के दिमागों में घर कर रही है, और अब इन शब्दों के असर का कोई वक्त पता नहीं रह गया है या नहीं। प्रधानमंत्री की नसीहत को सुप्रीम कोर्ट में अभी चल रही टीवी चैनलों की साम्प्रदायिकता की सुनवाई से भी जोडक़र देखना चाहिए कि आज देश की सबसे बड़ी अदालत ने साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कुछ महीनों में लगातार एक कड़ा रूख दिखाया है। हो सकता है कि इसे देखते हुए भी प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी के लोगों को समझाईश देना जरूरी और बेहतर लगा हो। भाजपा के बहुत से नेताओं को इन दोनों मुद्दों पर मोदी के कहे हुए शब्दों को भावना के स्तर पर जाकर भी मानना चाहिए।
-सुनील कुमार

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