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-सुनील कुमार॥

मध्यप्रदेश के इंदौर में एक 12 बरस के बच्चे को पीटा गया, जयश्रीराम, और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने को मजबूर किया गया, और उसके कपड़े उतारे गए, और वीडियो बनाकर फैलाया गया। यह सब कुछ मध्यप्रदेश के इस कारोबारी राजधानी के शहर के बीच हुआ। बताया जा रहा है कि ऐसा कुछ लोगों ने किया, लेकिन पुलिस ने जो जुर्म दर्ज किया है उसमें ऐसा करने वाले आरोपी को भी नाबालिग बताया है। हम बिना किसी और जानकारी के पुलिस के कहे हुए को गलत करार देना नहीं चाहते, लेकिन इस घटना पर जाना चाहते हैं जिसमें अगर बड़े लोग शामिल हैं तो भी, और अगर किसी नाबालिग ने ऐसा किया है, तो भी यह कैसा खतरनाक माहौल है इस पर सोचने की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में इस किस्म की साम्प्रदायिक हरकत नई हो। जिस प्रदेश में बड़े-बड़े नेता और सरकारी-संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोग लगातार साम्प्रदायिक बातें करते हैं, जहां पर सरकार का रूख देखकर पुलिस भी एक चुनिंदा अल्पसंख्यक समुदाय के मकान-दुकान गिराने के लिए बुलडोजर और मशीनें लेकर पहुंचती है, वहां पर एक बच्चे के साथ अगर ऐसा हो गया है, तो वह जुर्म के लिहाज से कितना भी गंभीर क्यों न हों, मध्यप्रदेश की आज की संस्कृति के हिसाब से जरा भी असाधारण बात नहीं है, वहां का माहौल ही ऐसा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बड़े लोगों की नफरत अब छोटे बच्चों तक भी पहुंच रही है, और बच्चों को शिकार बनाया जा रहा है, और अगर पुलिस का कहना सही है, और आरोपी भी नाबालिग है, तो यह एक नए खतरे की शुरुआत है कि अब कमउम्र बच्चे भी इस किस्म की साम्प्रदायिक हिंसा और नफरत में जुट गए हैं। यह हैरानी की बात बिल्कुल नहीं है क्योंकि जहां बड़े-बड़े लोग रात-दिन सिर्फ नफरत की लपटें मुंह से निकाल रहे हैं, तो वहां उनके बच्चों पर ऐसा असर होना ही था।

हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि लोग चाहें तो अपने बच्चों के लिए विरासत में मकान-दुकान छोडक़र न जाएं, लेकिन उनके लिए कम से कम एक महफूज दुनिया जरूर छोड़ें। आज वह हाल नहीं दिख रहा है। आज देश के बहुसंख्यक तबके को उसी की निर्वाचित सरकार के राज में लगातार खतरे में बताया जा रहा है, लगातार उसे अल्पसंख्यकों का खतरा दिखाया जा रहा है, और हकीकत में असली खतरा तो अल्पसंख्यकों पर खड़ा किया गया है, उन पर हमले जारी हैं, और अब उनमें से एक के बच्चे के साथ देश के एक प्रमुख कारोबारी शहर के बीच ऐसी हिंसा हुई है कि उसके कपड़े उतारकर उससे धार्मिक नारे लगवाकर उसका वीडियो बनाया गया है, और अब पुलिस यह वीडियो न फैलाने की अपील कर रही है। अब वह कौन सा समुदाय होगा, कौन सा परिवार होगा जो कि अपने बच्चों के साथ हुए ऐसे सुलूक को आसानी से भूल सकेगा, और अपने इरादों पर काबू पा सकेगा। और कोई अगर यह सोचते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय गिनती में कम है, और उसके साथ कैसा भी सुलूक किया जाए, वह बहुसंख्यकों का कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, तो यह एक खुशफहमी है। एक सीमा से ज्यादा हिंसा झेलने के बाद किसी भी समुदाय के मन में हिंसा की बात आ सकती है, और वह दिन इस देश के अमन-चैन के लिए खतरनाक होगा।

इसके पहले भी देश भर में जगह-जगह कई बुजुर्ग मुस्लिमों को दाढ़ी पकडक़र मारा-पीटा गया, और उनसे हिन्दू देवी-देवताओं के जय-जयकार के नारे लगवाए गए। यह साम्प्रदायिक हिंसा करने वाले लोग अपना खुद का वीडियो बनाकर उसे चारों तरफ फैलाते भी रहे। इससे उनके इरादों के साथ-साथ उनका हौसला भी दिखता है कि कई प्रदेशों में या इस पूरे देश में उन्हें कानून के राज की कोई परवाह नहीं है। अब इंदौर जैसे शहर में अगर ऐसा वीडियो बनाकर लोग फैला रहे हैं, तो हमारा मानना है कि मध्यप्रदेश के हाईकोर्ट या देश के सुप्रीम कोर्ट की यह जिम्मेदारी है कि इस पर राज्य सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगे। राज्य सरकार अभी इस पर कोई फिक्र करते नहीं दिख रही है, क्योंकि देश के अधिकतर प्रदेशों में सरकारों को अपनी पुलिस की साजिश की ताकत पर बहुत भरोसा होता है कि वह ऐसे किसी भी मामले को दबाने या मोडऩे में माहिर रहती है। और इसके साथ-साथ एक दूसरी चीज यह भी है कि देश और अधिकतर प्रदेशों में आज मानवाधिकार आयोग, बाल संरक्षण आयोग या परिषद, महिला आयोग, या एसटी-एससी आयोग उनमें मनोनीत राजनेताओं की वजह से लोकतंत्र के किसी काम के नहीं रह गए हैं। वे सत्ता की मदद के लिए किसी भी जुल्म और ज्यादती को कुचलने वाले लोग रह गए हैं। ऐसे में जिस मकसद से ऐसी संवैधानिक संस्थाओं को बनाया गया है उस मकसद की ही शिकस्त की गारंटी ये संस्थाएं तय कर देती हैं।

हिन्दुस्तान के लोगों को, खासकर बहुसंख्यक समाज को यह सोचना चाहिए कि वे तो पौन सदी से इस देश में सुरक्षित ही थे, आज हिन्दूवादी सरकार के रहते हिन्दू जितने असुरक्षित बताए जा रहे हैं, उतने खतरे में तो वे कभी भी नहीं थे। आज बहुसंख्यक समाज पर सीधे तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन जिस तरह की हिंसा को उसमें बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे यह बात साफ है कि पूरे का पूरा लोकतंत्र खतरे में आने वाला है, शायद आ चुका है। इससे उबरने में हो सकता है कि एक से अधिक पीढिय़ां लग जाएं, क्योंकि नफरत को फैलाना आसान होता है, नफरत में फेविकोल के मजबूत जोड़ की तरह लोगों को जोडऩे की ताकत बहुत रहती है, और मोहब्बत जब तक अपने जूते के तस्मे बांधती रहती है, नफरत पूरे शहर का एक दौरा करके आ जाती है। इसलिए आज नफरत बढ़ाने वाले लोग याद रखें कि वे अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए एक खतरा छोडक़र जाने वाले हैं। हमारे कम लिखे को अधिक समझा जाए, वरना बीमार को पार समझा जाए।

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