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-सुनील कुमार॥

यूक्रेन और रूस के मोर्चे पर अभी अमरीका ने यूक्रेन को ऐसे क्लस्टर बम दिए हैं जिनका इस्तेमाल दुनिया के बहुत से विकसित देश कब का बंद कर चुके हैं क्योंकि ये बम जिस जगह गिराए जाते हैं वहां बिना फटे उसके हिस्से बाद में भी नागरिक आबादी को नुकसान पहुंचाते हैं। खुद नाटो देशों में इटली, स्पेन, जर्मनी, और ब्रिटेन इस पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, और दुनिया के सौ देशों में इस पर रोक है। फिर भी अमरीका ने यूक्रेन को इन्हें देना इस तरह न्यायोचित ठहराया है कि इन्हें यूक्रेन अपने ही उन इलाकों पर इस्तेमाल करेगा जिन पर आज रूस ने कब्जा कर रखा है। जाहिर है कि रूस और यूक्रेन के बीच की इस जंग की बारीकियां अमरीका भी देख रहा है, और नाटो सैनिक गठबंधन के 30 और देश भी गंभीरता और फिक्र से यूक्रेन के साथ खड़े हैं, क्योंकि उनकी आशंका यह है कि अगर रूस ने यूक्रेन पर पूरा ही कब्जा कर लिया, तो वह वहां नहीं थमेगा, और दूसरे यूरोपीय देशों की ओर भी बढ़ेगा।

आज नाटो देश जिस फौजी रणनीति की बारीकियों से यूक्रेन को रूस के खिलाफ मदद कर रहे हैं, वह महज यूक्रेन की मदद नहीं है, वह रूस को कमजोर करने की भी एक योजना है, और उसमें अटपटा कुछ नहीं है क्योंकि परमाणु हथियार संपन्न देश जब एक-दूसरे के खिलाफ रहते हैं, तो वे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने से कम की कार्रवाई एक-दूसरे के खिलाफ करना चाहते हैं। अब ऐसी चाहत रूबरू पूरी नहीं हो पाती, और ऐसा मौका कम ही लगता है जब यूक्रेन जैसा रूस का पड़ोसी रूस के खिलाफ मोर्चे पर डटे रहने को तैयार हो, जिससे कि कुल मिलाकर रूस की फौजी ताकत घटती हो। पश्चिमी देशों और नाटो के आर्थिक प्रतिबंधों के चलते रूस का उतना नुकसान नहीं हो पाया है जितने नुकसान की उम्मीद इन देशों ने की थी। अब तक रूस दीवालिया नहीं हुआ है, भारत और चीन जैसे बड़े देशों ने उसके साथ आर्थिक लेन-देन बंद नहीं किया है, और उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था की कमर नहीं टूटी है। ये बातें पश्चिमी देशों को निराश कर रही हैं, और वे यूक्रेन को इस मोर्चे पर मजबूती से डटाए रखना चाहते हैं ताकि उसके कंधों पर बंदूक रखकर रूस की ताकत घटाई जा सके, ताकि किसी और बड़े मोर्चे पर अगर अमरीकी खेमा और रूस आमने-सामने हों, तो रूस खोखला हो चुका रहे।

दुश्मन के दुश्मन को मदद करके अपने सीधे दुश्मन को कमजोर या खोखला करना एक बड़ी स्वाभाविक सोच रहती है, और यह आज यूक्रेन के मामले में खुलकर दिख रही है। यूक्रेन की इस आत्मरक्षा की जंग में इंसानी लहू का नुकसान सिर्फ उसका खुद का हो रहा है, इसलिए उसे फौजी साज-सामान से मदद करना संपन्न देशों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि कोई ताबूत वहां लौटकर नहीं आ रहे हैं। कुछ इतिहासकार इसे यूक्रेन की जमीन से नाटो का प्रॉक्सी-वॉर भी लिखेंगे क्योंकि अपने सैनिकों को झोंके बिना पश्चिम का फौजी मकसद यहां पूरा हो रहा है।

हिन्दुस्तान में आज सुबह तक मणिपुर की जो हालत सुनाई पड़ रही है, उसका उत्तर-पूर्व के कुछ जानकार लोगों का विश्लेषण चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि मणिपुर में आदिवासी कुकी आबादी के खिलाफ इतनी सामूहिक और संगठित हिंसा, इतने महीनों तक, राज्य और केन्द्र सरकार दोनों के संरक्षण में इसलिए चलाई जा रही है कि आदिवासी आबादी के सामने मणिपुर छोडक़र जाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहे, और फिर उसके बाद उनकी जमीनों पर आसानी से कब्जा किया जा सके। क्या यह जमीन के लिए, उसके नीचे के किसी खनिज के लिए मणिपुर की मैतेई-हिन्दू आबादी के हाथों चलवाया जा रहा प्रॉक्सी-वॉर है? क्या यह जातीय हिंसा सोच-समझकर भडक़ाई गई है, और सोच-समझकर इसे जारी रखने दिया गया है? मणिपुर में मैतेई आबादी को झोंककर जिस तरह उसे कुकी आबादी के खिलाफ डटाकर रखा गया है, वह अगर कोई रणनीति है, तो उसमें मैतेई लोग शतरंज के प्यादों की तरह खतरे में पड़ रहे हैं। लोगों का मानना है कि देश के भीतर कोई गृहयुद्ध बिना सरकार की मर्जी के इतना लंबा नहीं खिंच सकता, और इस गहरी साजिश को समझने की जरूरत है। किसी मोर्चे पर परदे के पीछे से रणनीति बना रहे लोगों के अपने व्यापक हित को भी समझने की जरूरत है। आज अमरीका और नाटो के बाकी देश जिस तरह यूक्रेन के हिमायती बने हुए हैं, उसके पीछे उनकी अपनी रूस-विरोधी रणनीति भी समझना जरूरी है जिसमें वे बिना इंसानी जिंदगियां झोंके अपना मकसद पूरा कर रहे हैं। मणिपुर हो, या हिन्दुस्तान का कोई दूसरा आदिवासी इलाका हो, इस तरह के संघर्ष कहीं सरकार, तो कहीं कारोबार के खड़े किए हुए भी रहते हैं, और इनमें स्थानीय समुदायों को प्यादों की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

यूक्रेन के सिलसिले में मणिपुर का जिक्र, या मणिपुर के सिलसिले में यूक्रेन का जिक्र बड़ा अटपटा लग सकता है। लेकिन दुनिया की मिसालों से लोगों को दूसरी जगहों पर कुछ सीखने-समझने की जरूरत रहती है। भारत के उत्तर-पूर्व के अलग-अलग राज्यों के लोग भी केन्द्र सरकार की मणिपुर रणनीति को देखकर हैरान हैं कि आगे जाकर इन बाकी राज्यों में वहां के आदिवासी विवादों पर केन्द्र सरकार का क्या रूख रहेगा? मणिपुर को सिर्फ एक राज्य मान लेना जायज नहीं होगा, वह उत्तर-पूर्व के तमाम राज्यों से एक मिसाल की तौर पर भी जुड़ा हुआ है, और राज्यों की परस्पर आवाजाही, उनके बीच के टकराव का इतिहास तो है ही। क्या मणिपुर की इस हिंसा के अभी-अभी सामने आए वीडियो उत्तर-पूर्व की बाकी आदिवासी आबादी के लिए किसी किस्म की चेतावनी है? ऐसे सवालों का जवाब सतह पर तैरता हुआ तो नहीं दिख रहा है, लेकिन इन पर सोचने की जरूरत है।

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