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-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तान की अदालतों में होने वाले लेटलतीफ इंसाफ की चर्चा तो अक्सर होते ही रहती है, लेकिन अभी जापान से एक ऐसी खबर आई है जो वहां की अदालती रफ्तार के कम से कम एक मामले को लेकर रौंगटे खड़े कर देती है। इवाओ हाकामादा दुनिया में मौत का सबसे लंबे वक्त से इंतजार कर रहा एक कैदी है जिसे कि 1966 में अपने गृहस्वामी के घर को आग लगाकर परिवार के चार लोगों को मार डालने के आरोप में मौत की सजा हुई थी। यह सजा तो दो बरस में ही सुना दी गई थी, लेकिन वह हमेशा से ही यह कहते रहा कि उससे जोर-जुल्म से यह गुनाह कबूलवाया गया था। इसके बाद लगातार अदालतों में उसकी अपील चलती रही, और यह सजा मिलने के 27 बरस बाद सुप्रीम कोर्ट ने दुबारा सुनवाई की उसकी अपील खारिज की। इसके बाद भी उसके वकील अदालतों में लड़ते रहे, और अभी इस सोमवार को टोक्यो हाईकोर्ट ने माना कि इस सजायाफ्ता मुजरिम पर लगाए गए आरोपों में कोई खामी हो सकती है, इसलिए नई डीएनए जांच के मुताबिक मामले की फिर से सुनवाई की जाए। इस पूरे दौर में इवाओ की उससे कुछ ही छोटी बहन लगातार उसकी तरफ से अभियान चलाती रही, और वकील भी करती रही। मौत की सजा के इंतजार में भी उसे उम्र बहुत अधिक हो जाने की वजह से 2014 में घर पर रहने की इजाजत दे दी गई थी, और तब से वह घर बैठे अपनी अपीलों की सुनवाई देखते जा रहा था। उसके करीबी लोगों का कहना है कि करीब 50 बरस की कैद, जिसका अधिकतर हिस्सा कोठरी में अकेले रहना पड़ा, उसने इवाओ की दिमागी हालत पर भी बहुत असर किया है। अब 87 बरस की उम्र में उस पर आधी सदी से भी अधिक पुरानी मौतों या हत्याओं का वह मामला फिर चलने जा रहा है।

इससे एक बात साफ होती है कि हिन्दुस्तान ही नहीं दुनिया में अधिकतर जगहों पर अदालती लड़ाई में खुद के या समर्थकों के पैसों की बड़ी जरूरत होती है। आज हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में कोई करोड़पति इंसान जिसका अरबों का कारोबार है, वह रातोंरात सुनवाई पा सकता है, लेकिन बहुत गरीब और बेबस लोग इस रफ्तार से अपने खुद के वकील से भी वक्त नहीं पा सकते। अधिकतर गरीब लोग हाईकोर्ट का भी खर्चा नहीं उठा सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट तो उनकी पहुंच से बाहर रहता ही है। जापान के जिस मामले को लेकर आज यहां चर्चा की जा रही है उसमें इस बूढ़े की बहन लगातार उसके लिए अभियान चलाती रही, और उन दोनों की जो तस्वीरें दिख रही हैं उनमें वे फटेहाल भी नहीं दिख रहे हैं, जिससे कि जाहिर है कि उनके पास मुकदमेबाजी की ताकत तो रही होगी। अमरीका में मौत की सजा पाने वाले, अमूमन काले या दूसरे अश्वेत लोग, उनकी मदद के लिए बनाए गए संगठनों की मदद पाते हैं, और ऐसे संगठन या ऐसी सोच वाले वकील उनके मामलों को लेकर आखिरी सांस तक दौड़-भाग करते हैं। हिन्दुस्तान के छत्तीसगढ़ के बस्तर में जिन आदिवासियों पर पुलिस नक्सल-समर्थक होने की तोहमत लगाती है, उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करना नामुमकिन सा लगता है क्योंकि उनके पास अदालत या वकील का खर्च उठाने की ताकत नहीं रहती। ऐसे में बस्तर में सामाजिक सरोकार से काम करने वाली कुछ महिला वकील लगातार उनकी लड़ाई लडऩे का काम करती हैं, और उन्हीं की मदद से बेकसूर आदिवासियों में से कुछ या कई को राहत मिल पाती है। ऐसे वकीलों से दूसरी मदद यह मिलती है कि उनकी मौजूदगी ही पुलिस और सुरक्षाबलों को अगली ज्यादती करने के वक्त कुछ चौकन्ना रखती है कि ये मामले आगे अदालतों में उठाए जा सकते हैं। यह बिना लिखी, बिना कही चेतावनी रहती है, लेकिन इसका असर होता है।

हिन्दुस्तान की अदालतें पिछले कुछ बरसों में लगातार अच्छी या बुरी वजहों से खबरों में बनी हुई हैं। जजों का चाल-चलन लगातार बुरी खबरें पैदा करता है, लेकिन उन पर चर्चा भी होती रहती है। फिर जजों के वकीलों के साथ टकराव, सरकार का जजों से टकराव, इससे भी संस्थागत कमजोरियां उजागर होती रहती हैं, और इन सभी पहलुओं को अपने में सुधार का मौका मिलता है। लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद पिछली आधी सदी में हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था में सुधार की तमाम बातें हालात को किसी किनारे नहीं पहुंचा पाई हैं। न तो अदालतों पर से मामलों का बोझ घटा है, न ही फैसलों में कोई रफ्तार आई है, न ही अदालतों का भ्रष्टाचार घटा है। कुल मिलाकर देश में माहौल यह है कि जिसके पास खूब सारा पैसा है, बड़े-बड़े शातिर और कामयाब वकीलों को रखने की ताकत है, उन्हीं की जल्द सुनवाई हो सकती है, या उनकी दिलचस्पी हो तो उनके मामले बरसों तक घिसट सकते हैं। लोगों का यह भी मानना है कि जिनके पास पैसों की ताकत है वे बहुत से रहस्यमय तरीकों से अपने मामलों की सुनवाई ही बरसों तक टलवाने में कामयाब रहते हैं।

अब जापान में जिस कैदी के मामले की दुबारा सुनवाई डीएनए टेक्नालॉजी आने की वजह से सुबूतों को दुबारा परखने के लिए हो रही है, वैसी टेक्नालॉजी हिन्दुस्तानी अदालतों में भी मामलों को दुबारा तौलने में काम आ सकती है, और आम लोगों का यही मानना रहेगा कि जिनके पास सत्ता या पैसों की ताकत होगी वे ऐसी जांच-रिपोर्ट अपनी मर्जी से खरीद सकेंगे, और टेक्नालॉजी से इंसाफ को मदद मिलने के बजाय उसे धक्का मिलेगा। जापान की बात से हमने आज की यह चर्चा शुरू जरूर की है, लेकिन जो बातें हिन्दुस्तानी न्याय व्यवस्था को तबाह करती चली आ रही हैं, उनके बारे में दुबारा सोचने की जरूरत है। कैसे हिन्दुस्तानी न्याय व्यवस्था को सुधारा जा सकता है, बेहतर बनाया जा सकता है, और इंसाफ का हिमायती बनाया जा सकता है, यह सोचना चाहिए। ऐसा भी नहीं कि इस बारे में सोचा नहीं गया है, कई बार भारत सरकार की बनाई हुई कमेटियों की रिपोर्ट भी आई हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ। बेहतर न्याय व्यवस्था के लिए एक असरदार जनआंदोलन की जरूरत है। जापानियों की तो औसत उम्र बहुत अधिक रहती है, इसलिए 87 बरस की उम्र में भी यह आदमी दुबारा पूरा मुकदमा झेलने की खबर सुन पा रहा है, हिन्दुस्तानी गरीब तो 50-60 बरस की उम्र में ही चल बसते हैं, और उनके लिए इंसाफ तो जापान के मुकाबले कुछ अधिक रफ्तार करना होगा।

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