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सत्ता की वफादार पुलिस और बलि का बकरा आम जनता.. दम तोड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.. गरीब अडाणी का तो सत्यानाश हो गया.. प्रदूषण से दुनिया के शतरंज खिलाड़ियों के खेल पर खतरा.. महिला सशक्तिकरण से अधिक महिलाओं के नेतृत्व की ज़रूरत.. अडानी बना सरकार के गले की हड्डी.. अडाणी या धूमकेतु.? एक लाड़ले बच्चे से परे स्कूल शिक्षा में कुछ नहीं

-सुनील कुमार।।

ब्राजील में नए निर्वाचित राष्ट्रपति लूला के चुनाव को गैरकानूनी करार देते हुए पिछले राष्ट्रपति बोलसोनारो के समर्थकों ने जिस तरह ब्राजील की संसद, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रपति भवन पर हमला बोला, उसने सबको हक्का-बक्का कर दिया। दो बरस पहले जनवरी के महीने का ही पहला हफ्ता था जब अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उकसावे पर उनके समर्थकों ने जो बाइडन के चुनाव को नाजायज करार दिया था, और इसी तरह संसद पर हमला बोला था। अब मानो ब्राजील में उसी अमरीकी हमले से रास्ता समझकर ब्राजील में ठीक वैसा ही हुआ, कुछ बड़े पैमाने पर हुआ, और कुछ दूसरी संवैधानिक संस्थाओं पर भी हुआ। जिस तरह अमरीका में ट्रंप ने बाइडन के चुनाव को मतगणना पूरी हो जाने के बाद भी लगातार खारिज किया, कुछ वैसा ही ब्राजील में भी हारे हुए राष्ट्रपति ने किया। चूंकि ये दोनों मामले महज दो बरस के फासले पर बिल्कुल एक सरीखे दिखते हुए सामने आए हैं, इसलिए यह मानने की हर वजह है कि ट्रंप की बगावत से ही ब्राजील में हारे हुए राष्ट्रपति बोलसोनारो को रास्ता सूझा। इससे यह भी साबित होता है कि दुनिया में एक देश में की गई वारदातें दूसरे देशों को भी उस तरह का रास्ता दिखा सकती हैं। ब्राजील में बोलसोनारो की हार के आसार बने हुए थे, और इस बार की यह हिंसक बगावत सोशल मीडिया पर हमले के तार जोडक़र की गई साबित हो रही है।

दुनिया में लोग और देश मोहब्बत की बातें चाहे एक-दूसरे से सीख पाएं, नफरत और हिंसा की बातें तेजी से एक-दूसरे से सीख लेते हैं। हिन्दुस्तान में आज धर्म को लेकर जिस तरह की कट्टरता पनप रही है, धर्मान्धता बढ़ रही है, किसी भी तरह की हिंसा के लिए धर्म को एक न्यायसंगत वजह मान लिया गया है, उसकी जड़ें पड़ोस के पाकिस्तान से लेकर उसके बगल के अफगानिस्तान तक की धार्मिक कट्टरता से जुड़ी हुई हैं। एक देश का आतंक दूसरे देश के आतंक को बढ़ावा देता है। हिन्दुस्तान में बहुत से लोगों को इस बात से तकलीफ पहुंचती है जब इस देश के धर्मान्ध और साम्प्रदायिक संगठनों की तुलना कुछ लोग अफगान-तालिबानों से करते हैं। हो सकता है कि यह तुलना कुछ नाजायज हो, लेकिन कट्टरता और धर्मान्धता के मामलों में फर्क महज हिंसा के पैमानों का है, बाकी राह तो एक ही है। जिस तरह ट्रंप की दिखाई राह पर बोलसोनारो चले, ठीक उसी तरह दूसरे देशों में इस्लामी कट्टरपंथ और आतंक की दिखाई गई राह पर हिन्दुस्तान में आज की धार्मिक हिंसा चल रही है। हो सकता है कि वह कई मील पीछे हो, लेकिन यह समझ लेना जरूरी है कि यह उसी राह पर मील के अलग-अलग पत्थरों तक पहुंचा हुआ सफर है।

पहले अमरीका, और उसके बाद ब्राजील, दुनिया के दो बड़े और महत्वपूर्ण देशों में हुए पारदर्शी चुनावों के बाद जिस तरह जाती हुई सत्ता ने गुजरने से इंकार कर दिया, और अपनी हार के आंकड़ों को नकार दिया, उससे दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के सामने एक मिसाल बन सकती है, और उससे जगह-जगह लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। जो लोग अमरीका की खबरों को ध्यान से देखते हैं, उन्हें यह मालूम है कि अमरीकी संसद पर ट्रंप समर्थकों द्वारा 6 जनवरी को किए गए हमले की संसदीय सुनवाई पूरी हो चुकी है, और इस कमेटी ने ट्रंप और उनके समर्थकों के खिलाफ चार गंभीर पहलुओं पर आपराधिक मामले चलाने की सिफारिश अमरीका के न्याय विभाग से की है। वहां संसदीय समिति की सिफारिश कोई बंदिश नहीं है, इसलिए अमरीका के सबसे बड़े सरकारी वकील अपने स्तर पर यह तय करेंगे कि किन-किन सिफारिशों के आधार पर आपराधिक मुकदमे चलाने हैं, और क्या पिछले राष्ट्रपति ट्रंप पर भी इन दंगों और हमलों को भडक़ाने और उकसाने का मुकदमा चलाना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो अमरीकी इतिहास में यह पहला मौका रहेगा जब किसी राष्ट्रपति पर ऐसा मुकदमा चलेगा। अमरीका के इस मामले को बाकी लोकतंत्रों को भी बारीकी से देखना चाहिए कि कोई संसदीय समिति किस तरह काम कर सकती है, और किस तरह पिछले राष्ट्रपति को भी कटघरे मेें खड़ा कर सकती है।

हिन्दुस्तान इस मामले में एक बेहतर मिसाल बनकर दुनिया के तमाम लोकतंत्रों के सामने है कि एक बार चुनावी नतीजे आ जाने के बाद कोई सरकार हटने से इंकार नहीं कर पाती। यह एक अलग बात है कि हटने के पहले वह चुनावों में हर गलत काम कर जाती है, थोक में दलबदल करवाती है, चुने हुए सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त करती है, लेकिन वोटरों के फैसले के खिलाफ हथियारबंद बगावत, संसद पर हमला किस्म की बातें हिन्दुस्तान में कभी देखने में नहीं आतीं। या तो इसके पीछे एक वजह यह है कि यहां वोटरों को प्रभावित करने, और सांसदों-विधायकों को खरीदने की इतनी संभावनाएं हमेशा ही बनी रहती हैं कि नतीजों के बाद बगावत की जरूरत नहीं रहती। लेकिन एक पार्टी की सरकार दूसरी पार्टी की सरकार को सत्ता के हस्तांतरण में किसी हिंसा को बढ़ावा देते कभी नहीं दिखी है। अमरीका और ब्राजील को हिन्दुस्तानी संसदीय व्यवस्था से यह एक पहलू जरूर सीख लेना चाहिए, यह एक अलग बात है कि चुनावी नतीजों को भ्रष्टाचार से खरीद लेने में हिन्दुस्तान को जो महारथ हासिल है, उसे सीखने में दूसरे लोकतंत्रों को खासा वक्त लग सकता है।

अमरीका में ट्रंप एक गंभीर मुकदमे का एक गंभीर खतरा झेल रहे हैं, जिसमें उन्हें सजा तक होने का खतरा है। लेकिन अपने देश में वे सजा भुगतें या न भुगतें, उन्होंने पास के एक दूसरे देश में बगावत की प्रेरणा तो दे ही दी है। हमारा यह मानना है कि ट्रंप ने अमरीका में एक आतंकवादी का काम किया, और दूसरे देशों के लिए वे एक आतंकवादी मिसाल बन भी चुके हैं। दुनिया के गंभीर, सभ्य, और परिपक्व लोकतंत्रों को ऐसी घटिया मिसाल बनने से बचना चाहिए जिससे कि वे खुद तो चाहे उबर जाएं, लेकिन वे दूसरों को डुबाने का इंतजाम कर देते हैं।

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